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गुरुवार, 30 जनवरी 2014

saraswati vandana 1


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​​सरस्वती वंदना 1 
संजीव
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हे हंसवाहिनी! ज्ञान दायिनी!!
अम्ब विमल मति दे

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नंदन कानन हो यह धरती
पाप-ताप जीवन का हरती
हरियाली विकसे …
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बहे नीर अमृत सा पावन
मलयज शीतल, शुद्ध सुहावन
अरुण निरख विहँसे
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कंकर से शंकर गढ़ पायें
हिमगिरि के ऊपर चढ़ पायें
वह बल-विक्रम दे …
​*​
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​हरा-भरा हो सावन-फागुन
रान्य ललित त्रैलोक्य लुभावन
सुख-समृद्धि सरसे …
*
नेह-प्रेम से राष्ट्र सँवारें
सदा समन्वय मंत्र उचारें
'सलिल' विमल प्रवहे  …
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Sanjiv verma 'Salil'
salil.sanjiv@gmail.com
http://divyanarmada.blogspot.in
facebook: sahiyta salila / sanjiv verma 'salil'

1 टिप्पणी:

sadhana vaid ने कहा…

अत्यंत सुंदर भाव सुमन अर्पित कर माँ शारदे की अभ्यर्थना की है सलिल जी ! बहुत ही सुंदर रचना !