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शुक्रवार, 28 मार्च 2025

मार्च २८, रामकिंकर, सॉनेट, दोहा मुंडालिया मुक्तिक, पूर्णिका, राम कुमार महोबिआ

सलिल सृजन मार्च २८
*
पूर्णिका
बहुआयामी राजकुमार शारद करतीं खूब दुलार अभिनय लेखन शिक्षण कृषि जनसेवा अनुपम हथियार रही महमहा नित प्रतिभा खुद को हर दिन रहा सँवार कीर्ति समृद्धि सफलता पा आए हर दिन नया निखार आडंबर पाखंडों पर जयकर करना सतत प्रहार कला कला के लिए न हो वह समाज का करे सुधार सलिल करे अभिषेक विहँस शुभाशीष दे नभ छू यार!
(रामकुमार महोबिया के जन्म दिन पर)
२८.३.२०२५ 
***
स्मरण युग तुलसी
सॉनेट
मन गह शरण रामकिंकर की,
पढ़-सुन-गुन साहित्य निरंतर,
राम नाम जप निशि-दिन सत्वर
अँगुली पकड़ राम चाकर की।
सद्गति होती हर पामर की,
तर जाते हैं सभी चर-अचर,
मस्तक पर गुरु की पग रज धर,
समझो कृपया हुई हरि-हर की।
महिमा कहि न जाय, यश गाएँ ,
किंकर-छवि अति पावन भावन,
दयासिंधु गुरु करुणासागर।
राम नाम नर्मदा नहाएँ,
राम-कृपा बरसे घर-आँगन,
हनुमत कर गह तर भवसागर।
२८-३-२०२४
•••
दोहा सलिला
ब्यूटीपार्लर में मिला, उनको नया निखार।
धुँधआया चौका पुता, ज्यों चूने से यार।।
यहाँ वहाँ पढ़कर रहे, अब तक हम बेकार।
कार पोंछने कर से, जाते अब सरकार।।
सास-बहू से प्यार कर, माँ-बेटे पर वार।
नफरत-सागर में नहा, वाक् हुई तलवार।।
मन की बातों ने धरा, मनमानी का रूप।
मनमोहन के मौन की, आती याद अनूप।।
बिन बोले जो बोलते, वे न खोलते राज।
बड़बोले देते गँवा, बिना व्याज ही ताज।।
हो लाइक कट पेस्ट पर, जी एस टी अब यार।
भरे तिजोरी तब चले, जुमलों की सरकार।।
२७-३-२०२३
***
मुक्तिका
*
कहाँ गुमी गुड़धानी दे दो
किस्सोंवाली नानी दे दो
बासंती मस्ती थोड़ी सी
थोड़ी भंग भवानी दे दो
साथ नहीं जाएगा कुछ भी
कोई प्रेम निशानी दे दो
मोती मानुस चून आँख को
बिन माँगे ही पानी दे दो
मीरा की मुस्कान बन सके
बंसी-ध्वनि सी बानी दे दो
***
मुक्तक
शशि त्यागी है सदा से, करे चाँदनी दान
हरी हलाहल की तपिश, शिव चढ़ पाया मान
सुंदरता पर्याय बन, कवियों से पा प्रेम
सलिल धार में छवि लखे, माँगे जग की क्षेम
२७-३-२०२०
***
लेख:
संतान बनो
*
इसरो के वैग्यानिकों ने देश के बाहरी शत्रुओं की मिसाइलों, प्रक्षेपास्त्रों व अंतरिक्षीय अड्डों को नष्ट करने की क्षमता का सफल क्रियान्वयन कर हम सबको 'शक्ति की भक्ति' का पाठ पढ़ाया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि देश बाहरी शत्रुओं से बहादुर सेना और सुयोग्य वैग्यानिकों की दम पर निपट सकता है। मेरा कवि यह मानते हुए भी 'जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे कवि' तथा 'सम्हल के रहना अपने घर में छिपे हुए गद्दारों से' की घुटी में मिली सीख भूल नहीं पाता।
लोकतंत्र के भीतरी दुश्मन कौन और कहाँ हैं, कब-कैसे हमला करेंगे, उनसे बचाव कौन-कैसे करेगा जैसे प्रश्नों के उत्तर चाहिए?
सचमुच चाहिए या नेताओं के दिखावटी देशप्रेम की तरह चुनावी वातावरण में उत्तर चाहने का दिखावा कर रहे हो?
सचमुच चाहिए
तुम कहते हो तो मान लेता हूँ कि लोकतंत्र के भीतरी शत्रुओं को जानना और उनसे लोकतंत्र को बचाना चाहते हो। इसके लिए थोड़ा कष्ट करना होगा।
घबड़ाओ मत, न तो अपनी या औलाद की जान संकट में डालना है, न धन-संपत्ति में से कुछ खर्च करना है।
फिर?
फिर... करना यह है कि आइने के सामने खड़ा होना है।
खड़े हो गए? अब ध्यान से देखो। कुछ दिखा?
नहीं?
ऐसा हो ही नहीं सकता कि तुम आइने के सामने हो और कुछ न दिखे। झिझको मत, जो दिख रहा है बताओ।
तुम खुद... ठीक है, आइना तो अपनी ओर से कुछ जोड़ता-घटाता नहीं है, सामने तुम खड़े हो तो तुम ही दिखोगे।
तुम्हें अपने प्रश्नों के उत्तर मिला?
नहीं?, यह तो हो ही नहीं सकता, आईना तुम्हारे प्रश्नों के उत्तर ही दिखा रहा है।
चौंक क्यों रहे हो? हमारे लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा और उस खतरे से बचाव का एकमात्र उपाय दोनों तुम ही हो।
कैसे?
बताता हूँ। तुम कौन हो?
आदमी
वह तो जानता हूँ पर इसके अलावा...
बेटा, भाई, मित्र, पति, दामाद, जीजा, कर्मचारी, व्यापारी, इस या उस धर्म-पंथ-गुरु या राजनैतिक दल या नेता के अनुयायी...
हाँ यह सब भी हो लेकिन इसके अलावा?
याद नहीं आ रहा तो मैं ही याद दिला देता हूँ। याद दिलाना बहुत जरूरी है क्योंकि वहीं समस्या और समाधान है।
जो सबसे पहले याद आना चाहिए और अंत तक याद नहीं आया वह यह कि तुम, मैं, हम सब और हममें से हर एक 'संतान' है। 'संतान होना' और 'पुत्र होना' शब्द कोश में एक होते हुए भी, एक नहीं है।
'पुत्र' होना तुम्हें पिता-माता पर आश्रित बनाता है, वंश परंपरा के खूँटे से बाँधता है, परिवार पोषण के ताँगे में जोतता है, कभी शोषक, कभी शोषित और अंत में भार बनाकर निस्सार कर देता है, फिर भी तुम पिंजरे में बंद तोते की तरह मन हो न हो चुग्गा चुगते रहते हो और अर्थ समझो न समझो राम नाम बोलते रहते हो।
संतान बनकर तुम अंधकार से प्रकाश पाने में रत भारत माता (देश नहीं, पिता भी नहीं, पाश्चात्य चिंतन देश को पिता कहता है, पौर्वात्य चिंतन माता, दुनिया में केवल एक देश है जिसको माता कहा जाता है, वह है भारत) का संतान होना तुम्हें विशिष्ट बनाता है।
कैसे?
क्या तुम जानते हो कि देश को विदेशी ताकतों से मुक्त कराने वाले असंख्य आम जन, सर्वस्व त्यागने वाले साधु-सन्यासी और जान हथेली पर लेकर विदेशी शासकों से जूझनेवाले पंथ, दल, भाषा, भूषा, व्यवसाय, धन-संपत्ति, शिक्षा, वाद, विचार आदि का त्याग कर भारत माता की संतान मात्र होकर स्वतंत्रता का बलिवेदी पर हँसते-हँसते शीश समर्पित करते रहे थे?
भारत माँ की संतान ही बहरों को सुनाने के लिए असेंबली में बम फोड़ रही थी, आजाद हिंद फौज बनाकर रणभूमि में जूझ रही थी।
लोकतंत्र को भीतरी खतरा उन्हीं से है जो संतान नहीं है और खतरा तभी मिलेगा जब हम सब संतान बन जाएँगे। घबरा मत, अब संतान बनने के लिए सिर नहीं कटाना है, जान की बाजी नहीं लगाना है। वह दायित्व तो सेना, वैग्यानिक और अभियंता निभा ही रहे हैं।
अब लोकतंत्र को बचाने के लिए मैं, तुम, हम सब संतान बनकर पंथ, संप्रदाय, दल, विचार, भाषा, भूषा, शिक्षा, क्षेत्र, इष्ट, गुरु, संस्था, आहार, संपत्ति, व्यवसाय आदि विभाजक तत्वों को भूलकर केवल और केवल संतान को नाते लोकहित को देश-हित मानकर साधें-आराधें।
लोकतंत्र की शक्ति लोकमत है जो लोक के चुने हुए नुमाइंदों द्वारा व्यक्त किया जाता है।
यह चुना गया जनप्रतिनिधि संतान है अथवा किसी वाद, विचार, दल, मठ, नेता, पंथ, व्यवसायी का प्रतिनिधि? वह जनसेवा करेगा या सत्ता पाकर जनता को लूटेरा? उसका चरित्र निर्मल है या पंकिल? हर संतान, संतान को ही चुने। संतान उम्मीदवार न हो तो निराश मत हो, 'नोटा' अर्थात इनमें से कोई नहीं तो मत दो। तुम ऐसा कर सके तो राजनैतिक सट्टेबाजों, दलों, चंदा देकर सरकार बनवाने और देश लूटनेवालों का बाजी गड़बडा़कर पलट जाएगी।
यदि नोटा का प्रतिशत ५००० प्रतिशत या अधिक हुआ तो दुबारा चुनाव हो और इस चुनाव में खड़े उम्मीदवारों को आजीवन अयोग्य घोषित किया जाए।
पिछले प्रादेशिक चुनाव में सब चुनावी पंडितों को मुँह की खानी पड़ी क्योंकि 'नोटा' का अस्त्र आजमाया गया। आयाराम-गयाराम का खेल खेल रहे किसी दलबदलू को कहीं मत न दे, वह किसी भी दल या नेता को नाम पर मत माँगे, उसे हरा दो। अपराधियों, सेठों, अफसरों, पूँजीपतियों को ठुकराओ। उन्हें चुने जो आम मतदाता की औसत आय के बराबर भत्ता लेकर आम मतदाता को बीच उन्हीं की तरह रहने और काम करने को तैयार हो।
लोकतंत्र को बेमानी कर रहा दलतंत्र ही लोकतंत्र का भीतरी दुश्मन है। नेटा के ब्रम्हास्त्र से- दलतंत्र पर प्रहार करो। दलाधारित चुनाव संवैधानिक बाध्यता नहीं है। संतान बनकर मतदाता दलीय उम्मीदवारों के नकारना लगे और खुद जनसेवी उम्मीदवार खड़े करे जो देश की प्रति व्यक्ति औसत आय से अधिक भत्ता न लेने और सब सुविधाएँ छोड़ने का लिखित वायदा करे, उसे ही अवसर दिया जाए।
संतान को परिणाम की चिंता किए बिना नोटा का ब्रम्हास्त्र चलाना है। सत्तर साल का कुहासा दो-तीन चुनावों में छूटने लगेगा।
आओ! संतान बनो।
२८-३-२०१९
*
मुक्तिका
संजीव
*
मुझमें कितने 'मैं' बैठे हैं?, किससे आँख मिलाऊँ मैं?
क्या जाने क्यों कब किस-किससे बरबस आँख चुराऊँ मैं??
*
खुद ही खुद में लीन हुआ 'मैं', तो 'पर' को देखे कैसे?
बेपर की भरता उड़ान पर, पर को तौल न पाऊँ मैं.
*
बंद करूँ जब आँख, सामना तुमसे होता है तब ही
कहीं न होकर सदा यहीं हो, किस-किस को समझाऊँ मैं?
*
मैं नादां बाकी सब दाना, दाना रहे जुटाते हँस
पाकर-खोया, खोकर-पाया, खो खुद को पा जाऊँ मैं
*
बोल न अपने ही सुनता मन, व्यर्थ सुनाता औरों को
भूल कुबोल-अबोल सकूँ जब तब तुमको सुन पाऊँ मैं
*
देह गेह है जिसका उसको, मन मंदिर में देख सकूँ
ज्यों कि त्यों धर पाऊँ चादर, तब तो आँख उठाऊँ मैं.
*
आँख दिखाता रहा जमाना, बेगाना है बेगाना
अपना कौन पराया किसको, कह खुद को समझाऊँ मैं?
२८.३.२०१४
***
त्वरित प्रतिक्रिया
महारास और न्यायालय
*
महारास में भाव था, लीला थी जग हेतु.
रसलीला क्रीडा हुई, देह तुष्टि का हेतु..
न्यायालय अँधा हुआ, बँधे हुए हैं नैन.
क्या जाने राधा-किशन, क्यों खोते थे चैन?.
हलकी-भारी तौल को, माने जब आधार.
नाम न्याय का ले करे, न्यायालय व्यापार..
भारहीन सच को 'सलिल', कोई न सकता नाप.
नाता राधा-किशन का, सके आत्म में व्याप..
***
कुण्डलिया
*
मन से राधाकिशन तब, 'सलिल' रहे थे संग.
तन से रहते संग अब, लिव इन में कर जंग..
लिव इन में कर जंग, बदलते साथी पल-पल.
कौन बताए कौन, कर रहा है किससे छल?.
नाते पलते मिलें, आजकल केवल धन से.
सलिल न हों संजीव, तभी तो रिश्ते मन से.
२८.३.२०१०
***

गुरुवार, 27 मार्च 2025

मार्च २७, शारदा, नाट्य, पूर्णिका, सॉनेट, गणगौर, दोहे, गीत, मधुमालती, मनोरम, छंद, मुक्तिका

सलिल सृजन मार्च २७
विश्व नाट्य शाला दिवस
पूर्णिका 
*
नाट्यशाला जग सकल जग 
करो अभिनय कहे रग-रग 
पटकथा लिख दी गई है
ठगे जाओ या बचो ठग 
धूल बैठे शीश पर जा 
रौंदता है गर अधिक पग   
रुक न थक या हारकर मन 
मिले मंजिल तज नहीं मग 
राह लंबी हो भले ही 
नाप लेते उठे लघु डग 
काट पर कहते उड़ो रे!
काट बंधन उड़ गया खग
'सलिल' शत चोट पल-पल 
जो वही पत्थर बने नग 
००० 
प्रार्थना
शारद! सलिल अंजली अर्पित स्वीकारो हे मैया!
मूढ़ दीन मैं, कृपा करो माँ! पकड़ो मेरी बैंया।।
काम-क्रोध मद-मोह दंभ भव बाधाएँ हैं घेरे।
पग पग पर हैं शूल अनगिनत जननी! ले लो कैंया।
मर्म धर्म का समझाओ माँ! शंका सभी मिटाओ।
पाप-ताप से अंब! बचा लो सिर पर दो कर छैंया।।
सब रिश्ते-नाते मतलब के, कोई दर्द न बाँटे।
तारणहार न कोई संकट में माता ही सैंया।
२७.३.२०२५
०००
सॉनेट
शीतल जल जैसा,
था अग्नि ताप क्यों?,
चमत्कार ऐसा,
धरा पर हुआ यों।
झूठ है या सत्य?
कैसे बतलाएँ?
किसने किया कृत्य?
कैसे समझाएँ?
हाथ की सफाई,
अय्यारी या छल?
माया फैलाई
दिखाया भक्ति बल?
प्रह्लाद रहा मौन,
कहेगा सच कौन?
२७.३.२०२४
***
मुक्तिका
मुक्तक का विस्तार मुक्तिका
हो समान पदभार मुक्तिका
हिंदी ग़ज़ल इसे कह सकते
है शब्दों का हार मुक्तिका
मिटा दूरियाँ सके दिलों से
रही लुटाती प्यार मुक्तिका
लिए पदांत-तुकांत सुसज्जित
भावों का श्रृंगार मुक्तिका
यही गीतिका सजल तेवरी
द्विपद मुक्त रसधार मुक्तिका
तज अपूर्णता बनी पूर्णिका
नित गहती नव नाम मुक्तिका
***
सॉनेट
दिया
*
दिया जल गया हुआ उजाला
जय जय करें अंबिका की सब
हुआ अँधेरे का मुँह काला
लगे हो गई है पूनम अब
दिया जिसे जो लिया न जाता
तब ही कीर्ति गूँजती जग में
जो किस्मत में खुद ही आता
मंज़िल दूर न रहती मग से
दिया मकां को बना रहा घर
उतर मयंक धरा पर आया
दिया कहे हो कोई न बेघर
रहे प्रियंक सदा सरसैया
दिया हुलास आस देता है
दिया न कुछ वापिस लेता है
***
सॉनेट
कलम
*
कलम न होती अगर हमारे हाथ में
भाग्य विधाता खुद के हम कैसे होते?
कलम न करती भावों की खेती यदि तो
गीत-ग़ज़ल की फसलें हम कैसे बोते?
कलम न करती अक्षर का आराधन तो
शब्द निःशब्दित कहिए कैसे कर पाते?
कलम न रोपी जाती बगिया-क्यारी में
सुमन सुगंधित कैसे दुनिया महकाते?
बक़लम कलम जुड़े मन से मन खत बनकर
थाती पीढ़ी ने पीढ़ी को दी अनुपम
कलम जेब में भाग्य बनाती लिख-पढ़कर
मिली विरासत कल की कल को हर उत्तम
कलम उपस्थित कर देती है चित्र सखे!
कलम गमकती जीवन में बन इत्र सखे!
***
: हिंदी शब्द सलिला - १ :
आइये! जानें अपनी हिंदी को।
हिंदी का शब्द भंडार कैसे समृद्ध हुआ?
आभार अरबी भाषा का जिसने हमें अनेक शब्द दिए हैं, इन्हें हम निरंतर बोलते हैं बिना जाने कि ये अरबी भाषा ने दिए हैं।
भाषिक शुद्धता के अंध समर्थक क्या इन शब्दों को नहीं बोलते?
ये शब्द इतने अधिक प्रचलित हैं कि इनके अर्थ बिना बताए भी हम सब जानते हैं।
कुछ अरबी शब्द निम्नलिखित हैं -
अखबार
अदालत
अल्लाह
अलस्सुबह
आदमकद
आदमी
औकात
औरत
औलाद
इम्तहान
ऐनक
कद्दावर
काफी
किताब
कैद
खत
खातिर
ग़ज़ल
गलीचा
जलेबी
तकिया
तबला
तलाक
तारीख
दिनार
दीवान
बिसात
मकतब
मस्तूल
महक
मानसून
मुहावरा
मौसम
लिहाज
वकील
वक़्त
शहीद
शादी
सुबह
हकीम
हमकदम
हमदम
हमपेशा
हमराह
हमेशा
हरदम
***
विमर्श :
गणगौर : क्या और क्यों?
*
'गण' का अर्थ शिव के भक्त या शिव के सेवक हैं।
गणनायक, गणपति या गणेश शिवभक्तों में प्रधान हैं।
गणेश-कार्तिकेय प्रसंग में वे शिव-पार्वती की परिक्रमा कर सृष्टि परिक्रमा की शर्त जीतते हैं।
'कर्पूर गौरं करुणावतारं' के अनुसार 'गौर' शिव-शिवा हैं। गण गौर में 'गण' मिलकर 'गौर' की पूजा करते हैं जो अर्धनारीश्वर हैं अर्थात् 'गौर' में ही 'गौरी' अंतर्व्याप्त हैं। तदनुसार परंपरा से गणगौर पर्व में शिव-शिवा पूज्य हैं।
'गण' स्त्री-पुरुष दोनों होते हैं किंतु चैत्र में फसल पकने के कारण पति को उसका संरक्षण करना होता है। इसलिए स्त्रियाँ (अपने मन में पति की छवि लिए) 'गौर' (जिनमें गौरी अंतर्निहित हैं) को पूजती हैं। नर-नारी साम्य का इससे अधिक सुंदर उदाहरण विश्व में कहीं नहीं है।
विवाह पश्चात् प्रथम गणगौर पर्व 'तीज' पर ही पूजने की अनिवार्यता का कारण यह है कि पति के मन में बसी पत्नि और पति के मन में बसा पति एक हों। मन का मेल, तन का मेल बने और तब तीसरे (संतान) का प्रवेश हो किंतु उससे भी दोनों में दूरी नहीं, सामीप्य बढ़े।
ईसर-गौर की प्रतिमा के लिए होलिका दहन की भस्म और तालाब की मिट्टी लेना भी अकारण नहीं है। योगी शिव को भस्म अतिप्रिय है। महाकाल का श्रंगार भस्म से होता है। त्रिनेत्र खुलने से कामदेव भस्म हो गया था। होलिका के रूप में विष्णु विरोधी शक्ति जलकर भस्म हो गयी थी। शिव शिवा प्रतिमा हेतु भस्म लेने का कारण विरागी का रागी होना अर्थात् पति का पत्नि के प्रति समर्पित होना, प्रेम में काम के वशीभूत न होकर आत्मिक होना तथा वे विपरीत मतावलंबी या विचारों के हों तो विरोध को भस्मीभूत करने का भाव अंतर्निहित है।
गौरीश्वर प्रतिमा के लिए दूसरा घटक तालाब की मिट्टी होने के पीछे भी कारण है। गौरी, शिवा, उमा ही पार्वती (पर्वत पुत्री) हैं। तालाब पर्वत का पुत्र याने पार्वती का भाई है। आशय यह कि ससुराल में पर्व पूजन के समय पत्नि के मायके पक्ष का सम मान हो, तभी पत्नि को सच्ची आनंदानुभूति होगी और वह पति के प्रति समर्पिता होकर संतान की वाहक होगी।
दर्शन, आध्यात्म, समाज, परिवार और व्यक्ति को एक करने अर्थात अनेकता में एकता स्थापित करने का लोकपर्व है गणगौर।
गणगौर पर १६ दिनों तक गीत गाए जाते हैं। १६ अर्थात् १+६=७। सात फेरों तथा सात-सात वचनों से आरंभ विवाह संबंध १६ श्रंगार सज्जित होकर मंगल गीत गाते हुए पूर्णता वरे।
पर्वांत पर प्रतिमा व पूजन सामग्री जल स्रोत (नदी, तालाब, कुआं) में ही क्यों विसर्जित करें, जलायें या गड़ायें क्यों नहीं?
इसका कारण भी पूर्वानुसार ही है। जलस्रोत पर्वत से नि:सृत, पर्वतात्मज अर्थात् पार्वती बंधु हैं। ससुराल में मंगल कार्य में मायके पक्ष की सहभागिता के साथ कार्य समापन पश्चात् मायके पक्ष को भेंट-उपहार पहुँचाई जाए। इससे दोनों कुलों के मध्य स्नेह सेतु सुदृढ़ होगा तथा पत्नि के मन में ससुरालियों के प्रति प्रेमभाव बढ़ेगा।
कुँवारी कन्या और नवविवाहिता एेसे ही संबंध पाने-निभाने की कामना और प्रयास करे, इसलिए इस पर्व पर उन्हें विशेष महत्व मिलता है।
एक समय भोजन क्योँ?
ऋतु परिवर्तन और पर्व पर पकवान्न सेवन से थकी पाचन शक्ति को राहत मिले। नवदंपति प्रणय-क्रीड़ारत होने अथवा नन्हें शिशु के कारण रात्रि में प्रगाढ़ निद्रा न ले सकें तो भी एक समय का भोजन सहज ही पच सकेगा। दूसरे समय भोजन बनाने में लगनेवाला समय पर्व सामग्री की तैयारी हेतु मिल सकेगा। थके होने पर इस समय विश्राम कर ऊर्जा पा सकेंगे।
इस व्रत के मूल में शिव पूजन द्वारा शिवा को प्रसन्न कर गणनायक सदृश मेधावी संतान धारण करने का वर पाना है। पुरुष संतान धारण कर नहीं सकता। इसलिए केवल स्त्रियों को प्रसाद दिया जाता है। सिंदूर स्त्री का श्रंगार साधन है। विसर्जन पूर्व गणगौर को पानी पिलाना, तृप्त करने का परिचायक है।
२७-३-२०२०
***
गीत :
मैं अकेली लड़ रही थी
*
मैं अकेली लड़ रही थी
पर न तुम पहचान पाये.....
*
सामने सागर मिला तो, थम गये थे पग तुम्हारे.
सिया को खोकर कहो सच, हुए थे कितने बिचारे?
जो मिला सब खो दिया, जब रजक का आरोप माना-
डूब सरयू में गये, क्यों रुक न पाये पग किनारे?
छूट मर्यादा गयी कब
क्यों नहीं अनुमान पाये???.....
*
समय को तुमने सदा, निज प्रशंसा ही सुनाई है.
जान यह पाये नहीं कि, हुई जग में हँसाई है..
सामने तव द्रुपदसुत थे, किन्तु पीछे थे धनञ्जय.
विधिनियंता थे-न थे पर, राह तुमने दिखायी है..
जानते थे सच न क्यों
सच का कभी कर गान पाये???.....
*
हथेली पर जान लेकर, क्रांति जो नित रहे करते.
विदेशी आक्रान्ता को मारकर जो रहे मरते..
नींव उनकी थी, इमारत तुमने अपनी है बनायी-
हाय! होकर बागबां खेती रहे खुद आप चरते..
श्रम-समर्पण का न प्रण क्यों
देश के हित ठान पाये.....
*
'आम' के प्रतिनिधि बने पर, 'खास' की खातिर जिए हो.
चीन्ह् कर बाँटी हमेशा, रेवड़ी- पद-मद पिए हो..
सत्य कर नीलाम सत्ता वरी, धन आराध्य माना.
झूठ हर पल बोलते हो, सच की खातिर लब सिये हो..
बन मियाँ मिट्ठू प्रशंसा के
स्वयं ही गान गाये......
*
मैं तुम्हारी अस्मिता हूँ, आस्था-निष्ठा अजय हूँ.
आत्मा हूँ अमर-अक्षय, सृजन संधारण प्रलय हूँ.
पवन धरती अग्नि नभ हूँ, 'सलिल' हूँ संचेतना मैं-
द्वैत मैं, अद्वैत मैं, परमात्म में होती विलय हूँ..
कर सके साक्षात् मुझसे
तीर कब संधान पाए?.....
*
मैं अकेली लड़ रही थी
पर न तुम पहचान पाये.....
*
⭐⭐⭐⭐👌👌👌👌⭐⭐⭐⭐
सामयिक दोहे
लोकतंत्र की हो गई, आज हार्ट-गति तेज?
राजनीति को हार्ट ने, दिया सँदेसा भेज?
वादा कर जुमला बता, करते मन की बात
मनमानी को रोक दे, नोटा झटपट तात
मत करिए मत-दान पर, करिए जग मतदान
राज-नीति जन-हित करे, समय पूर्व अनुमान
लोकतंत्र में लोकमत, ठुकराएँ मत भूल
दल-हित साध न झोंकिए, निज आँखों में धूल
सत्ता साध्य न हो सखे, हो जन-हित आराध्य
खो न तंत्र विश्वास दे, जनहित से हो बाध्य
नोटा का उपयोग कर, दें उन सबको रोक
स्वार्थ साधते जो रहे, उनको ठीकरा लोक
👌👌👌👌⭐⭐⭐⭐👌👌👌👌
***
गीत
सच्ची बात
*
मेरे घर में हो प्रकाश
तेरा घर बने मशाल
*
मेरा अनुभव है यही
पैमाने हैं दो।
मुझको रिश्वत खूब दो
बाकी मगर न लो।।
मैं तेरा रखता न पर
तू मेरा रखे खयाल।
मेरे घर में हो प्रकाश
तेरा घर बने मशाल।।
*
मेरे घर हो लक्ष्मी,
तेरे घर काली।
मुझसे ले मत, दे मुझे
तू दहेज-थाली।
तेरा नत, मेरा रहे
हरदम ऊँचा भाल।
मेरे घर में हो प्रकाश।
तेरा घर बने मशाल।।
*
तेरा पुत्र शहीद हो
मेरा अफसर-सेठ।
तेरी वाणी नम्र हो
मैं दूँ गाली ठेठ।।
तू मत दे, मैं झटक लूँ
पहना जुमला-माल।
मेरे घर में हो प्रकाश
तेरा घर बने मशाल।।
२७-३-२०१९
***
दोहा गीत
*
जो अव्यक्त हो,
व्यक्त है
कण-कण में साकार
काश!
कभी हम पा सकें,
उसके भी दीदार
*
कंकर-कंकर में वही
शंकर कहते लोग
संग हुआ है किस तरह
मक्का में? संजोग
जगत्पिता जो दयामय
महाकाल शशिनाथ
भूतनाथ कामारि वह
भस्म लगाए माथ
भोगी-योगी
सनातन
नाद वही ओंकार
काश!
कभी हम पा सकें,
उसके भी दीदार
*
है अगम्य वह सुगम भी
अवढरदानी ईश
गरल गहे, अमृत लुटा
भोला है जगदीश
पुत्र न जो, उनका पिता
उमानाथ गिरिजेश
नगर न उसको सोहते
रुचे वन्य परिवेश
नीलकंठ
नागेश हे!
बसो ह्रदय-आगार
काश!
कभी हम पा सकें,
उसके भी दीदार
२७-३-२०१८
***
नवगीत
*
ताप धरा का
बढ़ा चैत में
या तुम रूठीं?
लू-लपटों में बन अमराई राहत देतीं।
कभी दर्प की उच्च इमारत तपतीं-दहतीं।
बाहों में आ, चाहों ने हारना न सीखा-
पगडंडी बन, राजमार्ग से जुड़-मिल जीतीं।
ठंडाई, लस्सी, अमरस
ठंडा खस-पर्दा-
बहा पसीना
हुई घमौरी
निंदिया टूटी।
*
सावन भावन
रक्षाबंधन
साड़ी-चूड़ी।
पावस की मनहर फुहार मुस्काई-झूमी।
लीक तोड़कर कदम-दर-कदम मंजिल चूमी।
ध्वजा तिरंगी फहर हँस पड़ी आँचल बनकर-
नागपंचमी, कृष्ण-अष्टमी सोहर-कजरी।
पूनम-एकादशी उपासी
कथा कही-सुन-
नव पीढ़ी में
संस्कार की
कोंपल फूटी।
*
अन्नपूर्णा!
शक्ति-भक्ति-रति
नेह-नर्मदा।
किया मकां को घर, घरनी कण-कण में पैठीं।
नवदुर्गा, दशहरा पुजीं लेकिन कब ऐंठीं?
धान्या, रूपा, रमा, प्रकृति कल्याणकारिणी-
सूत्रधारिणी सदा रहीं छोटी या जेठी।
शीत-प्रीत, संगीत ऊष्णता
श्वासों की तुम-
सुजला-सुफला
हर्षदायिनी
तुम्हीं वर्मदा।
*
जननी, भगिनी
बहिन, भार्या
सुता नवेली।
चाची, मामी, फूफी, मौसी, सखी-सहेली।
भौजी, सासू, साली, सरहज छवि अलबेली-
गति-यति, रस-जस,लास-रास नातों की सरगम-
स्वप्न अकेला नहीं, नहीं है आस अकेली।
रुदन, रोष, उल्लास, हास,
परिहास,लाड़ नव-
संग तुम्हारे
हुई जिंदगी ही
अठखेली।
२७-३-२०१६
***
छंद सलिला:
मधुमालती छंद
*
लक्षण: जाति मानव, प्रति चरण मात्रा १४ मात्रा, यति ७-७, चरणांत गुरु लघु गुरु (रगण) होता है.
लक्षण छंद:
मधुमालती आनंद दे
ऋषि साध सुर नव छंद दे
चरणांत गुरु लघु गुरु रहे
हर छंद नवउत्कर्ष दे।
उदाहरण:
१. माँ भारती वरदान दो
सत्-शिव-सरस हर गान दो
मन में नहीं अभिमान हो
घर-अग्र 'सलिल' मधु गान हो।
२. सोते बहुत अब तो जगो
खुद को नहीं खुद ही ठगो
कानून को तोड़ो नहीं-
अधिकार भी छोडो नहीं
***
छंद सलिला: मनोरम छंद
*
लक्षण: समपाद मात्रिक छंद, जाति मानव, प्रति चरण मात्रा १४ मात्रा, चरणारंभ गुरु, चरणांत गुरु लघु लघु या लघु गुरु गुरु होता है.
लक्षण छंद:
हैं भुवन चौदह मनोहर
आदि गुरुवत पकड़ लो मग
अंत भय से बच हमेशा
लक्ष्य वर लो बढ़ाओ पग
उदाहरण:
१. साया भी साथ न देता
जाया भी साथ न देता
माया जब मन भरमाती
काया कब साथ निभाती
२. सत्य तज मत 'सलिल' भागो
कर्म कर फल तुम न माँगो
प्राप्य तुमको खुद मिलेगा
धर्म सच्चा समझ जागो
३. लो चलो अब तो बचाओ
देश को दल बेच खाते
नीति खो नेता सभी मिल
रिश्वतें ले जोड़ते धन
४. सांसदों तज मोह-माया
संसदीय परंपरा को
आज बदलो, लोक जोड़ो-
तंत्र को जन हेतु मोड़ो
२७-३-२०१४
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मुक्तिका
बात मन की कही खरी समझो
ये मुलाकात आखिरी समझो
चीखती है अगर टिटहरी तो
वाकई है बहुत डरी समझो
दोस्त ही कर रहे दगाबाजी
है तबीयत जरा हरी समझो
हमनशीं हमसफ़र मिली जो भी
ज़िंदगी भर उसे परी समझो
बात 'संजीव' की सुनो-मानो
ये न जुमला, न मसखरी समझो
२७-३-२०१३
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मुक्तिका
भावना बच पाए तो होली मने
भाव ना बढ़ पाएँ तो होली मने
*
काम ना मिल सके तो त्यौहार क्या
कामना हो पूर्ण तो होली मने
*
साधना की सिद्धि ही होली सखे!
साध ना पाए तो क्या होली मने?
*
वासना से दूर हो होली सदा
वास ना हो दूर तो होली मने
*
झाड़ ना काटो-जलाओ अब कभी
झाड़ना विद्वेष तो होली मने
*
लालना बृज का मिले तो मन खिले
लाल ना भटके तभी होली मने
*
साज ना छोड़े बजाना मन कभी
साजना हो साथ तो होली मने
***
२७-३-२०११
मुक्तिका
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नेताओं का शगल है, करना बहसें रोज.
बिन कारण परिणाम के, क्यों नाहक है खोज..
नारी माता भगिनी है, नारी संगिनी दिव्य.
सुता सखी भाभी बहू, नारी सचमुच भव्य..
शारद उमा रमा त्रयी, ज्ञान शक्ति श्री-खान.
नर से दो मात्रा अधिक, नारी महिमावान..
तैंतीस की बकवास का, केवल एक जवाब.
शत-प्रतिशत के योग्य वह, किन्तु न करे हिसाब..
देगा किसको कौन क्यों?, लेगा किससे कौन?
संसद में वे भौंकते, जिन्हें उचित है मौन..
२७-३-२०१०
*