स्तम्भ / लेबल

-acharya sanjiv 'salil' (238) -Acharya Sanjiv Verma 'Salil' (195) अंग्रेजी (1) अलंकार (4) अवधी (4) आयुर्वेद (3) आरोग्य आशा (1) कला (1) कविता (32) कहावत (1) कायस्थ (1) काव्यानुवाद (4) कुण्डलिनी (1) क्षणिका (1) गणेश (1) ग़ज़ल (13) गीत (57) गीति काव्य (1) गीतिका (14) घनाक्षरी (2) घरेलू नुस्खे (3) चिंतन (3) चित्रगुप्त (5) चौपाई (1) छत्तीसगढ़ी (1) जनक छंद (2) डॉ चित्रा चतुर्वेदी 'कार्तिका' (1) तसलीस (उर्दू त्रिपदी) अज़ीज़ अहमद अंसारी (1) दुर्गा (3) देश (2) दोहा (65) नर्मदा (9) नर्मदाष्टक (1) नव विधा (1) नवगीत (41) नारी विमर्श (1) निमाड़ी (1) नियाज़ (1) नज़्म: संजीव 'सलिल' (1) परिचर्चा: चिट्ठाकारी और टिप्पणी-लेखन (1) पुरातत्व (1) पुस्तक समीक्षा (1) प्रकृति (1) प्राकृतिक चिकित्सा (2) प्रो. भागवत प्रसाद मिश्र 'नियाज़' (1) बाल साहित्य (1) बुंदेली (1) भक्ति काव्य (1) भजन (15) भवन (1) भारत (7) भोजपुरी (5) महादेवी वर्मा (1) मालवी (1) मुक्तक (6) मुक्तिका (80) मृदुल कीर्ति (4) राम (7) राष्ट्र वंदना (1) लघु कथा (3) लघुकथा (13) लेख: हिन्दी का हित चिंतन (1) विवाह गीत (3) विश्व काव्य सलिला : भागवत प्रसाद मिश्रा 'नियाज' ' (1) शब्द सलिला: लखपति -अजित वडनेरकर (1) शान्ति देवी वर्मा (1) श्यामलाल उपाध्याय (1) श्यामानन्द 'सरस्वती' (1) श्री कृष्ण (1) संजीव 'सलिल' (235) संस्मरण (1) समाचार (1) साधना (1) सूक्ति सलिला: शेक्सपिअर (1) सूक्ति-सलिला:प्रो. बी. पी. मिश्र 'नियाज़' / सलिल (1) सोरठा (1) स्वर्गीय शान्ति देवी वर्मा (1) स्वास्थ्य: घरेलू नुस्खे (1) हरिगीतिका (1) हाइकु (6) हास्य (6) हिंदी (6) हिन्दी काव्यानुवाद (1) हिन्दी ग़ज़ल (1) हिन्दी छंद (1) (1) ॥ श्रीरामरक्षास्तोत्र ॥ (2)

सोमवार, 6 अप्रैल 2009

एक नदी नर्मदा

एक नदी नर्मदा

डॉ. महेश चन्द्र शर्मा


एक नदी इठलाती,

बलखाती,


गुनगुनाती।



सूर्य की रश्मियों में,



धवल ज्योत्सना में।



अपनी चुनरी में



गोटा सजाती



एक नदी।



एक नदी



अपने रूप पर



अपने यौवन पर



आत्ममुग्धा सी।



एक नदी



पाषाणों को भेदती



तीरों को सींचती



तटबंधों को तोड़ती



नित नए रूप संजोती।



एक नदी



बिखेरती सुगंध



देती पुलक



सुनाती संगीत।



एक सामान्य सी



असामान्य



एक बूझी सी



अबूझ नदी।



बिंदु से



सिन्धु तक प्रवाहित



अन्य नदियों सी



एक नदी।



मन को,



तन को,



ज्ञान को,



विज्ञान को,



राग को,



विराग को,



भेदती, तोड़ती,



सींचती एक नदी।



सभी शिल्पों को



आकारों को



विगलित कर



रसधारा में



डुबाती-तिराती



भिगाती-उतराती



अव्यक्त अचल रूप



संजोती एक नदी।




मरू में



उगाती दूर्वा शांति,



सुख-जीवन



एक नदी।



घने तम् में



दीप जलाती



आलोक बिखराती



एक नदी।



आलोक जो करता



परावृत्त



शिखर, गव्हर,



वन-प्रांतर,



तन-मन।



तभी कहलाती



सुखदा-शांतिदा,



मुक्तिदा-मोक्षदा



एक नदी।



आस्था के भाल पर



दैदीप्यमान तिलक



एक नदी।



एक नदी



बनी नारी।



जप-तप कर



सोपान चढ़



वात्सल्य उडेल



बन गयी माँ।



सिन्धु से बिंदु तक



प्रवाहित होती हुई



एक नदी.
*******************

6 टिप्पणियाँ Comments:

manu ने कहा…

आचार्य,
ये दोनों स्थान यदि आपके घर के आस पास हैं तो यही कहूंगा के ,
मुझे आपसे इर्ष्या हो रही है,,,,,,,,,,,,

Dr. Smt. ajit gupta ने कहा…

सलिल जी

मनु जी को ईर्ष्‍या हो रही है और हमें अभिमान। हमारे आचार्य जी इतने मनोरम स्‍थान के पास रहते हैं यह हमारे लिए अभिमान की बात है, क्‍योंकि हमें भी तो वहाँ जाने का अवसर मिलेगा और साथ में घर भी। आचार्य जी क्‍यों न एक दोहा गोष्‍ठी वहीं कर ली जाए जिससे सभी से मिलना हो जाए।

निर्मला कपिला ने कहा…

सलिल जी मुझे ईर्ष्या तो नही हो रही मगर इसकी सुन्दरता ने मन मोह लिया यदि ये आपके घर के पास है तो फिर हमे आना पडेगा। यहाँ के पानी के प्रसाद मे आपका भी स्नेह जरूर होगा। शुभकामनायें।

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ने कहा…

नर्मदा है निर्मला... कपिला भी इसका नाम है... फिर भी आप अब तक दूर हैं? सलिल नर्मदा तटवासी है... घर आपका ही है... पधारें...

aparna ने कहा…

achary ji
apne aap me anokhi nadi ka darshan karane ke liye bahut bahut dhanyawaad

Jogendra Singh ने कहा…

▬● आपकी रचनाओं को मैंने काफी आकर्षक पाया है... शुभकामनायें...

दोस्त अगर समय मिले तो मेरी पोस्ट पर भ्रमन्तु हो जाइये...

Meri Lekhani, Mere Vichar..
http://jogendrasingh.blogspot.in/2012/02/blog-post_3902.html
.


नर्मदा तट पर चौंसठ योगिनी मंदिर भेड़ाघाट जबलपुर