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मंगलवार, 11 मार्च 2014

samkalik sahitya men mahiya -sanjiv

माहिया सलिला:
समकालिक साहित्य में माहिया
संजीव
*
माहिया पंजाब की साहित्यिक विधा है। माहिया का शाब्दिक अर्थ प्रेमिका (beloved)] है. ग़ज़ल की तरह माहिया की विषयवस्तु (theme) हिज्र-[-वियोग ही है परन्तु anya vishayon par  माहिया कहना मना नहीं है । पंजाबी का एक लोकप्रिय माहिया देखें जिसे स्व. जगजीत सिंह ने गाया है:
"कोठे ते आ माहिया 
मिलणा ता मिल आ के
नहीं ता ख़स्मा नूँ खा माहिया"

उर्दू में माहिया-लेखन का श्री गणेश उर्दू शायर हिम्मतराय शर्मा ने फ़िल्म ’ख़ामोशी’ के लिये १९३६ में माहिया लिखकर किया।  
इक बार तो मिल साजन
आ कर देख ज़रा
टूटा हुआ दिल साजन
१९५३ में क़तील शिफ़ाई ने पाकिस्तानी फ़िल्म ’हसरत’ के लिये माहिए लिखे। 

भारत में क़मर जलालाबादी ने 1958 में फ़िल्म ’फ़ागुन’ के लिये माहिए लिखे जिन्हें मुहम्मद रफ़ी और आशा भोंसले की आवाज़ों में ओ. पी. नय्यर के संगीत के साथ रिकॉर्डकर भारत भूषण और मधुबाला पर फिल्मांकन किया गया.

तुम रूठ के मत जाना
मुझ से क्या शिकवा
दीवाना है दीवाना

यूँ हो गया बेगाना
तेरा मेरा क्या रिश्ता
ये तू ने नहीं जाना
कुछ और चलचित्रों में माहियों का  किन्तु क्रमशः यह विधा लुप्तप्राय हो गयी। लम्बे अंतराल के बाद हिंदी और उर्दू में लगभग एक साथ माहिये को फिर अपनाया गया. जर्मनी प्रवासी] पाकिस्तानी शायर हैदर क़ुरेशी ने न केवल खुद माहिये लिखे अपितु अन्यों को भी प्रेरित किया।   
फूलों को पीरोने में
सूई तो चुभनी थी
इस हार के होने में
मुरादाबाद, उ0प्र0 निवासी प्रसिद्ध उर्दू शायर डा0 आरिफ़ हसन खां ने अपने माहिया संग्रह ’ख़्वाबों की किरचें’में ११७ माहिया प्रकाशित किये हैं।
एक माहिया हरगानवी साहिब का है
रंगीन कहानी दो
अपने लहू से तुम
गुलशन को जवानी दो
माहिये कहने में महिला शायर भी पीछे नहीं हैं
आँगन में खिले बूटे
ऐसे मौसम में 
वो हम से रहे रूठे
-सुरैया शहाब

खिड़की में चन्दा है
इश्क़ नहीं आसां
ये रुह का फ़न्दा है
--बशरा रहमान
 
माहिये का रचना विधान:

सामान्यतः माहिये की पहली और तीसरी पंक्ति १२-१३ मात्राओं व समान तुकांत की तथा दूसरी पंक्ति २ कम मात्राओं व भिन्न तुकांत की होती है. कुछ महियाकारों ने तीनों पंक्तियों का समान पदभार रखते हुए माहिया रचे हैं. डॉ. आरिफ हसन खां के अनुसार 'माहिया का दुरुस्त वज़्न पहले और तीसरे मिसरे के लिये फ़एलुन्, फ़एलुन्, फ़एलुन्, फ़एलान्] मुतदारिक मख़बून /मख़बून मज़ाल] और दूसरे मिसरे के लिए फ़ेलु .. फ़ऊल्.. फ़अल्/फ़ऊल् [मुतक़ारिब् असरम् मक़्बूज़् महज़ूफ़् /मक़सूर्] है। इन दोनों औजान [वज़्नों] पर बित्तरतीब [क्रमश:] तकसीन और तख़नीक़ के अमल हैं। मुख़तलिफ़ मुतबादिल औज़ान [वज़न बदल-बदल कर विभिन्न वज़्न के रुक्न] हासिल किये जा सकते हैं. [तफ़सील के लिये मुलाहिज़ा कीजिए राकिम उस्सतूर (इन पंक्तियों के लेखक) की किताब ’मेराज़-उल-अरूज़’ का बाब (अध्याय) माहिए के औज़ान]।'

उर्दू शायरी में माहिया के बुनियादी औज़ान 'फ़एलुन् फ़एलुन् फ़एलुन्   22   22  22, फ़एलुन् फ़एलुन् फ़ा 22 22 2, फ़एलुन् फ़एलुन् फ़एलुन्  22   22  22 हैं.

डा0 आरिफ़ हसन खां ने अपनी उर्दू किताब ’मेराज़-उल-अरूज़;[ में माहिया की पदभार व्यवस्था पर विस्तार से लिखा है। मूल पदभार पर पहली और तीसरी पंक्ति हेतु १६ औज़ान तथा दूसरी पंक्ति हेतु ८ औज़ान  उसी प्रकार हो सकते हैं जैसे रुबाई के लिए 24-औज़ान मुक़र्रर किये गये हैं।
 
शायर आरिफ खां के कुछ और माहिया देखें:

ऎ काश न ये टूटें
दिल में चुभती हैं
इन ख़्वाबों की किरचें
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मिट्टी के खिलौने थे
पल में टूट गए
क्या ख़्वाब सलोने थे
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आकाश को छू लेता
साथ जो तू देती
क़िस्मत भी बदल देता
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पिघलेंगे ये पत्थर
इन पे अगर गुज़रे
जो गुज़री है मुझ पर
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वो दिलबर कैसा है
मुझ से बिछुड़ कर भी
मेरे दिल में रहता है
 

 
 

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