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सोमवार, 7 अक्तूबर 2013

namai devi narnade - Lavnya Shah

नमामि देवी नर्मदे


लावण्या
नर्मदा, नदी पवित्रता, उपयोगिता और भारतीय सँस्कारोँ की नदी है - महायोगी श्री मोटाभाई जी जो बाल - ब्रह्माचारी थे, उन्होँने नर्मदा तट पर प्रखर साधना की थी  पुराण कालसे नर्मदा का आँचल, तपस्वीयोँ की , योगियोँ की, तपोभूमि रही है  मोटाभाई की पवित्र वाणी मेँ उनकी साधना से जुडे कुछ क्षणोँ के बारे मेँ सुनिये ~~
" नर्मदा का पवित्र जल बडा मीठा हुआ करता था उन दिनोँ !  परँतु, " मीठा" मैँ उस जल को महज भक्ति या आदर से ही नहीँ कह रहा हूँ -ऐसा था कि उस समय मेँ ,जब मैँने नर्मदा माई की गोद मेँ मेरी तपस्या शुरु की थी  उस समय नदी के आसपास बडा घना जँगल हुआ करता था ! 
विशाल , हरेभरे घटादार वृक्ष जैसे जाम्बु और आँवला इत्यादि बडी सँख्या मेँ पाये जाते थे।  इन पर मधु मख्कीयोँ के बृहदाकार छत्त्ते टँगे रहते थे जिन से रीस रीस कर कई सारा मधु, नर्मदा के जल मेँ घुलमिल जाता था ! हम, मैँ और मुझ जैसे अन्य तपस्वी , सूर्य उपासना करने जल मेँ पैठते थे  व जल को मुँह मेँ ले कर पीते थे वह जल बडा ही शीतल और मधुर हुआ करता था - - ताजे मधु के मिश्रण से मीठा जल हमेँ बडी तृप्ति देता था !  सँजीवनी की तरह जीवन दान देता हुआ, शरीर को नई उर्जा देता हुआ! "
श्री मोटाभाई ९० वर्ष तक जीवित रहे - मुझे सौभाग्यवश उनका सानिन्ध्य उनके जीवन के पिछले वर्षोँ मेँ मिला चूँकि वे बम्बई शहर के, पूर्व विले पार्ला उप नगर मेँ अपने फ्लेट मेँ रहे - उन्हेँ नर्मदा नदी की याद, तब भी आती रही ! वह मीठा -मधुर शीतल जल उन्हेँ बारबार याद आता रहा - बडे दु:खके साथ वे कहा करते थे कि, " अगर पर्यावरण के दूषण स्वरुप वे पुराने पेडोँ को काट दिया गया हो  तब तो वे मधु मख्कीयोँ के छत्ते भी गए तब मेरी नर्मदा माई का जल पहले जैसा मीठा कैसे रहा होगा ? "
पूज्य मोटाभाई का यह कथन, यह सत्य , जो स्वयम पर प्रमाणित हुआ था , हमेँ आस्चर्य मेँ डाल सकता है -- आधुनिक भारत मेँ कई बडे बदलाव आये हैँ  हमारी मातृभूमि का स्वरुप काल के प्रवाह के साथ कई प्रकार से बदल चुका है -- उसी तरह, नदीयाँ और उनके बहाव व तटोँ मे अभूतपूर्व परिवर्तन हुए हैँ - वर्तमान भारत मेँ, " नर्मदा बचाओ आँदोलन " ने फिर एकबार "नर्मदा" नदी पर लोगोँ का ध्यान केँद्रीत कर दिया है -- मध्य भारत की , गँगा, यमुना के बाद, नर्मदा, ही सबसे ज्यादह पूजनीय नदी है -- कहा जाता है कि, नर्मदा " कन्या - कुमारीका नदी " हैँ जबकि, गँगा मैया " सदा सुहागिन नदी " हैँ !
इतिहास साक्षी रहा है नदीयोँ के आसपास के इलाकोँ का कि किस तरह प्राचीन सभ्यताओँ का ग्राम्य व नगरोँ मेँ परिवर्तन होना नदी तट पर ही सँभव हुआ है जल की सुविधा, भूमि का बाहुल्य, नदीओँ के समीप आबादी के बसने मेँ सहायक सिध्ध हुए नदी की सँपदा से ही कायमी पडाव मनुष्य की सभ्यता के सोपान बने युप्फेटीस] टाएग्रीस,] नदीने मेसोपोटेमीया की सभ्यता रखी- याँग काई शेक व सीक्याँग नदीयोँ के तटोँ पर चीन की सभ्यता पनपी और भारत की सिँधु नदी ने सिँधु घाटी की सभ्यता की नीँव रखी थी नाइल नदी ने उसी तरह, प्राचीन इजिप्त की सँस्कृति व सभ्यता के सुमन खिलाये थे गँगा यमुना व इन नदीयोँ की सहभागी धाराओँ ने, उत्तर भारत को सदीयोँसे सीँचा है अपने जल से जीवित रखा हुआ है उत्तराखँडॅ आज भी आबाद है ये सारे उदाहरण ही हमसे नदीयोँ को  " सँस्कृति और सभ्यता की जननी " की उपमा दीलवाते हैँ --  उन्हीँ के प्राणदायी जल से मनुष्य प्रगति की गाथा के आध्याय लिखे गये हैँ और आगे भी, लिखे जायेँगे - नदी सभ्यता रुपी शिशु को गोद मेँ लिये दुलार करती हुई " माँ " स्वरुप हैँ -जो बात हम अन्य वैश्विक स्तर की नदीयोँ के बारे मेँ कह रहे हैँ वही नर्मदा नदी पर भी लागू होती है -नर्मदा नदी के किनारोँ पर बसे लोगोँ के लिये वे " लोक -माता" हैँ इतना ही नहीँ वे " परा ~ शक्ति, जगदम्बा स्वरुपिणी" हैँ जो विश्वमाता स्वरुपा भी हैँ -इस वर्तमान समय मेँ कच्छ समूचा गुजरात नर्मदा की पावन जल धारा का अमृतदायी ज अपनी भूमि की प्यास बुझाने हेतु चाहता है नर्मदा के आशीर्वाद के बिना इन प्राँतोँ का उत्कर्ष और खुशहाली असँभव जान पडते हैँ -इतिहास साक्षी रहा है नदीयोँ के आसपास के इलाकोँ का कि किस तरह प्राचीन सभ्यताओँ का ग्राम्य व नगरोँ मेँ परिवर्तन होना नदी तट पर ही सँभव हुआ है जल की सुविधा, भूमि का बाहुल्य, नदीओँ के समीप आबादी के बसने मेँ सहायक सिध्ध हुए नदी की सँपदा से ही कायमी पडाव मनुष्य की सभ्यता के सोपान बने युप्फेटीस टाएग्रीस नदी ने मेसोपोटेमीया की सभ्यता रखी याँग काई शेक व सीक्याँग नदीयोँ के तटोँ पर चीन की सभ्यता पनपी और भारत की सिँधु नदी ने सिँधु घाटी की सभ्यता की नीँव रखी थी नाइल नदी ने उसी तरह, प्राचीन इजिप्त की सँस्कृति व सभ्यता के सुमन खिलाये थे -
गँगा यमुना व इन नदीयोँ की सहभागी धाराओँ ने, उत्तर भारत को सदीयोँसे सीँचा है अपने जल से जीवित रखा हुआ है -उत्तराखँडॅ आज भी आबाद है ये सारे उदाहरण ही हमसे नदीयोँ को सँस्कृति और सभ्यता की जननी " की उपमा दीलवाते हैँ - उन्हीँ के प्राणदायी जल से मनुष्य प्रगति की गाथा के आध्याय लिखे गये हैँ और आगे भी, लिखे जायेँगे नदी सभ्यता रुपी शिशु को गोद मेँ लिये दुलार करती हुई " माँ " स्वरुप हैँ -- जो बात हम अन्य वैश्विक स्तर की नदीयोँ के बारे मेँ कह रहे हैँ वही नर्मदा नदी पर भी लागू होती है -नर्मदा नदी के किनारोँ पर बसे लोगोँ के लिये वे " लोक -मात हैँ इतना ही नहीँ वे परा ~ शक्ति, जगदम्बा स्वरुपिणी" हैँ जो कि " विश्वमाता स्वरुपा" भी हैँ -इस वर्तमान समय मेँ, कच्छ, समूचा गुजरात नर्मदा की पावन जल धारा का अमृतदायी जल अपनी भूमि की प्यास बुझाने हेतु चाहता है नर्मदा के आशीर्वाद के बिना इन प्राँतोँ का उत्कर्ष और खुशहाली असँभव जान पडते हैँ --
 
भारत मेँ एक यह भी रीवाज है कि, पावन नदीयोँ की परिक्रमा की जाये ! 
मनमेँ प्रार्थना लिये, हाथ जोडे, प्रणाम करते हुए, अगर भक्ति भाव सहित, 
नदी की परिक्रमा की जाये तब नर्मदा माई आपकी इच्छाओँ को पूरी करेँगी ऐसी लोक मान्यता है --
" निर्धन को मिले धन,
बांझ को मिले बालक,
अँधे को मिले दर्शन,
नास्तिक को मिले भक्ति, टूटे
सारे बँधन, नर्मदे हर ! नर्मदे हर! "
जिस भूमि पर नर्मदा की पावन धारा बहती है वह तपनिष्ठ भूमि है - 
भक्तोँ की मान्यता है कि, यमुना नदी के जल के ७ दिन समीप रहने के बाद, 
उसका जल पीते रहने के बाद, पूजा करने के बाद ,सरस्वती नदी के जल का प्रभाव 
३ दिन के बाद, गँगाजी के जल को स्नान कर, डूबकी लगाने के बाद मनुष्य के
 इकत्रित हुए पापोँ को धो देता है परँतु नर्मदा ऐसी पावन नदी है कि,
जिसके बस दर्शन करते ही वो इन्सान के पाप धो देतीँ हैँ !
दोनों ही किनारे ये पावनकारी क्षमता रखते हैँ !
जिन ऋषियोँ ने नर्मदा नदी के समीप तपस्या की , जप तप व यज्न्ज कीये उनकी सूची बडी लँबी है 
- कुछ नाम प्रमुख हैँ - जैसे, कि, इन्द्र, वरुण, कुबेर, व्यास, सनत कुमार, अत्रि ऋषि, 
नचिकेता, भृगु महाराज, च्यवन, पिप्पलाद`, वशिष्ठ, ऋअषि, भर्द्वाज ऋअषि, कश्यप,
 गौतम, याज्ञवल्क्य,मार्केण्देय, शुकदेव, राजा पुरुरवा, नृपति मान्धाता, हीरण्यरेति, श्रीरँग अवधूत इत्यादी
नर्मदा क्षेत्र के तीर्थ स्थान :

उत्तर दिशा मेँ स्थित यात्रा के स्थलोँ की सूची इस प्रकार है --
१) परशुराम - हरी धाम २) भड भूतेश्वर, ३) भरुच,४) शुक्ल तीर्थ,५) शिमोर,६) बडा कोरल 
७) नारेश्वर जो श्री रँग अवधूत जी का आश्रम स्थल है ८) माल्सार ९) झानोर 
१०) अनसुआ ११) बद्री नारायन १२) गँगनाथ १३ ) चानोड ,जो दक्षिण का प्रयाग कहलाता है 
१४ ) कर्नाली १५ ) तिलकवाडा १६) गरुडेश्वर १७) हम्फेश्वर 
१८) कोटेश्वर १९) माधवगढ या रेवाकुँड २०) विमलेश्वर या अर्धनारेश्वर २१) माहेश्वर 
२२) मँडेलश्वर २३) बडवाहा २४) ओम्कारेश्वर २५) २४ अवतार 
२६) श्री सीतावन २७) ध्याधि कुँड २८ ) सिध्धनाथ २९) भृगु कुत्छ 
३०) सोकालीपुर ३१) ब्राह्मणघाट ३२) भेडाघाट३३) धुँधाधार 
३४) तिलवाराघाट ३५) गौरीघाट ३६) जल हरी घाट ३७) मँडला घाट 
३८) लिँग घाट या सूर्यमुखी नर्मदा ३९) कनैया घाट ४०) भीम कुँडी
४१) कपिल धारा ४२) अमर कँटक धाम ४३) माँ की बगिया 
४४) सोनधार या सुवर्ण प्रपात ४५) नर्मदा उद्`गमस्थली --
नर्मदा माई की प्रशस्ति, जगद्`गुरु श्री शँकराचार्य जी ने " नर्मदाअष्टक " की रचना करके भारतीय मानस मेँ प्रतिष्ठित कर दीया है
अक्सर कहा जाता है कि, "नदी का स्त्रोत और साधु का गोत्र कभी न पूछेँ ! "
परन्तु जब भी धीमे, शाँत जल प्रवाह को दुस्तर पहाड के बीच रास्ता निकाल कर 
बहते हुए जब भी हम देखते हैँ तब ये सवाल मन मेँ उठता ही है कि, इतना सारा जल कहाँ से आता होगा ?
इस महान नदी का अस्त्तित्व कैसे सँभव हुआ होगा ?
जीवनदायी, पोषणकारी निर्मल जलधारा हमेँ मनोमन्थन करवाते हुए, 
परमात्मा के साक्षात्कार के लिये प्रेरित करती है जो इस शक्ति के मूल स्त्रोत की तरफ एक मौन सँकेत कर देती है --
पँचमहाभूतमेँ से जल तत्व आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी से
 मानव शरीर सूक्ष्म रुप मेँ ग्रहण करता है उसीसे जल तत्व से हमारा कुदरती सँबध शापित हुआ है 
-- जल स्नान से हमेँ स्फुर्ति व आनण्द मिलता है - 
थकान दूर होकर मन और शरीर दोनोँ प्रफुल्लित होते हैँ और जब ऐसा जल हो जो प्रवाहमान हो,
 मर्र मर्र स्वर से कल कल स्वर से बहता हो , सँगीत लेकर चलता हो, शीतल हो 
तब तो प्रसन्नता द्वीगुणीत हो जाती है !
 ऐसा नदी स्नान हमारी स्मृतियोँमेँ सदा के लिये बस जाता है ! जिसकी याद आती रहती है --


 

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