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गुरुवार, 22 सितंबर 2016

muktak

मुक्तक
*
पता है लापता जिसका उसे सब खोजते हैं क्यों?
खिली कलियाँ सवेरे बाग़ में जा नोचते हैं क्यों?
चढ़ें मन्दिर में जाती सूख, खुश हो देवता कैसे?
कहो तो हाथ को अपने नहीं तुम रोकते हो क्यों?
*
हम चाहें तो सरकारों के किरदारों को झुकना होगा
हम चाहें तो आतंकों को पीठ दिखाकर मुडना होगा
कहे कारगिल हार न हिम्मत, टकरा जाना तूफानों से-
गोरखनाथ पुकार रहे हैं,अब दुश्मन को डरना होगा
*
मजा आता न गर तो कल्पना करता नहीं कोई
मजा आता न गर तो जगत में जीता नहीं कोई
मजे में कट गयी जो शुक्रिया उसका करों यारों-
मजा आता नहीं तो मौन हो मरता नहीं कोई
*
करो मत द्वंद, काटो फंद, रचकर छंद पल-पल में
न जो मति मंद, ले आनंद, सुनकर छंद पल-पल में
रसिक मन डूबकर रस में, बजाता बाँसुरी जब-जब
बने तन राधिका, सँग श्वास गोपी नाचें पल-पल में
*

मंगलवार, 20 सितंबर 2016

sansmaran

संस्मरण- 

लिखन बैठि जाकी सबिहि.............

डॉ. निशा तिवारी 
*
गत पैतींस -चालीस वर्षो से अपनी मॉ का चित्र बनाने का प्रयास कर रही हॅू। कल्पनाओं की रेखाओं को तो मैं कैनवास पर उकेर लेती हॅू किन्तु रंग? कभी हताशा, कभी पीड़ा, कभी धैर्य, कभी सहनशीलता, कभी रूदन, कभी हास्य, कभी सौन्दर्य ये अनेकानेक रंग मिलकर गड्ड-मड्ड होने लगते हैं और मेरे अन्दर की बालिका खीझकर सभी रंगों को कैनवास पर फैला देती है और चित्र बनाने की अक्षमता पर बिसूरती रहती है। 

ऐसा ही चित्र रीतिकाल के रससिद्ध कवि बिहारी की नायिका के अप्रतिम सौन्दर्य को अनेक चतुर चित्रकर गर्व के साथ उकेरने चले थे किन्तु उस सौन्दर्य को चित्र में बॉध नही पाये और उनका चित्रकार होने का गर्व चकनाचूर हो गया-चित्र नही बन सका।

लिखन बैठि जाकी सबिहि, गहि-गहि गरब गरूर।

भये ने केते जगत के, चतुर चितेरे कूर।।१ 

बिहारी ने चित्र न बन सकने का कोई कारण नहीं बताया शायद इसलिए कि ‘‘जिस काम में कितने ही चतुर चित्रकार बेवकूफ साबित हो चुके है, उसका कारण, शब्द चित्र द्वारा प्रकट करना भी कुछ वैसी ही बात होती। कारण कोई बहुत गूढ़ है। कितने ही चित्रकारों के बेवकूफ बनने में कारण भी कितने ही हो सकते हैं, उन सबके उल्लेख की गुंजाइश छोटे से दोहे में कहॉ?२ 

मेरे शब्द-चित्र न बन सकने का कारण बहुत सीधा और सरल है। सन् १९६४ में जब मैं एम.ए.में पढ़ती थी तब मेरी माँ ने मुझसे स्वतः के जीवन-संघर्षो पर उपन्यास लिखने की इच्छा प्रकट की थी। उस समय मैं उपन्यास पढ़ती थी लिखना तो बहुत दूर की बात थी। धीरे-धीरे अपने जीवन-चक्रों में व्यस्त हो गई। विवाह, प्राध्यापकीय-कार्य, पारिवारिक दायित्वों में इतनी उलझ गई कि लिखना जैसे मेरी अक्षमता ही सिद्ध हुई। १९९९ में मेरी मॉ दिवंगत हो गई और उनके जीवन संघर्षो की गाथा मेरी स्मृतियों में कौंधती रही। उनके जीवन में हास्य-उत्साह-प्रसन्नता के पल कम थे किन्तु उन्होंने अपनी घनीभूत पीड़ा पर प्रसन्नता का आवरण डाल रखा था। उनकी पीड़ा, उनके संघर्ष मेरे अन्तः मन को मथते रहते थे और मैंने आज उनका शब्द चित्र बनाने का संकल्प ले ही लिया। मेरे शब्द चित्रों को चाहे रेखा चित्र कहा जाये चाहे जीवनी या संस्मरण-चाहे मेरी मॉ की ओर से आत्मकथा लेकिन उपन्यास तो ये कदापि नही है। कुछ कथात्मक अंश होने के कारण वे लघु कहानी की विधा का भी स्पर्श कर सकते हैं।

१९७५ के आस-पास उत्तर आधुनिक विमर्शो का सिलसिला चल पड़ा था। फ्रांसुआ क्योतार ने उत्तर आधुनिक विचार-सरणि में महावृत्तान्तों के अन्त की बात कही थी। महावृत्तान्तों की समाप्ति पर उपजे शून्य में लघु-लघु वृत्तान्त लिखे जाने लगे थे। इधर मिशेल फूको और रोला बार्थ द्वारा लेखक की मृत्यु की घोषणा की जा चुकी थी। तभी आत्मकथाओं का उदय हुआ। अभय कुमार दुबे के अनुसार ‘‘आत्मकथा का मजा यह है कि वह उपन्यास कहे जाने के लिए स्वतंत्र न होकर भी अन्ततः एक उपन्यास ही है जिसके पृष्ठों पर रचनाकार के पात्रों की नहीं बल्कि उसकी इयत्ता (सेल्फ) का आविष्कार घटित होता है।३ 

बस इसी ‘सेल्फ’ की जो अभिव्यक्ति मेरी मॉ करना चाहती थीं, अभिव्यक्ति-कौशल के अभाव में मेरे माध्मय से पूर्ण करना चाहती थीं। ऐसा ‘सेल्फ’ जो प्रामाणिक था, यथार्थ था।

इस शब्द चित्र-लेखन का एक विशिष्ट पहलू भी है। उत्तर आधुनिक चिन्तन के दो महत्वपूर्ण संस्करण ‘नारी-विमर्श’ और दलित विमर्श हैं। इनका लेखन हाशियाकृत लोगों का लेखन था- ‘सबाल्टर्न’ की श्रेणी का लेखन। इनके लेखन को सार्व भौमिकता का खिताब नहीं मिल सकता था। क्योंकि इनका लेखन स्थानिकता तक सीमित था। इनकी समीक्षा पुराने शास्त्रीय औजारों से नहीं की जा सकती थी। इनकी समीक्षा के लिए नयी पद्धतियाँ आवश्यक थीं।

स्थानिकता के घेरे में बन्द होने के बाद भी मेरी माँ का शब्द-चित्र नारी सशक्तिकरण का अद्भुत दृष्टांत है। मेरी माँ के जीवन -काल में न तो कोई ‘नारीवादी संगठन’ था और न किसी ‘नारीवाद’ की धूम थी फिर भी उनके व्यक्तित्व में प्राचीन भारतीय आदर्श नारी चरित्रों का अद्भुत संश्लेषण था। किसी ‘नारी-मुक्ति-मोर्चा संगठन’ से भी वे परिचित नही थी। 

मेरी माँ की कथा को मैंने उनके द्वारा बताये गये संस्मरणों से जाना और उसके कुछ भागों की प्रत्यक्षदर्शी भी बनी। मेरी माँ बनने से पहले वे पत्नी थीं और उसके पहले वे बेटी थीं। कात्यायनी की ‘चम्पा’ की भाँति मेरी माँ कमला भी सात भाइयों (चचेरे-फुफेरे) के बीच सयानी, बहुत बड़े मैथिल ब्राम्हण जमीदार परिवार में मण्डला (म.प्र.) में पैदा हुईं। सबकी लाड़ली किन्तु डेढ़ वर्ष की उम्र में माँ का साया छिन गया। पिता ने दूसरा विवाह किया और विमाता के मोह पाश में बँधे रहे। माँ का प्यार उन्हें अपनी आजी से मिला। मातृहीनता उनके दुर्भाग्य का पहला पाठ था। अपने पिता के परिवार में ‘चम्पा’ की तरह न तो वे ओखली में कूटी गई, न कूड़े में फेंकी गईं किन्तु विवाह होते ही उनके दुर्भाग्य का दूसरा पाठ प्रारंभ हुआ।

माँ के बड़े भाई बनारस हिन्दू यूनिर्वसिटी में उच्च शिक्षा के लिये गये थे। वहीं मेरे पिताजी उत्तर प्रदेश के जिला बस्ती, बाँसी तहसील, ग्राम आमा माफी से स्नातक कक्षा में पढ़ने के लिए आए थे। मेरे दादा जी की अटठाईस गाँव की जमींदारी थी। गुरू घराना था। घर क्या हवेली थी। घर में हाथी बँधता था। आजा की मृत्यु उस समय हो गई थी जब मेरी आजी तीस वर्ष की थीं और मेरे बाबूजी एक माह के थे। बाबूजी के चार भाई और तीन बहनें थीं। बाबूजी सबसे छोटे चौथे भाई थे। युवा होने पर जमींदारी की ठसक थीं- एक ओर तो भाई लोग चेलाहीं करने जाते थे और दूसरी और घुड़सवारी कर किसानों से लगान वसूली करने। इधर मेरी माँ पन्द्रह वर्ष की हो चली थीं। बाबूजी उच्च कुलीन मैथिल ब्राम्हण परिवार के थे। मामाजी जयदेव झा बहुत सुन्दर थे और मेरी माँ उनकी कार्बन कॉपी। मामाजी की मध्यस्थता से माँ-बाबूजी १९३६ में विवाह-बन्धन में बंध गये। माँ का गौना सोलह वर्ष की उम्र में किया गया। माँ के माता-पिता तो उदासीन थे पर कक्काजी ने विदा के समय आशीर्वाद दिया-‘‘कमला तुम्हे सोने में सुहागा दिया है। एक तो दामाद बहुत अमीर और दूसरे ग्रेजुएट।’’ परन्तु माँ को नहीं ज्ञात था। कि अमीरी और उनकी डिग्री उनके अहंकार को और अधिक घनीभूत करती थीं। 

एक पन्द्रह वर्षीया मातृहीना किशोरी के मन में पतिगृह से जिस प्रेम की अपेक्षा थी वह प्रकारान्तरित रूप में उन्हें मिली। पिताजी का परिवार एक पितृसत्तात्मक रूढ़िवादी परिवार था। बाबूजी के रक्त में जमींदार की क्रूरता प्रवाहित होती थी। अम्मा से उत्कट प्रेम ने बाबूजी के मन में एक उन्माद का रूप धारण कर लिया था। और यह उन्माद पत्नी पर एकाधिकार पाने की लालसा में एक सन्देही प्रवृत्ति को भी जन्म दे रहा था। आठ-दस गाँवों के बीच मात्र बाबूजी ही अंग्रेजी पढ़े लिखे स्नातक थे। तब तार इत्यादि अंग्रेजी में ही भेजे जाते थे। अतः, अन्य गाँवों के लोग दूर दूर से उनसे तार पढवाने और उसका अर्थ जानने के लिए उनके पास आते थे। शिक्षा मनुष्य को विनम्र बनाती है किन्तु बाबूजी की शिक्षा मानो उनके स्वाभिमान की सीमा को तोड़कर उन्हें निरंतर अहंकारी बनाती जा रही थी। जमींदार की क्रूरता, अहंकार और सन्देही प्रकृति क्रमशः अत्याचार में पर्यवसित होने लगी। 

इस बीच १९३८ में मेरी बड़ी बहिन सुनीता, बड़े भाई राजेन्द्र (मन्नू) का १९४२ में और मेरा १९४४ में जन्म हो चुका था। गाँव में न तो कोई स्कूल था और न चिकित्सालय। दीदी का लिवर बढ़ने और भैया को सूखा-रोग की शिकायत हुई तथा वे दोनों चिकित्सा के अभाव में मौत के मुँह से निकलकर आये थे। अम्मा के भतीजे-भतीजियाँ उनके पीहर मण्डला म.प्र. में स्कूल जाने लगे थे। माँ बाबूजी से जब दीदी और भैया को पढ़ाने-लिखाने की बात करतीं तो सदा यहीं उत्तर मिलता- ‘‘मन्नू को जिला बस्ती में रखकर लॉ करवाएंगें। लड़कियों को पढ़ने की क्या आवश्यकता? उनका अच्छे अमीर उच्च कुलीन घराने में विवाह कर देगें।’’यदि माँ जिद करती तो उन्हें प्रताड़ित किया जाता। प्रताड़ना का एक कारण बाबूजी की संदेही प्रवृत्ति भी थी। किसी रिश्तेदार या हरवाह पुरूषों से बात-चीत करने पर उन्हें दण्ड स्वरूप मार झेलनी पड़ती। मेरी तो स्मृति में वह दृश्य आज भी जीवित है जब बाबूजी की मार से उनकी चूड़ियां टूट गईं थी और उनके हाथ से टप-टप खून बह रहा था। इन सब अत्याचारों के बीच मात्र आजी की सहानुभूति अम्मा के साथ थी। उनका रूढ़िवादी मन भी बाबूजी के अत्याचारों से द्रवित हो जाता था। अत्याचार जब सहनशीलता को चुनौती दे रहे थे तब एक बार वे रात्रि के अंधकार में आत्म हत्या करने के उद्देश्य से हवेली के बाहर के कुएॅं की जगत पर पैर लटकाकर बैठी थीं। जीवन और मृत्यु का द्वन्द्व उनके मन में चल रहा था। तभी संयोग से आजी लालटेन लेकर वहाँ उन्हें खोजती हुई पहुॅच गईं समझाया- ‘‘अपने बच्चों को देखों तुम्हें अपने लिए नहीं अपनी सन्तानों के लिए जीना है। कायरता छोड़ो और घर के अन्दर चलो।’’ 

स्त्री की मातृत्व शक्ति अन्य सभी संबंधों में उच्चतम है इसी शक्ति की प्रेरणा से उन्होंने आत्म-हत्या का विचार सदा के लिए त्याग दिया। उस समय तक सही माने में माँ को जीने की कला नहीं आती थी। स्त्री-पुरूष में वैचारिक और भावनात्मक संतुलन न होने से ही ऐसी विषम स्थितियां निर्मित होती है। महादेवी वर्मा के अनुसार ‘‘हमारे समाज में अपने स्वार्थ के कारण पुरूष मनुष्यता का कलंक है और स्त्री अपनी अज्ञानमय निस्पन्द सहिष्णुता के कारण पाषाण सी उपेक्षणीय .......।’’४ 

धीरे-धीरे माँ निस्पन्द सहिष्णुता से उबर चलीं। उन्होंने आतंरिक शक्ति संचित की और अपनी असहायता, निरीहता, दुर्बलता, हीनता को त्याग कर मूक, विनम्र क्रांति की भूमिका निर्मित करने लगीं। सर्वप्रथम उन्होंने नानाजी को पत्र लिखकर अपनी व्यथा बतलाई तथा इस कूपमण्डूकता से निकालने का आग्रह किया। उनका प्राथमिक लक्ष्य था- बच्चों को शिक्षित करना। यह बात सन् १९४८ की है। मैं उस समय चार वर्ष की थी। नाना जी ने माँ के आग्रह को अस्वीकार कर उसी रूढ़िवादिता का परिचय दिया-’’ बेटी की अरथी ही ससुराल से वापिस आती है।’’ माँ ने हिम्मत नहीं हारी और पुनः अपने फुफेरे वकील भाई को पत्र लिखकर बहिन का ऋण उतारने हेतु निवेदन किया। आश्चर्य होता है कि मूक पशु की भॉंति अत्याचार सहने वाली स्त्री के मन में अत्याचार के विरूद्ध मौन विद्रोह का साहस उत्पन्न हुआ। इस संदर्भ में महादेवी वर्मा का ‘सुभद्रा कुमारी चौहान’ के संस्मरण में सुभद्रा कुमारी चौहान का ही कथन बड़ा सटीक प्रतीत होता है- ‘‘परम्परा का पालन ही जब स्त्री का परम कर्त्तव्य समझा जाता था तब वे (सुभद्रा कुमारी चौहान) उसे तोड़ने की भूमिका
बाँधती हैं, चिर प्रचलित रूढ़ियों और चिर-संचित विश्वासों को आघात पहॅुचाने वाली हलचलों को हम देखना सुनना नहीं चाहते। हम ऐसी हलचलों को अधर्म समझकर उनके प्रति आँख मीच लेना उचित समझते हैं, किन्तु ऐसा करने से काम नहीं चलता। वह हलचल और क्रांति हमें बरबस झकझोरती है और बिना होश में लाये नहीं छोड़ती।’’५ 

मामाजी को आमा माफी से हम सबों को ले जाने के लिए बुलाना क्रांति अथवा हलचल का प्रथम स्फुरण था। इसे पलायन नहीं कहा जा सकता क्योंकि अत्याचारों से घबराकर भागना उनका उद्देश्य नहीं था वरन् अपने बच्चों को शिक्षित करना ही एक अप्रत्यक्ष और प्राथमिक कर्तव्य वे समझती थीं। मामाजी आ गए किन्तु बाबूजी के चंगुल से हम सबको निकालकर ले जाना अत्यंत दुष्कर कार्य था। सास-बहू की प्रतिद्वन्द्विता जगत् प्रसिद्ध है किन्तु हमारी आजी का नारीत्व जाग उठा और उन्होंने उपाय सुझाया-‘‘जब यदुनंदन बाबू फारिग होने खेत पर जायेगें तब तुम लोग निकल जाना। आमा की सीमा पर भरत पहलवान (हरवाह) डंडा लिए खड़ा रहेगा और उन्हें रोककर रखेगा।’’ ऐसा ही हुआ। भरत पहलवान के डंडे से डरकर बाबूजी वापिस घर आ गए और हम सबको मामाजी मंडला की ओर ले चले।

मंडला में नानाजी का बहुत बड़ा मकान था। तब संयुक्त परिवार हुआ करते थे। अम्मा की विमाता यानी हमारी सौतेली नानी हमें देखकर बहुत अप्रसन्न हुईं- ‘‘आ गई छाती पर मूंग दलने। ऐसे कभी कोई विवाहिता बेटी अपना घर-द्वार छोड़ती है भला?’’ माँ बहुत स्वाभिमानी थीं। पितृ गृह में बोझ बनकर नहीं रहना चाहती थी। शिक्षा के नाम पर चौथी कक्षा उत्तीर्ण थीं सो सातवीं की परीक्षा उत्तीर्ण करने हेतु अध्ययन में जुट गईं। मामा वगैरः बहुत पढ़े लिखे थे।  अतः, माँ को सातवीं उत्तीर्ण करने में कोई कठिनाई नही हुई। यथा समय यथोचित कक्षा में हम तीनों भाई बहिनों को स्कूल में प्रवेश दिया गया। आजीविका के लिए अम्मा स्कूल- शिक्षिका बनना चाहती थीं। नानाजी ने इसका प्रबल विरोध किया क्योंकि बेटी के नौकरी करने से उनकी प्रतिष्ठा को बट्टा लग सकता था। नानाजी के इष्ट मित्रों के समझाने पर अन्ततः उन्होंने स्वीकृति दे दी और अम्मा नगर पालिका स्कूल में रू. ४९.०० मासिक वेतन पर शिक्षिका नियुक्त हुईं। वह भी गर्मी की दो माह की छुट्टियों में उन्हें अवैतनिक कर दिया जाता था। इससे मुक्ति पाने के लिए उन्होंने जबलपुर (म.प्र.) में दो वर्ष की नार्मल टेंनिंग ली। पश्चात् मंडला की शासकीय शाला में उनकी नियुक्ति हो गई। आर्थिक निर्भरता आ जाने से अम्मा की विमाता भी सारी कटुता भूलकर सामान्य हो गईं।

हमारे बाबूजी का उत्कट प्यार उन्हें हमारे समीप खींच लाता था किन्तु अब वैसी क्रूरता भी उनमें शेष नहीं रह गई थी। यों भी अम्मा को मामाजी लोगों का संरक्षण प्राप्त था। अतः, वे मारपीट तो क्या गाली-गलौच का भी दुस्साहस नही कर सकते थे। जब भी एकान्त मिलता वे गॉंव लौट जाने का अनुनय-विनय करते किन्तु माँ में न जाने कैसी आत्म शक्ति जाग्रत हो गई थी कि अपनी सन्तानों की शिक्षा और अपनी आर्थिक स्वतंत्रता से परे जाकर गॉव की समृद्धि से कभी साक्षात न कर पाईं। एक बार अन्ध कूप से निकलकर उसमें पुनः गिर जाना उन्हें कदापि स्वीकार नहीं था।

माँ अपने स्वाभिमान और स्वतंत्र व्यक्तित्व-रक्षा तथा अस्मिता की खातिर अलग किराये के मकान में रहने लगीं। उस समय उनका वेतन मात्र अस्सी रूपये था। चूंकि बाबूजी जमीन-जायदाद का मोह छोड़कर हमारे साथ रहने लगे थे.  अतः, उसकी देखरेख बड़का दादा (सबसे बडे़ ताऊ) करने लगे थे। आवयकता पड़ने पर हमारी फीस-पुस्तकें तथा वर्ष भर के अनाज-संग्रहण के लिए वे आर्थिक सहायता कर देते थे। हमारी बड़ी दीदी सुनीता को आत्म-निर्भर बनाने की दृष्टि से मैटिंक उत्तीर्ण करने के उपरांत मांटेसरी की टेंनिंग दिला दी गई थी। बडे़ भैया राजेन्द्र किशोर हो गए थे।  उनके शारीरिक बल के सामने बाबूजी किसी भी प्रकार के अत्याचार की हिमाकत नहीं कर सकते थे। यहॉ पर भी बाबूजी का गॉव ले जाने का अनुरोध पूरा नहीं हुआ।

मई १९५८ में मेरे छोटे भाई अरविंद का जन्म हुआ। आर्थिक अभावों और संघर्षो का उसे कोई भान नहीं था। उसके बडे़ होने तक हम तीनों भाई-बहिन नौकरी करने लगे थे। अरविन्द की उच्च शिक्षा में कोई कठिनाई नहीं हुई। मैं महाविद्यालय में व्याख्याता हो चुकी थी और मेरा विवाह भी हो चुका था। अरविंद की उच्च शिक्षा हेतु आर्थिक सहायता के लिए मेरे ससुराल वालों ने विशेषतः मेरे पति डॉ. पवन कुमार तिवारी ने प्रोत्साहित किया। पश्चात् पी.एच.डी. फार्मेसी के लिए उसे फैलोशिप भी मिली।

इधर १९६० में मध्यप्रदेश के मण्डला जिले के एक गॉंव में मैथिल ब्राम्हण परिवार के एक शिक्षक कमलाकांत झा से दीदी का विवाह निश्चित हो गया। विवाह के लिए रूपये तो थे नहीं अतः अम्मा ने अपने हिस्से की सम्पत्ति से उनका विवाह सम्पन्न करने के लिए बड़का दादा (पीताम्बर नाथ) को पत्र लिखा। उन्होंने स्वीकृति तो दे दी किन्तु इस शर्त के साथ कि विवाह आमा-माफी से ही करेगें। अम्मा चिन्ता में पड़ गईं कि वहॉ से वापिस कैसे आएंगी? अगर नहीं आने दिया गया तो भविष्य क्या होगा। उन्होंने बड़का दादा से वापिस भेजने का वचन मॉंगा और उन्होंने वचन दे भी दिया। ग्रीष्मकालीन अवकाश में दीदी का विवाह सम्पन्न हो गया। बाबूजी की तो जैसे रीढ़ की हड्डी ही टूट गई थी। हमारे साथ गॉंव गए और विवाह सम्पन्न होने पर हमारे साथ ही मण्डला वापिस आ गए।

माँ सादगी की प्रतिमूर्ति थी और भारतीय संस्कृति की संवाहक। वेशभूषा पारंपरिक यू.पी.और म.प्र. की। व्यक्तिगत पीड़ा और दुःख मानों उनकी हास्यमय और विनोदी प्रकृति में परिवर्तित हो गये थे। परिस्थितियॉं कभी-कभी मनुष्य को ईर्ष्यालु और परपीड़क बना देती है। परन्तु माँ के साथ ऐसा नही था। सदैव प्रसन्न रहना और सबको हॅसाना। दूसरों को हॅसाना उनके दुःख का उदात्तीकरण था। इस संदर्भ में मुझे प्रसाद की कामायनी की पंक्तियॉं स्मरण आती है-

औरों को हॅंसते देखों, मनु, हॅसों और सुख पाओं।

अपने सुख को विस्तृत कर, औरों को सुखी बनाओं।७ 

१९७० में बाबूजी की मृत्यु के पश्चात् उन्होंने जैसे बाबूजी के प्रेम को राम की प्रेमल भक्ति में उदात्तीकृत कर लिया। प्रेमल भक्ति व्यंजक का प्रयोग मैंने विशेष कारण से किया है। राम मर्यादा पुरूषोत्तम है एक पत्नीव्रती। राम की तुलना में कृष्ण प्रेमल है- असंख्य रानियॉं हैं और अनगिनत गोपिकाओं के प्रियतम। माँ सभी देवी-देवताओं को पूजती थीं- पारिवारिक परंपरागत सभी धर्म-कर्म का निर्वाह करती थीं किन्तु उनके प्रियतम तो राम ही थे।

माँ ने घर और बाहर के बीच अद्भुत सामंजस्य रखा था। उन जैसी नारियों के लिए ही जैसे महादेवी वर्मा ने लिखा है- ‘‘यह अब तक प्रत्यक्ष हो चुका है कि वह (स्त्री) अपनी कोमल भावनाओं को जीवित रखकर भी कठिन से कठिन उत्तरदायित्व का निर्वाह कर सकती है और दुर्वह से दुर्वह कर्तव्य का पालन कर सकती है और दुर्गम से दुर्गम कर्म-क्षेत्र में ठहर सकती है।’’७ 

माँ परम्परागत भारतीय संस्कृति की उपासिका थी। परिधान और रहन-सहन पुराने थे किन्तु उनके विचार अत्यंत आधुनिक थे। उस समय मंडला में एक घटना घटी थी। हमारे मैथिल समाज की कन्या के साथ बिहार के एक परिवार ने छल किया था। स्वयं को अमेरिका में व्यवसायी बताकर विवाह किया जबकि उसका कोई वजूद नहीं था। लडकी एक मास ससुराल में रहकर लौट आई।  ऐसी छली गई लड़की से भी मेरे भैया राजेन्द्र का विवाह करने के लिए माँ तैयार हो गईं थी। ऐसा सम्बन्ध करने के लिए लड़की वालों से पहल भी उन्होंने की थी। बात चाहे आगे नहीं बन पाई किन्तु माँ की आधुनिक सोच पर तो गर्व करना ही होगा।

एक अन्य मार्मिक प्रसंग को मैं कभी विस्मृत नहीं कर सकती। सन् १९९८ की बात है। मेरे बडे़ भैया राजेन्द्र की मधुमेह के कारण दोनों किडनियॉं खराब हो चुकी थीं। वे जबलपुर के एक अस्पताल में डायलिसिस के लिए एडमिट थे। मेरी भाभी भी शासकीय स्कूल में शिक्षिका थीं। ऋण लेकर डायलिसिस करा रही थीं। माँ गंभीर गठिया रोग से ग्रस्त थीं। माँ ने भाभी से कहा ‘‘बहू अपने बच्चों का मुँह मत पोछो। राजेन्द्र कभी ठीक नहीं होगें’’। भाभी इसके बाद भी इलाज में कमी नहीं कर रही थीं किन्तु भैया ने ही आगे डायलिसिस कराने से इंकार कर दिया और घर लौटने के लिए जिद करने लगे।  अतः, मंडला के ही अस्पताल में उन्हें भरती किया गया। एक माह बाद २३ जनवरी १९९८ को उनका देहावसान हो गया। इस प्रसंग का उल्लेख इसलिए आवश्यक था कि माँ का सन्तान-प्रेम व्यावहारिक धरातल पर कमजोर पड़ गया और भैया के पुत्रों तथा भाभी का भविष्य अधिक सबल हो गया था। भैया की मृत्यु का उन्हें इतना गहरा आघात लगा कि ठीक एक वर्ष बाद १९९९ में उनका स्वर्गवास हो गया। ऐसे न जाने कितने प्रसंग है जिन्होंने मेरी दृष्टि में उन्हें भगवान से भी ऊँचा दर्जा दिया है। उनका कोई स्मारक तो नहीं बन सकता था किन्तु मेरे हृदय के स्मारक में उनकी स्मृति अमिट रूप से विद्यमान है। नारी सशक्तिकरण का ऐसा दृष्टांत अत्यंत विरल है।

यों अनगिनत माताएँ और नारियाँ होंगी जिन्होंने अपने त्याग, बलिदान, क्रांति द्वारा नारी सशक्तिकरण का परिचय दिया होगा। ऐसी जानकारियाँ हमें मीडिया से भी मिलती हैं। ये जानकारियाँ भी हमें विचलित और आन्दोलित करती हैं परन्तु मेरी माँ से मेरा जो शारीरिक-मानसिक-भावनात्मक जुड़ाव था- क्षण-क्षण यथार्थ को प्रतिच्छायित करता, माँ के ‘सेल्फ’ को प्रतिबिम्बित करता-यह तो अन्य के साथ नहीं हो सकता न? मैंने पाठ को विशिष्ट के माध्यम से सामान्यीकृत, वैयक्तिक के माध्यम से समाजीकृत करने का प्रयास किया है।

यह पूर्व में ही कहा जा चुका है कि अपने पाठ के लिए मैंने किसी विशेष विधा का चयन नही किया है। यदि उत्तर आधुनिक पाठ की बात करें तो कहा जा सकता है कि मैंने विधाओं का विखण्डन किया है। मेरी लेखनी मेरी ऊंगली पकड़कर जहॉ-जहॉ ले गई मैं वहॉ-वहॉ गतिशील होती रही। भावनाओं को विधा की लगाम से नियंत्रित नही किया जा सकता। मैं अपने लेखन के समर्थन में प्रतिष्ठित रचनाकार व सामाजिक कायर्कर्ता सुधा अरोड़ा से सुपरिचित पत्रकार निर्मला डोसी की बातचीत के अंश का उल्लेख करना चाहती हॅू- ‘‘पिछले साल उनकी (सुधा अरोड़ा की) एक अलग तरह की किताब आई थीं। उसमें आलेख, कहानियॉं, वक्तत्व, कविताओं के टुकडे़ तथा कहानियों पर छोटी-छोटी टिप्पणियॉं हैं अर्थात् लेखन की अनेक विधाओं को एक साथ सॅजोकर उन्होंने पुस्तक के नाम को सार्थक स्वरूप दिया है। ‘एक औरत की नोटबुक’-यही नाम है उनकी नई किताब का। अपनी डायरी या नोट बुक में जब कोई लिखता है तो उसके सामने विधा की कोई पूर्व योजना नही रहती। जैसा मन हुआ, विषय हुआ, भाव उपजे और शब्दों का रूप धरकर कलम की नोक पर आ बैठे। उन्हें विशेष सजाने-सॅवारने में सहज प्रवाह अवरूद्ध हो सकता है, लिहाजा अपने सद्यः प्रसूत निर्दोष स्वरूप में वे अधिक प्रभावी व प्रामाणिक प्रतीत होते हैं।’’८ 

मेरे पाठ के अनेक विखंडनात्मक पाठ हो सकते हैं। उनका सदैव स्वागत रहेगा।

संदर्भः-

१. बिहारी सतसई- दोहा क्रमांक-५३४ 

२. बिहारी सतसईः तुलनात्मक अध्ययन पभसिंह शर्मा पंचम संस्करण-पृष्ठ-७७ 

३. तद्भव-अंक 16, जुलाई 07- पृष्ठ 34- नारीवाद की हिन्दी कथा लेख-अभय कुमार दुबे

४. श्रृंखला की कड़ियाँ-महादेवी वर्मा-सप्तम संस्करण पृष्ठ-१५९ 

५. पथ के साथी-महादेवी वर्मा-स्व सुभद्रा कुमारी चौहान संस्मरण क्रमांक-दो-पृष्ठ-६०-तृतीय संस्करण-संवत् २०२३ वि.

६. कामायनी- कर्म सर्ग-जयशंकर प्रसाद-पृष्ठ-१४० चतुर्दश आवृत्ति-सं. २०२५ वि.

७. श्रृंखला की कड़ियाँ-महादेवी वर्मा- पृष्ठ ६४, पृष्ठ ५ 

८. प्रकाशन समाचार-वर्ष ६४ अंक ८ अगस्त २०१६- पृष्ठ-९ राजकमल प्रकाशन समूह

पता

डॉ. निशा तिवारी

६५०, नेपियर टाउन,

भॅवरताल पानी की टंकी के सामने,

जबलपुर -४८२००१ 

मो. ९४२५३८६२३४  

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एक नव गीत :
उत्सव का मौसम.....
संजीव 'सलिल'
*
तुम मुस्काईं जिस पल
उस पल उत्सव का मौसम.....
*
लगे दिहाड़ी पर हम
जैसे कितने ही मजदूर.
गीत रच रहे मिलन-विरह के
आँखें रहते सूर..
नयन नयन से मिले झुके
उठ मिले मिट गया गम.
तुम शर्माईं जिस पल
उस पल उत्सव का मौसम.....
*
देखे फिर दिखलाये
एक दूजे को सपन सलोने.
बिना तुम्हारे छुए लग रहे
हर पकवान अलोने..
स्वेद-सिंधु में नहा लगी
हर नेह-नर्मदा नम.
तुम अकुलाईं जिस पल
उस पल उत्सव का मौसम.....
*
कंडे थाप हाथ गुबरीले
सुना रहे थे फगुआ.
नयन नशीले दीपित
मना रहे दीवाली अगुआ..
गाल गुलाबी 'वैलेंटाइन
डे' की गाते सरगम.
तुम भरमाईं जिस पल
उस पल उत्सव का मौसम.....


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सोमवार, 19 सितंबर 2016

samiksha

पुस्तक चर्चा -
वर्तमान युग का नया चेहरा: 'काल है संक्रांति का'
समीक्षक: डॉ. निशा तिवारी 
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[पुस्तक विवरण- काल है संक्रांति का, गीत-नवगीत संग्रह, आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', वर्ष २०१६, आवरण बहुरँगी, आकार डिमाई, पृष्ठ १२८, मूल्य सजिल्द ३००/-, पेपरबैक २००/-, समन्वय प्रकाशन, २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, ०७६१२४१११३१, गीतकार संपर्क- ९४२५१८३२४४, salil.sanjiv@gmail.com
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'काल है संक्रांति का' संजीव वर्मा 'सलिल' का २०१६ में प्रकाशित नवीन काव्य संग्रह है।  वे पेशे से अभियंता रहे हैं। किन्तु उनकी सर्जक प्रतिभा उर्वर रही है। सर्जना कभी किसी अनुशासन में आबद्ध नहीं रह सकती।  सर्जक की अंत:प्रज्ञा (भारतीय काव्य शास्त्र में 'प्रतिभा' काव्य शास्त्र हेतु), संवेदनशीलता, भावाकुलता और कल्पना किसी विशिष्ट अनुशासन में बद्ध न होकर उन्मुक्त उड़ान भरती हुई कविता में निःसृत होती है। यही 'सलिल जी' की सर्जन-धर्मिता है। यद्यपि उनके मूल अनुशासन का प्रतिबिम्ब भी कहीं-कहीं झलककर कविता को एक नया ही रूप प्रदान करता है। भौतिकी की 'नैनो-पीको' सिद्धांतिकी जिस सूक्ष्मता से समूह-क्रिया को संपादित करती है, वह सलिल जी के गीतों में दिखाई देती है। उत्तर आधुनिक वैचारिकी के अन्तर्गत जिस झंडी-खण्ड चेतना का रूपायन सम-सामयिक साहित्य में हो रहा है वही चिन्तना सलिल जी के गीतों में सांस्कृतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, राजनीतिक, साहित्यिक विसंगतियों के रूप में ढलकर आई है- रचनाकार की दृष्टि में यही संक्रांति का काल है। संप्रति नवलेखन में 'काल' नहीं वरन 'स्पेस' को प्रमुखता मिली है। 

                      शब्दों की परंपरा अथवा उसके इतिहास के बदले व्यंजकों के स्थगन की परिपाटी चल पड़ी है। सलिल जी भी कतिपय गीतों में पुराने व्यंजकों को विखण्डित कर नए व्यंजकों की तलाश करते हैं।  उनका सबसे प्रिय 'व्यंजक' सूर्य है। उनहोंने सूर्य के 'आलोक' के परंपरागत अर्थ 'जागरण' को ग्रहण करते हुए भी उसे नए व्यंजक का रूप प्रदान किया है।  'उठो सूरज' गीत में उसे साँझ के लौटने के संदर्भ में 'झुको सूरज! विदा देकर / हम करें स्वागत तुम्हारा' तथा 'हँसों सूर्य भाता है / खेकर अच्छे दिन', 'आओ भी सूरज! / छँट गए हैं फुट के बदल / पतंगें एकता की मिल उड़ाओ। / गाओ भी सूरज!', 'सूरज बबुआ! / चल स्कूल। ', 'हनु हुआ घायल मगर / वरदान तुमने दिए सूरज!', 'खों-खों करते / बादल बब्बा / तापें सूरज सिगड़ी' इत्यादि व्यंजक  सूरज को नव्यता प्रदान करते हैं, यद्यपि कवि का परंपरागत मन सूरज को 'तिमिर-विनाशक' के रूप में ही ग्रहण करता है।  

                      कवि का परंपरागत मन अपने गीतों में शास्त्रीय लक्षण ग्रन्थों के मंगलाचरण के अभियोजन को भी विस्मृत नहीं कर पाता। मंगलाचरण के रूप में वह सर्वप्रथम हिंदी जाति की उपजाति 'कायसिहों' के आराध्य 'चित्रगुप्त जी' की वंदना करता है।  यों भी चित्रगुप्त जी मनुष्य जाति के कर्मों का लेखा-जोखा रखनेवाले देवता हैं। ऐसा माना जाता है कि उत्तर आधुनिक युग में धर्मनिरपेक्षता का तत्व प्रबल है- कवि की इस वन्दना में चित्रगुप्त जी को शिव, ब्रम्हा, कृष्ण, पैग़ंबर, ईसा, गुरु नानक इत्यादि विभिन्न धर्मों के ईश्वर का रूप देकर सर्वधर्म समभाव का परिचय दिया गया है।  चित्रगुप्त जी की वन्दना में भी कवि का प्रिय व्यंजक सूर्य उभरकर आया है - 'तिमिर मिटाने / अरुणागत हम / द्वार तिहरे आए।' 

                       कला-साहित्य की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती की अभ्यर्थना में कवि ने एक नवीन व्यंजना करते हुए ज्ञान-विज्ञान-संगीत के अतिरिक्त काव्यशास्त्र के समस्त उपादानों की याचना की है और सरस्वती माँ की कृपा प्राप्त प्राप्त करने हेतु एक नए और प्रासंगिक व्यंजक की कल्पना की है- 'हिंदी हो भावी जगवाणी / जय-जय वीणापाणी।' विश्वभाषा के रूप में हिंदी भाषा की यह कल्पना हिंदी भाषा के प्रति अपूर्व सम्मान की द्योतक है।  

                      हिन्दू धर्म में प्रत्येक मांगलिक कार्य के पूर्व अपने पुरखों का आशिर्वाद लिया जाता है।  पितृ पक्ष में तो पितरों के तर्पण द्वारा उनके प्रति श्रद्धा प्रगट की जाती है। गीत-सृजन को अत्यंत शुभ एवं मांगलिक कर्म मानते हुए कवि ने पुरखों के प्रति यही श्रद्धा व्यक्त की है।  इस श्रद्धा भाव में भी एक नवीन संयोजन है- 'गीत, अगीत, प्रगीत न जानें / अशुभ भुला, शुभ को पहचानें / मिटा दूरियाँ, गले लगाना / नव रचनाकारों को ठानें कलश नहीं, आधार बन सकें / भू हो हिंदी-धाम।  / सुमिर लें पुरखों को हम / आओ! करें प्रणाम।' कवि अपनी सीमाओं को पहचानता है, सर्जना का दंभ उसमें नहीं है और न ही कोई दैन्य है।  वह तो पुरखों का आशीर्वाद प्राप्त कर केवल हिंदी को विश्व भाषा बनाने का स्वप्न पूरा करना चाहता है। यदि चित्रगुप्त भगवान की,  देवी सरस्वती की और पुरखों की कृपा रही तो हिंदी राष्ट्रभाषा तो क्या, विश्व भाषा बनकर रहेगी।  सलिल जी के निज भाषा-प्रेम उनके मंगलाचरण अथवा अभ्यर्थना का चरम परिपाक है। 

                      उनकी समर्पण कविता इस दृष्टि से उल्लेखनीय है कि  उनहोंने उसमें रक्षाबन्धन पर्व की एक सामान्यीकृत अभिव्यंजना की है। बहिनों के प्रत्येक नाम संज्ञा से विशेषण में परिवर्तित हो गए हैं और रक्षासूत्र बाँधने की प्रत्येक प्रक्रिया, आशाओं का मधुवन बन गयी है। मनुष्य और प्रकृति का यह एकीकरण पर्यावरणीय सौंदर्य को इंगित करता है।  'उठो पाखी' कविता में भी राखी बाँधने की प्रक्रिया प्रकृति से तदाकार हो गयी है।  

                      कविता मात्र वैयक्तिक भावोद्गार नहीं है, उसका सामाजिक सरोकार भी होता है। कभी-कभी कवि की चेतना सामाजिक विसंगति से पीड़ित और क्षुब्ध होकर सामाजिक हस्तक्षेपभी करती है। श्री कान्त वर्मा ने आलोचना को 'सामाजिक हस्तक्षेप' कहा है।  मेरी दृष्टि में कविता भी यदा-कदा सामाजिक हस्तक्षेप हुआ करती है।  प्रतिबद्ध कवि में तो यह हस्तक्षेप निरन्तर बना रहता है।  कवि सलिल ने राजनैतिक गुटबाजी, नेताओं  अफसरों की अर्थ-लोलुपता, पेशावर के न्र पिशाचों की दहशतगर्दी, आतंकवाद का घिनौना कृत्य, पाक की नापाकी, लोकतंत्र का स्वार्थतंत्र में परिवर्तन, अत्याचार और अनाचार के प्रति जनता का मौन,नेताओं की गैर जिम्मेदारी, स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद भी राजनीतिक कुतंत्र में वास्तविक आज़ादी प्राप्त न कर पाना इत्यादि कुचक्रों पर गीत लिखकर अपनी कृति को 'काल है संक्रांति का' नाम दिया है।  वास्तव में देश की ये विसंगतियाँ संक्रमण को सार्थक बनाती हैं किन्तु उनके गीत 'संक्रांति काल है' -में  संक्रांति का संकेत भर है तथा उससे निबटने के लिए कवी ने प्रेरित भी किया है।  यों भी छोटे से गीत के लघु कलेवर में विसंगति के विस्तार को वाणी नहीं दी जा सकती।  कवि तो विशालता में से एक चरम और मार्मिक क्षण को ही चुनता है। सलिल ने भी इस कविता में एक प्रभावी क्षण को चुना है।  वह क्षण प्रभावोत्पादक है या नहीं, उसकी चिंता वे नहीं करते।  वे प्रतिबद्ध कवु न होकर भी एक सजग औए सचेत कवि हैं।  

                      सलिल जी ने काव्य की अपनी इस विधा को गीत-नवगीत कहा है।  एक समय निराला ने छंदात्मक रचना के प्रति विद्रोह करते हुए मुक्त छंद की वकालत की थी लेकिन उनका मुक्त छंद लय और प्रवाह से एक मनोरम गीत-सृष्टि करता था।  संप्रति कविताएँ मुक्त छंद में लिखी जा रही हैं किन्तु उनमें वह लयात्मकता नहीं है जो जो उसे संगीतात्मक बना सके।  ऐसी कवितायेँ बमुश्किल कण्ठस्थ होती हैं।  सलिल जी ने वर्तमान लीक से हटकर छंदात्मक गीत लिखे हैं तथा सुविधा के लिए टीप में उन छंदों के नाम भी बताए हैं।  यह टीप रचनाकार की दृष्टि से भले ही औचित्यपूर्ण न हो किन्तु पाठक-समीक्षक के लिए सुगम अवश्य है।  'हरिगीतिका' उनका प्रिय छंद है।  

                      सलिल जी ने कतिपय अभिनव प्रयोग भी किये हैं। कुछ गीत उनहोंने बुन्देली भाषा में लिखे हैं।  जैसे- 'जब लौं आग' (ईसुरी की चौकड़िया फाग की तर्ज पर), मिलती कांय नें (ईसुरी की चौकड़िया फाग पर आधारित) इत्यादि तथा पंजाबी एवं सोहर लोकगीत की तर्ज पर गीत लिखकर नवीन प्रयोग किये हैं।  

                      कवि संक्रांति-काल से भयभीत नहीं है।  वह नया इतिहास लिखना चाहता है- 'कठिनाई में / संकल्पों का / नव है लिखें हम / आज नया इतिहास लिखें हम।'' साथ ही संघर्षों से घबराकर वह पलायन नहीं करता वरन संघर्ष के लिए प्रेरित करता है- 'पेशावर में जब एक विद्यालय के विद्यार्थियों को आतंकवादियों ने गोलियों से भून दिया था तो उसकी मर्मान्तक पीड़ा कवि को अंतस तक मठ गई थी किंतु इस पीड़ा से कवि जड़ीभूत नहीं हुआ। उसमें एक अद्भुत शक्ति जाग्रत हुई और कवि हुंकार उठा- 

                      आसमां गर स्याह है 
                      तो क्या हुआ?
                      हवा बनकर मैं बहूँगा। 
                      दहशतों के 
                      बादलों को उदा दूँगा। 
                      मैं बनूँगा सूर्य 
                      तुम रण हार रोओ  
                      वक़्त लिक्खेगा कहानी 
                      फाड़ पत्थर मैं उगूँगा। 
                      मैं लिखूँगा।  
                                   मैं लड़ूँगा।। 
                                         *
संपर्क समीक्षा: डॉ. निशा तिवारी, ६५० नेपियर टाउन, भंवरताल पानी की टँकी के सामने, जबलपुर ४८२००१ 
चलभाष; ९४२५३८६२३४, दूरलेख: pawanknisha@gmail.com 
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गुरुवार, 15 सितंबर 2016

lekh

लेख -
वर्तमान संक्रांतिकाल में सामाजिक समरसता   
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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 साहित्यिक-सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों के वर्तमान संक्रमण काल में राजनैतिक नेतृत्व के प्रति जनमानस की आस्था डगमगाना चिंता और चिंतन दोनों का विषय है। आत्मोत्सर्ग और बलिदान के पथ से स्वातँत्र्योपासना करनेवाले बलिपंथियों के सिरमौर नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के अदृश्य होने, जबलपुर तथा मुम्बई में भारतीय सेना की इकाइयों द्वारा विद्रोह करने, द्वितीय विश्वयुध्द पश्चात् इंग्लैण्ड की डाँवाडोल होती परिस्थिति ने ब्रिटेन को भारत से हटने के लिए बाध्य कर दिया। अंधे के हाथ बटेर लगने की तरह देश के स्वतंत्र होने का श्रेय कोंग्रेस को मिला जिसने गाँधी-नेहरू की अयथार्थवादी-आत्मकेंद्रित विचार धारा को शासन प्रणाली का केंद्र बना कर कश्मीर को गाँव दिया जबकि अन्य रियासतों को सरदार पटेल ने येन-केन-प्रकारेण बचा लिया। 
             
             देश के विभाजन से जनमानस पर लगे घावों के भरने के पूर्व ही गाँधी-हत्या ने राष्ट्रवादी हिन्दू शक्तियों को हाशिये पर डाल दिया। हिन्दू महासभा और जनसंघ बहुमत नहीं पा सके, समाजवादी वैचारिक बिखराव के शिकार होकर आपस में ही टकराते रहे, साम्यवादी अतिरेकी और एकतरफा क्रांति की भ्रांति में उलझे रह गए और कोंग्रस सत्तासीन होकर भ्रष्टाचार की इबारतें गढ़ती रही। फलत:, सामाजिक संरचना सतत क्षतिग्रस्त होती रही। विनोबा भावे ने सर्वोदय के माध्यम से सत-शिव-सुन्दर के प्रति जनास्था जगाने का प्रयास किया किन्तु वह तूफ़ान में दिए की लौ की तरह टिमटिमाता रह गया। १९६२ में चीन के विश्वासघात पूर्ण आक्रमण तथा नेहरू की मृत्यु ने पराभव की जो कालिमा देश के चेहरे पर पोती उससे निजात लालबहादुर शास्त्री ने पाकिस्तान को पटकनी देकर तथा इंदिरा गाँधी ने पाकिस्तान के एक हिस्से को बांग्ला देश बनवाकर दिलाई। 

             सामाजिक समरसता भंग हुई आपातकाल की घोषणा के साथ। कारावास में विविध विचारधारा के नेताओं का मोहभंग हुआ और समन्वय बिना मुक्ति की राह अवरुद्ध देखकर, सब नेता और दल जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में एक साथ आ खड़े हुए। केर-बेर का संग या चूं-चूं का मुरब्बा बहुत दिन टिक नहीं सका और आम आदमी की आशाओं पर तुषारापात करते दल फिर बिखराव की राह पर चल पड़े। राजनैतिक घटाटोप के स्वातंत्र्योत्तर काल में गुरु गोलवलकर, सत्य साईं बाबा, महर्षि महेश योगी, ओशो, आचार्य श्री राम शर्मा, स्वामी सत्यमित्रानंद गिरी, रविशंकर आदि ने धर्म-दर्शन के आधार पर सामाजिक समरसता को बचाने-बढ़ाने का कार्य किया जिसे सरकारों से कोई सहयोग नहीं मिला। कोंग्रेस सरकारों द्वारा प्रताड़ना के बावजूद राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने राष्ट्र-धर्म की ज्योति न केवल जलाये रखी अपितु संकट काल में समर्पण भाव से जनसेवा के मापदण्ड भी बनाये। 

             सामाजिक समरसता के समर्थक गुरु गोलवलकर के चिंतन का मूलाधार सत्य के प्रति आस्था, राष्ट्र के प्रति समर्पण, आम आदमी से जुड़ाव, आध्यात्म तथा वैश्विकता था। निर्भयता तथा निर्वैर्यता का वरण कर सबको समान समझने और सबके काम आने की विचारधारा देश के कोने-कोने में ही स्वयं सेवकों की अपराजेय वाहिनी नहीं खड़ी की अपितु अगणित स्वयंसेवकों को विविध देशों में प्रवासी बनाकर भेजा और भारतीय राष्ट्रवाद को धीरे-धीरे विश्ववाद का पर्याय बना दिया। गुरूजी ने 'हिंदू' शब्द को पंथ या संप्रदाय के स्थान पर सनातन मानव सभ्यता, मनुष्यता और वैश्विकता के पर्याय रूप में परिभाषित किया। उन्होंने हिंदू समाज के पतन को राष्ट्र के पराभव का कारण मानकर राष्ट्रोन्नति हेतु समाजोन्नति तथा समाजोन्नति हेतु भेद-भाव को भुलाकर एकात्मता, एकरसता तथा समरसता की स्थापना को अपरिहार्य बताया।

             सनातन सभ्यता और समन्वयवादी सभ्यता के जनक भारत ने सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और वर्तमान कलियुग में आतताइयों का उद्भव, आतंक, संघर्ष और पराभव बार-बार देखा है। देश की माटी साक्षी है कि सत-शिव-सुंदर जीवन-मूल्यों पर कितने ही विकट संकट आयें, अंतत: समाप्त हो ही जाते हैं। अक्षय, अजर, अमर, अटल, अचल  अमिट सत-चित-आनंद ही है।  आधुनिक काल में भी विविध देशों में कई विचारकों और पंथ गुरुओं ने सामाजिक समरसता के स्वप्न देखे किंतु उन्हीं के अनुयायियों ने उन स्वप्नों को साकार न होने दिया। बुद्ध, महावीर, ईसा मसीह, मुहम्मद पैगंबर और कार्ल मार्क्स ने आदर्श समाज, नर-नारी सद्भाव, सर्व मानव समानता, शांति, सुख, सहकार आदि की कामना की किन्तु उन्हीं के अनुयायियों ने न केवल अन्य पंथों और देशों के अगणित लोगों को तो मारा ही, उसके पहले अपने ही देश में सहयोगियों को लूटा-मारा। गुरूजी ने नया पंथ स्थापित न कर अपने अनुयायियों को भटकने और मारने-मरने से विरत कर राष्ट्र-धर्म की उपासना और राष्ट्र-निर्माण के महायज्ञ में लगाये रखा। इसका परिणाम पाश्चात्य जीवन-पद्धति और शिक्षा-प्रणाली के प्रति अंध मोह के बावजूद सनातन-सात्विक-सद्भावपरक मूल्यों का पराभव न होने के रूप में हमारे सामने है। यह स्थिति तब है जब कि स्वतंत्रता-पश्चात् शासन-प्रशासन ने राष्ट्रीय शक्तियों की उपेक्षा ही नहीं की, दमन भी किया। यदि सनातन धर्म प्रणीत सामाजिक समरसता को भारत सरकार तथा प्रांतीय सरकारों ने स्थानीय निकायों के माध्यम से क्रियान्वित किया होता तो वर्तमान में भारत विश्व का सिरमौर होता।    
                         
             अनेकता में एकता भारतीय संस्कृति की विशेषता है। सामाजिक जीवन में व्याप्त केंद्रीय भाव के आधार पर मानव सभ्यता का ४ युगों में काल विभाजन किया जाना इसका प्रमाण है। मानव मात्र में समानता, संपत्ति पर सबके सामूहिक अधिकार, हर एक को अपनी आवश्यकतानुसार संसाधनों के उपयोग था। कर्तव्य पालन को धर्म की संज्ञा दी गयी। अपने धर्म का पालन राजा-प्रजा सब के लिए अनिवार्य था। समाज की समन्वित धारणा (सुचारु कार्य विभाजन हेतु वर्ण व्यवस्था, सबके उन्नयन हेतु विप्रों (विद्वानों) को परामर्श / शिक्षा दान का कार्य दिया गया।  बाह्य तथा आतंरिक विघ्न संतोषियों से आम जान की रक्षा हेतु समर्थ क्षत्रियों को सैन्य दल गठित कर रक्षा कार्य क्षत्रियों को सौंप गया। दैनन्दिन आवश्यकताओं और अकाल, जलप्लावन, तूफ़ान आदि आपदाओं या आक्रमण काल के समय उपयोगी वस्तुओं के आदान-प्रदान और क्रय-विक्रय का दायित्व वैश्यों ने सम्हाला। आतंरिक व्यवस्था बनाये रखने हेतु शेष सेवा कार्य शूद्रों ने जिम्मे किया गया। कानून व्यवस्था बनाये रखने के लिए एक वर्ग द्वारा अन्य वर्ग के कार्य में हस्तक्षेप दण्डनीय था। शम्बूक को इसी आधार पर दण्डित किया गया। वह शूद्र के साथ राजन्य वर्ग का अनाचार नहीं निर्धारित रीति का पालन मात्र था। शूद्र उपेक्षित और शोषित होते तो एक धोबी जन प्रतिनिधि के आरोप पर राजमहिषि सीता को वनवास न जाना पड़ता। बाली, रावण, कंस और कौरवों को राजा होते हुए भी मर्यादा भंग करने पर सत्ता ही नहीं प्राण भी गँवाने पड़े।  

             समाज की धारणा करने वाली तथा ऐहिक और पारलौकिक सुख को संप्रदान करनेवाली शक्ति को ही हमने धर्म की संज्ञा दी है। अखंड मंडलाकार विश्व को एकात्मता का साक्षात्कार कराने वाले धर्म के आधार पर प्रत्येक अपनी प्रकृति को जानकर दूसरे के सुख के लिए काम करता है। सत्ता न होते हुए भी केवल धर्म के कारण न तो एक दूसरे पर आघात होते थे न आपस में संघर्ष ही होता था। चराचर के साथ एकात्मता का साक्षात्कार होने के कारण किसी प्रकार बाह्य नियंत्रण न होते हुए भी मनुष्य 'नायं हन्ति न हन्यते' के भाव के अनुसार पूर्ण शांति व्यवहार करता है। समता तत्व को लेकर स्वामी विवेकानन्द जी के चिंतन में भगवान बुद्ध के उपदेश का आधार मिलता है। वे कहते हैं ‘‘आजकल जनतंत्र और सभी मनुष्यों में समानता इन विषयों के संबंध में कुछ सुना जाता है, परंतु हम सब समान हैं, यह किसी को कैसे पता चले ? उसके लिए तीव्र बुद्धि तथा मूर्खतापूर्ण कल्पनाओं से मुक्त इस प्रकार का भेदी मन होना चाहिये. मन के ऊपर परतें जमाने वाली भ्रमपूर्ण कल्पनाओं का भेद कर अंतःस्थ शुद्ध तत्व तक उसे पहुंच जाना चाहिये. तब उसे पता चलेगा कि सभी प्रकार की पूर्ण रूप से परिपूर्ण शक्तियां ये पहले से ही उसमें हैं. दूसरे किसी से उसे वे मिलने वाली नहीं। उसे जब इसकी प्रत्यक्ष अनुभूति प्राप्त होगी, तब उसी क्षण वह मुक्त होगा तथा वह समत्व प्राप्त करेगा।  उसे इसकी भी अनुभूति मिलेगी कि दूसरा हर व्यक्ति ही उसी समान पूर्ण है तथा उसे अपने बंधुओं के ऊपर शारीरिक, मानसिक अथवा नैतिक किसी भी प्रकार का शासन चलाने की आवश्यकता नहीं। खुद से निचले स्तर का और कोई मनुष्य है, इस कल्पना को तब वह त्याग देता है, तब ही वह समानता की भाषा का उच्चारण कर सकता है, तब तक नहीं।’’ (भगवान बुद्ध तथा उनका उपदेश स्वामी विवेकानन्द, पृष्ठ ‘28)

           समरसतापूर्वक व्यवहार से स्वातंत्र्य, समता और बंधुता इन तीन तत्वों को साधा जा सकता है। दुर्भाग्य से हिन्दू समाज की रचना इन तीन तत्वों के आधार पर नहीं हुई है। जिस समाज रचना में उच्च तत्व व्यवहार्य हों, वही समाज रचना श्रेष्ठ है. जिस समाज रचना में वे व्यवहार्य नहीं होते, उस समाज रचना को भंग कर उसके स्थान पर शीघ्र नयी रचना बनायी जाये, ऐसा स्वामी विवेकानन्द का मत था। 
           निसर्गतया जो असमानता उत्पन्न होती है उसे भेद या विषमता नहीं माना गया। मनुष्य योनि में जन्म के कारण सभी मानव, मानव इस संज्ञा से समान हैं, लेकिन काया से सब एक सरीखे(identical) नहीं होते। जन्मत: बुध्दि, रंग,  कद, शक्ति, रूचि, गुण, स्वभाव आदि  में भिन्नता, स्वाभाविक है। निसर्गत: मानव ही नहीं अन्य जीवों में भी गुणों की, क्षमताओं की असमानता रहती है। जन्मत: असमानता, विषमता नहीं है। यह परम चैतन्य शक्ति का विविधतापूर्ण आविष्कार है। आत्मा का आधार ही वास्तविक आधार है, क्योंकि आत्मा सम है, सब में एक ही जैसी समान रूप से अभिव्यक्त है। सब का एक ही चैतन्य है, इस पूर्णता के आधार पर ही प्रेमपूर्ण व्यवहार, व्यक्ति को परमात्मा का अंग मानकर नितांत प्रेम, विश्व को परमेश्वर का व्यक्त रूप मानकर विशुध्द प्रेम यही वह अवस्था है। इसीलिए प्रार्थना की जाती है - सर्वे भवंतु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामय:, सर्वे भद्राणु पश्यन्ति मा कश्चिद् दुःख भाग्भवेत'
             भारतवर्ष में संतों की भी लम्बी परंपरा रही है।  संतों ने समरसता भाव और व्यवहार हेतु अपार योगदान दिया है। इनके विचार समय-समय पर लोगों के सामने लाना समरसता प्रस्थापित करने हेतु उपयुक्त है।  गुरु गोलवलकर समरस समाज जीवन को स्पष्ट करते हुए कहते हैं- 'एक वृक्ष को लीजिए, जिसमें शाखाएँ, पत्तियाँ, फूल और फल सभी कुछ एक दूसरे से नितांत भिन्न रहते हैं किंतु हम जानते हैं ये सब दिखनेवाली विविधाताएँ केवल उस वृक्ष की भाँति-भाँति की अभिव्यक्तियाँ है। यही बात हमारे सामाजिक जीवन की विविधाताओं के संबंध में भी है, जो इन सहस्रों वर्षों में विकसित हुई हैं।'' वसुधैव कुटुम्बकम, वैश्विक नीडं, सबै भूमि गोपाल की जैसी उक्तियॉं प्रमाण हैं कि भारत में असमानता नहीं थी।   

             ईष्या, स्पर्धा, द्वेष, अविश्वास, भोगलालसा, असमानता, शोषण, अन्याय आदि कलियुग की पहचान हैं। 'आर्थिक, राजनीतिक, वैचारिक आदि सभी आधारों पर लोग संघर्ष के लिए तैयार हैं। आत्मौपम्य बुध्दि घटी है। धर्म की न्यूनता के कारण जीवन में दु:ख, दैन्य और अशांति है। आदर्श समाज की रचना केवल भाषण देने, कविता लिखने, चुनाव लगाने से नहीं होगी। उस लक्ष्य प्राप्ति के लिए निरंतर कष्ट उठाने पड़ेंगे। संपूर्ण समाज की एकात्मता, पूर्ण राष्ट्र की सेवा, देशवासियों हेतु सर्वस्वार्पण करना होगा।सभी को समान देखते हुए, निरपेक्ष प्रेम भाव से समाज के सभी अंगों, प्रत्यंगों के साथ एकात्मभाव जगाने का प्रयास उन्होंने निरंतर करना होगा। 'समरसता' दिखावे का शब्द नहीं, जीवन व्यवहार का दर्शन बनाना होगा। कलियुग में हर व्यक्ति अपने परिवार, पेशे और लाभ का लक्ष्य लेकर अन्यों हेतु निर्धारित क्षेत्र में प्रवेश का प्रयास करेगा इसलिए टकराव होगा। 'समानों में समानता' (ईक्विटी अमंग्स्ट ईकवल्स) तथा 'विधि के शासन' (रूल ऑफ़ लॉ) हेतु  आरक्षण का प्रावधान समता, समानता और साम्यता पाने-देने के लिए आवश्यक है किन्तु  क्रमश: कम कर विलोपित करने की नीति अन्यों में असन्तोष न होने देगा। 

             गुरु जी के सुयोग्य उत्तराधिकारी डॉ. मोहन भागवत के अनुसार 'हमारे समाज में विविधता है स्वभाव, क्षमता और वैचारिक स्तर पर विविधता का होना स्वाभाविक है। भाषा, खान-पान, देवी-देवता, पंथ संप्रदाय तथा जाति व्यवस्था में भी विविधता है  पर यह विविधता कभी हमारी आत्मीयता में बाधा उत्पन्न नहीं करती। विविध प्रकार के लोगों का समूह होने के बावजूद हम सब एक हैं। समान व्यवहार, समता का व्यवहार होने से यह विविधता भी समाज का अलंकार बन जाती है। सामाजिक जीवन में जातिभेद के कारण विषमता और संघर्ष होता है, इसलिए जातिभेद को दूर करना होगा।  जब तक सामाजिक भेदभाव है, तब तक आरक्षण भी रहे। हमारा मन निर्मल हो, वचन दंशमुक्त हो, व्यवहार मित्र बनाने वाला हो तब समाज में समता का भाव विकसित होगा।

             साम्यवादी चिंतन से उपजे सामाजिक विघटनात्मक नक्सलवाद, समाजवादी विचारधारा के व्यक्तिपरक चिन्तन से उपजे विखण्डन, मुस्लिम साम्प्रदायिकता से उत्पन्न आतंकवाद, तमिलनाड व असम में नसलीय टकराव जनित हिंसा और कश्मीर से पण्डितों के पलायन के बाद भी देश कमजोर न होना यह दर्शाता है कि ऊपरी टकराव के बाद भी सामाजिक समरसता कम नहीं हुई है। डॉ. सुवर्णा रावल के अनुसार सामाजिक व्यवस्था में ‘समता’ एक श्रेष्ठ तत्व है।  भारत के संविधान में समानतायुक्त समाज रचना तथा विषमता निर्मूलन को प्राथमिकता दी गयी है।
                   निसर्ग के इस महान तत्व का विस्मरण जब व्यवहारिक स्तर के मनुष्य जीवन में आता है, तब समाज जीवन में भेदभाव युक्त समाज रचना अपनी जड़ पकड़ लेती है। समय रहते ही इस स्थिति का इलाज नहीं किया गया तो यही रूढ़ि   के रूप में प्रतिस्थापित होती है। भारतीय समाज ने समता का यह सर्वश्रेष्ठ, सर्वमान्य तत्व स्वीकार तो कर लिया, विचार बुद्धि के स्तर पर मान्यता भी दे दी परंतु इसे व्यवहार में परिवर्तित करने में असफल रहा। ‘समता’ को सिद्ध और साध्य करने हेतु ‘समरसता’ का व्यावहारिक तत्व प्रचलित करना जरूरी है।  समरसता में ‘बंधुभाव’ की असाधारण महत्ता है।  
                     भारतवर्ष में समय-समय पर अनेक राष्ट्र पुरुषों ने जन्म लिया है. उन्होंने अपने जीवन-काल का सम्पूर्ण समय समाज की स्थिति को सुधारने में लगाया।  राजा राममोहन रॉय से डॉ. बाबासाहब आंबेडकर तक सभी राष्ट्र पुरुषों ने  अधोगति के आखिरी पायदान पर पहुँची सामाजिक स्थिति को सुधारने में अपना सारा जीवन व्यतीत किया। सामाजिक मंथन, अपनी श्रेष्ठ इतिहास-परंपरा जागृति हेतु राष्ट्र पुरुषों के जीवन कार्य का सत्य वर्णन समाज में लाना यह समरसता भाव जगाने हेतु उपयुक्त है। रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द, महात्मा ज्योतिराव फुले, राजर्षि शाहू महाराज, डॉ. बाबासाहब आंबेडकर, नारायण गुरु आदि का योगदान अपार है। डॉ. बाबासाहब तो कहा करते थे, ‘‘बंधुता ही स्वतन्त्रता तथा समता का आश्वासन है।  स्वतंत्रता तथा समता की रक्षा कानून से नहीं होती।’’
                   आज अपने देश में समाज व्यवस्था का दृश्य क्या है ? अभिजन वर्ग अत्यल्प है। बहुजन वर्ग वंचित वर्ग, पिछड़ा वर्ग, घुमंतु समाज, वनवासी, महिला समाज आदि अनेक अंगों पर विशेष ध्यान देना जरूरी है। सुदृढ़ समाज व्यवस्था की अपेक्षा करते समय इन दुर्बल कड़ियों पर ज्यादा ध्यान देना जरूरी है। बहुजन समाज की उन्नति उपर्युक्त समता-बंधुता-स्वातंत्रता, समरसता इन तत्वों के आधार पर हो सकती है। स्वामी विवेकानंद जी ने बहुजन समाज की उन्नति के लिए दो बातों पहली शिक्षा और दूसरी सेवा की आवश्यकता प्रतिपादित की है। उनके अनुसार ‘‘साधारण जनता में बुद्धि का विकास जितना अधिक, उतना राष्ट्र का उत्कर्ष अधिक। हिन्दुस्थान देश विनाश के इतने निकट पहुँचा, इसका कारण विद्या तथा बुद्धि का विकास दीर्घ अवधि तक मुट्ठीभर लोगों के हाथ में रहना है। इसमें राजाओं का समर्थन होने से साधारण जनता निरी गँवार रह गयी और देश विनाश के रास्ते पर बढ़ा।  इस स्थिति में से ऊपर उठना है तो शिक्षा का प्रसार साधारण जनता में करने को छोड़कर दूसरा कोई उपाय नहीं है। 

                       सामाजिक समरसता पर इस्लाम का विशेष आग्रह है। इस्लाम बहुदेववाद को नहीं मानता लेकिन मनुष्य के धार्मिक व्यवहार सहित दैनिक आचार में वह निश्चित रूप से सहिष्णुता का हिमायती रहा है। इसके लिए वह आस्था बदलना जरूरी नहीं समझता। समाज में जिस तरह सांप्रदायिक विद्वेष बढ़ रहा है, उसे देखकर सामाजिक जीवन के एक अंतर्निहित गुण के रूप में आज धार्मिक सद्भाव की आवश्यकता अधिक अनुभव की जा रही है। आम धारणा के विपरीत इस्लाम धर्म सामाजिक सौहार्द का प्रतिपादन करता है। क़ुरान के अनुसार 'जो इस्लाम के अलावा किसी अन्य धर्म का अनुयायी होगा, उसे अल्लाह स्वीकार नहीं करेंगे और वह इस दुनिया में आकर खो जाएगा'  की बहुधा गलत व्याख्या की गई है। क़ुरान में साफ-साफ कहा गया है - यहूदी, ईसाई, सैबियन्स (प्राचीन साबा राजशाही के मूल निवासियों का धर्म) सभी आस्तिक हैं, जो खुदा और क़यामत में विश्वास रखते हैं और जो सही काम करते हैं, अल्लाह उन्हें इनाम देगा। उन्हें न तो डरने की जरूरत है और न पश्चाताप करने की।' इस्लाम के पैमाने से मोक्ष व्यक्ति के अपने आचरण पर निर्भर करता है न कि किसी खास धार्मिक समूह से संबंधित होने पर। यह समझदारी धार्मिक समरसता के लिए निहायत जरूरी है। इस्लाम ईश्वर या सच्चाई की अनेकता में नहीं, एकता में विश्वास करता है जबकि दुनिया में अनेक देवी-देवताओं की पूजा की जाती है। तब उनमें  समरसता कैसे हो? इस्लाम विचारधारात्मक मतभेदों को स्वीकार करलोगों के दैनिक जीवन में सहिष्णुता और एक-दूसरे के धर्म को आदर देने की वकालत करता है। क़ुरान घोषणा करता है कि धार्मिक मामलों में जोर-जबर्दस्ती के लिए कोई जगह नहीं है। क़ुरान किसी भी दूसरे धर्म की निंदा करने को गैरवाजिब बताता है।

                            इस्लाम धार्मिक समरसता के बदले धार्मिक लोगों की समरसता पर ज्यादा जोर देता है। सामाजिक समरसता  मतभिन्नता के बावजू्‌द एकता पर आधारित होती है, न कि बिना मतभेद की एकता पर। मुहम्मद साहेब के जीवन काल में ही यहूदी, ईसाई और इस्लाम के धर्मगुरुओं ने उच्च विचार और धार्मिक समरसता के महान उद्देश्यों के लिए याथ्रिब शहर में बहस की थी। धार्मिक मामलों में सहिष्णुता से काम लेना ही काफी नहीं है, बल्कि यह हमारे जीवन के रोज-रोज के आचार-व्यवहार का हिस्सा होनी चाहिए। इस्लाम की आज्ञा है कि अगर प्रार्थना के समय मुसलमान के अलावा कोई अन्य धर्म का अनुयायी भी मस्जिद में आ जाए तो उसे अपने धर्म के अनुसार पूजा करने में स्वतंत्र महसूस करना चाहिए औऱ वह मस्जिद में ही ऐसा कर सकता है। इतिहास के हर दौर में सहिष्णुता इस्लाम का नियम रहा है। यही कारण है कि दुनिया का सबसे नया धर्म होने के बावजूद इसका इतने बड़े पैमाने पर प्रसार हुआ। इस्लाम ने किसी धर्म को मिटाया नहीं। धार्मिक सहिष्णुता लोगों की आस्था को बदलकर नहीं  की जा सकती। इसका एकमात्र रास्ता यही है कि लोगों को दूसरे धर्म के मानने वालों के प्रति आदर भाव रखने के लिए प्रोत्साहित किया जाए और व्यवहार में हमेशा लागू किया जाए।
                  भारत के गरीब, भूखे-कंगाल, पिछड़े, घुमंतु समाज के लोगों को शिक्षा कैसे दी जाए? गरीब लोग अगर शिक्षा के निकट पहुँच सकें हों तो शिक्षा उन तक पहुँचे। दुर्बलों की सेवा ही नारायण की सेवा है। दरिद्र नारायण की सेवा, शिव भावे जीव सेवा यह रामकृष्ण परमहंस तथा स्वामी विवेकानन्द जी द्वारा दिखाया हुआ मार्ग है। लोक शिक्षण तथा लोकसेवा के लिए अच्छे कार्यकर्ता होना जरूरी हैं। कार्यकर्ता में सम्पूर्ण निष्कपटता, पवित्रता, सर्वस्पर्शी बुद्धि तथा सर्व विजयी इच्छा शक्ति इस हो तो मुट्ठीभर लोग भी सारी दुनिया में क्रांति कर सकते हैं। समरसता स्थापित करने हेतु ‘सामाजिक न्याय’ का तत्व अपरिहार्य है। ‘आरक्षण’ सामाजिक न्याय का एक साधन है साध्य नहीं। यह ध्यान रखना जरूरी है। डॉ. आंबेडकर का धर्म पर गहरा विश्वास रथा।धर्म के कारण ही स्वातंत्र्य, समता, बंधुता और न्याय की प्रतिस्थापना होगी, यह उनकी मान्यता थी। धर्म ही व्यक्ति तथा समाज को नैतिक शिक्षा दे सकता है।  धर्म को राजनीतिक हथियार के रूप में उन्होंने कभी इस्तेमाल नहीं किया।  बौद्ध धर्म ग्रहण कर उन्होंने स्वातंत्र-समता-बंधुता-न्याय समाज में प्रतिस्थापित करने का एक मार्ग प्रस्तुत किया। निस्संदेह सामाजिक समरसता, सहिष्णुता  और बंधुत्व ही आधुनिक युग का मानव धर्म  है। 

                     भारत ही नहीं विश्व के सर्वाधिक प्रभावशाली राजनेताओं में अग्रगण्य नरेन्द्र मोदी जी प्रणीत स्वच्छता अभियान केवल भौतिक नहीं अपितु मानसिक कचरे की सफाई की भी प्रेरणा देता है। जब तक देश और विश्व में हर व्यक्ति को शिक्षा, धन, धर्म, वाद, पंथ, क्षेत्र, लिंग आदि अधरों पर बिना किसी भेदभाव के 'मन की बात' करने और कहने का अवसर न मिले, वह अपने मन के 'मेक इन'  और 'मेड इन' को सबके साथ बाँट न सके सामाजिक समरसता बेमानी है। सामाजिक समरसता का महामंत्र विश्व में सर्वत्र बार-बार गुंजित हो रहा है। इसे अपने जीवन में उतारकर हम मानववाद की अनादि-अनंत श्रंखला से जुड़ कर जीवन को सार्थक कर सकते हैं।  
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​आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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