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शनिवार, 22 फ़रवरी 2014

chitra par kavita: doha -sanjiv

चित्र पर कविता
संजीव
*


जब कविता ही सामने, कलम लिये हो हाथ
सलिल नहीं कविता करे, यह कैसे हो नाथ?
*
प्रश्नाकुल हैं नयन पर, उत्तर हुए अशेष
खाली प्याला चाय का, कहे कहानी शेष
*
युग कागज़ को समेटे, तरुणी बनी सवाल
संसद या जम्हूरियत के जी का जंजाल?
*
कोरे कागज़ पर लिखूँ, क्या? जो दे संतोष
जिससे तनिक समृद्ध हो, सरस्वती का कोष
*
श्यामल कंगन हाथ का, युग की नज़र उतार
कहे आम को ही चुनो, ख़ास तजो इस बार
*

facebook: sahiyta salila / sanjiv verma 'salil'


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