व्यंग के पुरोधा श्री राम ठाकुर 'दादा' नहीं रहे
जबलपुर, १९-१२-२००९ । हास्य-व्यंग के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनानेवाले अनूठे शिल्पी श्री राम ठाकुर 'दादा' के निधन से संस्कारधानी के साहित्य जगत में सन्नाटा व्याप्त है। वर्ष १९९४ में मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री श्री दिग्विजय सिंह एवं ख्यातिलब्ध साहित्यकार-शिक्षाविद श्री शिव मंगल सिंह 'सुमन' के कर कमलों से वागीश्वरी पुरस्कार से सम्मानित किए जा चुके दादा ने स्वातंत्र्योत्तर संस्कृत काव्य में हास्य-व्यंग विषय पर शोधोपाधि प्राप्त की थी। उनका जन्म २८ जनवरी १९४६ को ग्राम बरंगी, तहसील सोहागपुर, जिला होशंगाबाद में हुआ था। उनके समृद्ध रचना संसार में हास्य-व्यंग संग्रह 'दादा के छक्के', लघुकथा संग्रह 'अभिमन्यु का सत्ताव्यूह', व्यंग निबंध संग्रह 'ऐसा भी होता है', व्यंग उपन्यास 'पच्चीस घंटे', गद्य संग्रह 'मेरी प्रतिनिधि व्यंग रचनाएं', व्यंग लेख संग्रह ' प से पर्स, पिल्ला और पति', हास्य खंड काव्य 'दादा की रेल यात्रा' आदि प्रमुख हैं।
दादा ने साहित्य निर्देशिका, पोपट तथा अभिव्यक्ति पत्रिकाओं का सम्पादन किया था। दूर संचार विभाग में वरिष्ठ दूरभाष पर्यवेक्षक रहे दादा की सरलता, सहजता तथा अपनापन आजकल दुर्लभ होता जा रहा है। दादा की अंत्येष्टि स्थानीय रानीताल स्थित श्मशान ग्रह में हुई। दिव्या नर्मदा परिवार दादा को विनम्र shraddhanjali arpit करते हुए उनकी कुछ panktiyan pathakon के लिए प्रस्तुत कर रहा है।--
मंहगाई को प्रथम मनाऊँ, जो सुरसा सम बढ़ती जाय।
भ्रष्टाचार को शीश झुकाऊँ, जिसकी जवानी चढ़ती जाय।
कथा बखानूं मैं रेलों कीश्रोता सुनियो कान लगाय।
सुमरन कर लूँ रेल मंत्री का, जिनकी रेल चले लहराय।
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