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मंगलवार, 15 अप्रैल 2014

sansmaran: difficult to understand india -dr. ram prakash saxena


डॉ. रामप्रकाश सक्सेना वर्धा हिंदी शब्दकोश के संपादक नियुक्त हुए ‘महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति ने वर्धा हिंदी शब्दकोश’ का प्रधान संपादक डॉ. रामप्रकाश सक्सेना को नियुक्त किया है. देश में वर्तमान भाषाविदों और कोशविज्ञानियों बद्रीनाथ कपूर, अरविंद कुमार, विमलेशकांति वर्मा, महावीर सरन जैन के अलावा कई कोशकार और भाषाविद मौजूद हैं, बद्रीनाथ कपूर ने कई कोश बनाए हैं, अरविंद कुमार का ‘अरविंद सहज समांतर कोश’ बहुत लोकप्रिय हुआ। विमलेशकांति वर्मा ने तीन कोश तैयार किए- ‘बल्गारियन हिंदी शब्दकोश’, ‘लरनर हिंदी-इंग्लिश डिक्शनरी’ और ‘लरनर हिंदी-इंग्लिश थीमेटिक विज्युअल डिक्शनरी’। महावीर सरन जैन देश के प्रतिष्ठित भाषाविद हैं। डॉ. सक्सेना पूर्व में हो चुके कार्यों की तुलना में अधिक उपयोगी शब्दकोश बना सकेंगे यही आशा है. शब्द विज्ञान में रूचि रखनेवाले सज्जन डॉ. सक्सेना से संपर्क कर उन्हें सहयोग दें तो कार्य अधिक व्यापक और बहुआयामी हो सकेगा।
हार्दिक बढ़ाई और शुभ कामनाएँ।
डॉ. रामप्रकाश सक्सेना जी का संपर्क - https://www.facebook.com/drramprakash.saxena
वर्धा हिंदी कोश - http://www.hindisamay.com/contentDetail.aspx?id=3159&pageno=1

प्रस्तुत है एक मार्मिक संस्मरण जो भारत की गंगो-जमुनी सभ्यता की विरासत को सामने लाकर पंथ और राजनीति का विष घोल रही आबोहवा को शुद्ध करने  का ज़ज़्बा पैदा करता है. 
संस्मरण:                                                                                                                                    Ram Prakash Saxena
डिफि़कल्ट टु अंडस्टैंड इंडिया

      डॉ. रामप्रकाश सक्सेना
मैं अमेरिका में अठारह वर्ष की आयु से ही हायर एज्युकेशन के लिए आ गया था। आया तो था भारत वापस लौटने के लिए, पर क्या किया जाय? यहीं नौकरी भी मिल गर्इ और मैं यहीं का होकर रह गया। शादी भी ऐसी लड़की से हो गर्इ, जो हिंदुस्तानी तो थी, पर यहीं पली-बढ़ी। मेरी माँ का स्वर्गवास तो मेरे बचपन में ही हो गया था जब मैं केवल दस वर्ष का था। मेरे पिता ने मेरी ख़ातिर दूसरा विवाह नहीं किया, जब कि उस ज़माने में हिंदुस्तान में तो यह आम बात थी। मेरा पालन-पोषण मेरी एक विधवा बुआ ने किया। मेरे पिता व मेरी बुआ ने मेरी परवरिश इतने लाड़-प्यार से की कि कभी मुझे माँ की कमी महसूस नहीं हुर्इ।
जब बुआ का देहांत हो गया और पिता भी रिटायर हो गए, तो उन्हें काफ़ी हार-मनुहार से अमेरिका ले आया। मैं लाया तो इस शर्त पर था कि यदि उनका मन नहीं  लगा तो वे भारत वापस चले जाएँगे। पर शुरू में प्रतिवर्ष, फिर धीरे-धीरे एक-दो वर्ष बाद और फिर लगभग नहीं के बराबर ही भारत जाना हो गया। सच्चार्इ तो यह थी कि वे अपने पौत्र व पौत्री में इतने रम गए कि उन्हें भारत आने की ज़रूरत नहीं महसूस हुर्इ। बच्चे भी इतने ख़ुश थे कि वे किसी भी शर्त पर अपने बाबा को अपनी आँखों  से ओझल होने देना नहीं चाहते थे।
चूँकि हम पति-पत्नी दोनों ही नौकरी करते थे, इसलिए पिताजी की ज़रूरत हमें हमेशा हीं रहती थी। पिताजी ने बच्चों को न केवल पढ़ाया, बलिक उनको भारतीय संस्कार इतने अधिक दे दिए कि हमारे बच्चे संस्कारों  में मुझसे भी अधिक भारतीय हो गए।
पिता जी को बुढ़ापे ने घेर लिया। अब उनके पौत्र-पौत्री भी बड़े हो गए थे। उनको भी लगने लगा कि अब वह कुछ महीनों के ही मेहमान हैं । कर्इ बार हम अपनी माँ के बारे में उनसे पूछा करते थे। माँ के बारे में बताते-बताते वे भावुक हो जाते और इसीलिए उनकी बात कभी पूरी नहीं हो पाती। मैं भी इस कारण आगे बताने की जि़द न करता, क्योंकि इससे उन्हें दुख पहुँचता  था।
एक दिन शाम को मेरे आफि़स से आने के बाद उन्होंने मुझे कुछ घटनाएँ बताईं । उन्होंने बताया कि मेरे पैदा होने के बाद मेरी माँ को टी. बी. तथा बाद में पीलिया हो गया था। डाक्टर ने यह सलाह दी थी कि बच्चे को माँ का दूध न पिलाया जाए। उन परिसिथतियों में मेरा जीवित रहना ही र्इश्वर का एक करिश्मा ही हो सक्ता था। मेरे पिता के अभिन्न मित्र, जो कि मुसिलम थे, को भी उन्हीं दिनों एक पुत्र रत्न की प्रापित हुर्इ थी। मेरी हालत देख कर मुसलमान मित्र की पत्नी ने मेरे माँ-बाप को बताया कि वह उनके बच्चे को दूध पिला दिया करेंगी।
माँ ने इस ऑफर  को यह कह कर ठुकरा दिया, ''तुम गाय का मांस खाती हो।
मेरी हालत ख़राब होती गर्इ और मैं  मरणासन्न हो गया। फिर भी, माँ अपने संस्कारों के कारण नहीं पिघलीं। अंत में मुसिलम चाची को ही पिघलना पड़ा। उन्होंने माँ से कहा, 'मैं 'क़ुरान-ए-पाक की क़सम खाती हूँ कि मैं गाय का मांस नहीं खाऊँगी। अब तो मुझे दूध पिलाने दो।'
मेरे पिताजी के समझाने पर मेरी माँ मान गर्इं और मैं बच गया।
पिताजी बताया करते थे, ''जब भी मैं गाँव जाता, तब तुम्हारी चाची तुम्हारे बारे में हमेशा पूछा करतीं। तुम्हारी एक फ़ोटो भी उनके पास है। मैं मज़ाक में कहता- भाभी वह तुम्हारा ही बेटा है। वे बड़े गर्व से उत्तर देतीं -आखि़र मैंने उसे अपना दूध पिलाया है।'' इतना कहते-कहते पिता जी इतने भावुक हो गए कि कुछ देर तक कुछ न बोल सके । कुछ देर बाद उन्होंने मुझ से कहा, 'मेरी इच्छा हैं कि तुम एक बार उनसे अवश्य मिल लेना। कुछ हो सके तो कर देना। वैसे वे बहुत खुददार हैं। फिर भी शायद मान जाएँ।  मेरे दोस्त रहमत मियाँ के पास ज़मीन तो बहुत अधिक नहीं थी, पर अपनी मेहनत से इतना कमा लेते थे कि गुज़र-बसर मज़े से हो जाता था।  बुढ़ापे के कारण वे तो मेहनत कर नहीं पाते और लड़का सातवीं कक्षा के आगे पढ़ नहीं पाया और किसानी मन लगाकर करता नहीं है। इसलिए घर की माली हालत ख़राब है।  मैं ने कर्इ बार मदद करने की कोशिश की, पर न तो मेरा दोस्त तैयार हुआ  और ना ही भाभी। ज्यादातर हिंदुस्तानी गरीब तो हैं, पर खुददार इतने कि भूखों मर जाएँगे , पर किसी के आगे हाथ नहीं फैलाएँगे।
कहते कहते पिताजी का गला फिर अवरुद्ध हो गया और कुछ बोल न सके। मैंने भी बात को आगे न बढ़ाते हुए उनसे वादा किया कि मैं एक बार उनसे ज़रूर मिल लूँगा। 
पिताजी ने कहा, ''इच्छा तो मेरी यही थी कि मैं भी एक बार गाँव जाऊँ और वही मरूँ।" 
मैंने कहा, ''पिताजी, आप कैसी बात करते हैं ? मैं आपको खुद गाँव लेकर चलूँगा चाची से मिलाने।"
 ''झूठा ढाढ़स बँधाने से क्या फ़ायदा। पिताजी ने अश्रु पोछते हुए रुँधे गले से कहा, ''अगर गाँव जाओगे तो मेरी  अस्थियों को भी गंगा में  बहा देना।
इस घटना के बाद पिताजी एक सप्ताह बाद ही परलोक सिधार गए। मैं उनकी अस्थियों  को लेकर भारत आया। चाहता तो मैं यह था कि मेरी पत्नी व बच्चे भी मेरे पिता के पुश्तैनी गाँव चलें, परंतु वे भारत आने के इच्छुक न थे।
मैं भारत आया, पिता की अस्थियों  को गंगा में विसर्जित किया और सीधे गाँव जाने की योजना बनार्इ। उन्हीं दिनों भारत में हिंदू-मुस्लिम  दंगे शुरू हो गए । दिल्ली से मेरी बहिन का फ़ोन आया कि इस समय माहौल ठीक नहीं है इसलिए स्थिति  सामान्य होने तक मैं गाँव न जाऊँ।
मेरा कहना था, माहौल ठीक होने में  न जाने कितने दिन लगें। इतने दिनों तक मैं भारत रुक नहीं सकता था। अत: मैं ने अपनी बहिन को बताया, 'अगर अभी न जा पाया, तो शायद कभी न जा पाऊँ।  पिताजी की अंतिम इच्छा पूरी किए बिना मैं भारत छोड़ना नहीं चाहता था।'
आखि़र एक दिन अपने गाँव पहुँच  गया। गाँव में रहमत चाचा के घर का पता लगाया। पता चला कि वे पिछले ही वर्ष गुज़र गए। उनके पु़त्र मसरूर मियाँ को अपना परिचय दिया। उन की बातों से मुझे ऐसा लगा कि वे मेरे परिचय से कुछ अपरिचित या अल्पपरिचित हैं। अंदर से आवाज़ आर्इ - 'कौन आया है  ? मसरूर मियाँ ने कहा, ''कोर्इ अपने आपको महेश कुमार का बेटा बता रहा है और आपसे मिलने की ख़्वाइश कर रहा है।"
अंदर से आवाज़ आर्इ, 'अंदर बुला लो।'
मुझे महसूस हो रहा था कि मसरूर मियाँ अपने पारिवारिक वातावरण के कारण मुझे अंदर ले जाना नहीं चाह रहे थे। फिर भी बूढ़ी माँ की इज्ज़त  रखने के लिए अंदर ले गए।
घर के आँगन को पार करते हुए जैसे ही मैं ने एक कमरे में प्रवेश किया, सामने बान की अधटूटी खाट पर एक वृद्धा को पाया ऐसा लगा कि यदि उसके शरीर पर कपड़े न होते, तो पूरा नर कंकाल ही दीखता।  बाल पूरे सफे़द थे और उलझे हुए भी, शायद कर्इ दिनों से कंघी न की हो।  दंत विहीन पोपला मुँह।  माथे पर ज़हीफ़ी की झुर्रियाँ तो थीं हीं, लगता था कि ग़रीबी ने कुछ झुर्रियों का  इज़ाफ़ा कर दिेया हो।  क्षण भर तो मैं ठगा सा रह गया, क्योंकि चाची की जो इमेज मैं ने अपने पिता के वर्णन के आधार पर बनार्इ थी, वह उस से बिल्कुल विपरीत थी।  पिता जी कहा करते थे कि तुम्हारी चाची इतनी सुंदर हैं कि हम लोग उन्हें मेम भाभी कहकर पुकारते थे।
मसरूर ने अपनी माँ से कहा,' अम्मी, यह रहे आपके मेहमान।'
यह वाक्य न तो मुझे ही अच्छा लगा और न ही शायद चाची को।
मैं ने चाची के चरण स्पर्श किए और मैं श्रद्धावश उनके चरणों में ही बैठ गया। उन्होंने सिर पर हाथ फेरते हुए आशीर्वादों की झड़ी लगा दी - या अल्लाह, तू जुग-जुग जिए। ख़ूब तरक़्की करे।  ख़ुदा खूब बरकत दे। अब चाची ने मेरी ओर इशारा करते हुए अपने पुत्र से कहा, 'यह तुम्हारा चचेरा भार्इ है।  बैठ, कुछ देर इनसे बात कर।'
मसरूर ने अपने दाहिने हाथ को माथे से लगाते हुए कहा,' आदाब।'
मैं ने भी उसी प्रकार आदाब कर उत्तर आदाब से दे दिया।
मसरूर बोला,' अम्मी, आप इनसे बात कीजिए।  मुझे खेत पर जाना है।  आज शायद कोर्इ मज़दूर भी नहीं आया है।  मेरा जाना ज़रूरी है।  मैं जल्दी आने की कोशिश करूँगा।'
चाची ने कहा, ठीक है, जल्दी आना, अंदर बहू से कह दे कि इनको चाय नाश्ता करा दे।
मसरूर ने कुछ व्यंग्यात्मक शैली में कहा,' क्या यह हमारे घर की चाय पी लेंगे?'
मैं ने कहा,' क्यों नहीं।'
चाची बोलीं, 'क्यों नहीं पिएगा।  इन के वालिद तो उस वक़्त भी हमारे घर का खाना खा लिया करते थे, जब हिंदू लोग मुसलमानों के घर पानी भी नहीं पीते थे।'
यह सुनकर मसरूर दूसरे कमरे में चला गया।  थोड़ी देर बाद कमरे से निकला तो बोला, अम्मी, तुम्हारी बहू से कह दिया है, वह चाय पिला देगी। अब मैं चलता हूँ।  कोशिश करूँगा, कि जल्दी आ जाऊँ।  इतना कहकर उसने एक कोने से लाठी उठार्इ और बाहर चला गया। 
मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि मसरूर को मेरा आना अच्छा नहीं लगा।  मैं तो उसके हमउम्र था।  कुछ देर तो बात कर ही सकता था।  खैर, मुझे तो चाची से मिलना था। 
चाची ने अब मेरी माँ के बारे मे बताना शुरू किया और घंटों बतियाती रहीं।
मैं ने चाची से पूछा, 'क्या यह सही है कि आपने मेरे कारण ही गाय का मांस खाना छोड़ दिया था। 
उत्तर मिला, 'हाँ। 
मैंने कहा - 'इतनी बड़ी  क़़ुर्बानी!
चाची बोली, ''बेटा, किसी की जान बचाने के लिए कोर्इ क़़ुर्बानी  बड़ी नहीं होती। तेरी माँ बहुत धार्मिक थीं। उनके आगे मुझको ही झुकना पड़ा। 
मैं ने कहा, ''अब तो पिताजी भी परलोक सिधार गए। मेरे लिए तो अब आप ही बुजुर्ग हैं । मैं आपके लिए अमेरिका से डिब्बाबंद गाय का गोश्त लाया हूँ। आप ने मेरी जान बचार्इ है।
चाची ने जवाब दिया, ''तुम्हें दूध पिलाने से पहले मैंने गाय का तो क्या, सभी गोश्त खाने छोड़ दिए थे। फिर अब तो आदत बन गर्इ है। अब मैं  कोर्इ गोश्त नहीं खाती । 
यह सुनकर मेरी आँखों से आँसू बहने लगे। आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। चाची का आँचल उन आँसुओं से गीला हो रहा था।
मैं ने कहा, ''चाची, आप ने वर्षों मेरे कारण गाय का मांस नहीं खाया। अब मेरे कहने पर खा लीजिए।
चाची ने कहा, 'बेटा, मैं ने तुम्हारी माँ को वचन दिया था कि मैं गाय का मांस नहीं खाऊँगी। अब तो पैर क़ब्र में लटके हैं । आखि़री वक़्त वचन क्या तोड़ना।' 
थोड़ी देर ख़ामोशी रही । मेरे असमंजस्य को देखकर चाची ने बड़ी आत्मीयता से मेरी ओर देखा और कहने लगीं ,''तू छोटा दिल मत कर । बड़ी मोहब्बत से लाया है । रख दे। मसरूर और उसकी बहू खा लेंगे।''
फिर मैंने बातों-बातों में उन्हें एक पैकेट देना चाहा, जिसमें दस हज़ार रुपए थे। उनकी आर्थिक हालत कुछ ज़्यादा अच्छी नहीं थी। शुक्राने में मेरे लिए तो यह रक़म बह़ुत छोटी थी।
चाची ने यह रक़म  लेने से इन्कार कर दिया और रुआँसे होकर कहा, ''दूध की क़ीमत देना चाहता हैं ? क्या कोर्इ माँ अपने बेटे से दूध का मोल लेती हैं !
मैं निरुत्तर था।  थोड़ी देर खामोशी रही।  ख़ामोशी को मैं ने ही तोड़ा, 'पिताजी आपके बारे में हमेशा बताते रहते थे कि आपने उनके ऊपर इतना बड़ा अहसान किया।'
चाची बोलीं। अहसान-वहसान काहे का? बेटा, तुम शहराती हो, तुम शायद समझ नहीं पाओगे कि हम मज़हब से अलग ज़रूर हैं, पर हम तो तेरी माँ को सगी देवरानी ही मानते थे। ... और उस ने भी मेरे ऊपर एक बहुत बड़ा अहसान किया था। 
'वह क्या? चाची', मैंने पूछा। 
'क्या तुम्हारे वालिद ने तुम्हें कुछ नहीं बताया?'  चाची ने कहा।
'नहीं, चाची। पिताजी ने तो मुझे सिफऱ् इतना ही बताया था कि आपने मुझे अपना दूध पिलाकर जीवनदान दिया था'
उन का उत्तर था, 'बेटा, तुम्हारे पिता भले आदमी थे।  भले आदमी जब किसी पर अहसान करते हैं, तो उसका ढिंढोरा नहीं पीटते।  खैर...।'
'चाची, आप ही बता दीजिए ऐसी कौन सी बात थी।'
चाची कुछ गंभीर हुर्इं और फिर कहा, 'मेरे बच्चे नहीं होते थे।  तेरी माँ पुन्ना गिरि की देवी के यहाँ मेरे लिए मन्नत माँगने गर्इं  थीं। खुदा की रहमत हुर्इ और एक साल के अंदर मसरूर पैदा हो गया। मैं तो मुसलमान ठहरी। मैं तो पुन्ना गिरि जा नहीं सकती थी।  मेरे कहने पर तुम्हारी माँ देवी को चढ़ावा चढ़ाने दुबारा गर्इं थीं।  मेरे लाख कहने पर भी उन्होंने मुझसे किराया नहीं लिया था।  तुम्हारी माँ का जवाब था- मन्नत तो मैं ने माँगी थी। अगर आप से किराया लिया तो पाप लगेगा।  बेटा, ऐसे इंसानी रिश्ते खून के रिश्तों से भी बड़े होते हैं और मज़हब से ऊपर। (हँसकर)  तू शहराती ठहरा। पता नहीं, क्या तू भी इन रिश्तों को समझ पाएगा!' 
शाम होने वाली थी।  मुझे आखि़री बस पकड़नी थी।  इसलिए मैं ने चाची से जाने की इज़ाज़त माँगी, तो चाची बोलीं, 'बेटा, मुझे याद है कि बचपन में तुझे सेवइयाँ बहुत अच्छी लगती थीं । मैं ने अपने हाथ से बनार्इं हैं।  थोड़ी ले जा।' 
थोड़ी देर में एक पोटली मेरे हाथ में थी । जाते-जाते मैं ने चाची के पैर छुए । उन्हों ने सिर पर हाथ फेरते हुए फिर दुआओं की झड़ी लगा दी । मसरूर अब तक आ गया था। चाची के कहने पर वह मुझे बस स्टैंड तक छोड़ने आया । चाहते हुए भी मैं इतनी हिम्मत न जुटा पाया कि वह रक़म मैं मसरूर को ही दे दूँ। चाची की खुददारी को चोट पहुँचाने की मैं सोच भी नहीं सकता था ।
कुछ दिनों भारत में रहने के बाद मैं अमेरिका के लिए रवाना हो गया।  सैन फ्रांसिस्को एअरपोर्ट पर उतरते ही मेरी पत्नी मुझे लेने आ गर्इ।  उन्होंने आते ही मुझे अपनी बाहों में भर लिया और बोली इंडिया में हिंदू मुसिलम राइटस चल रहे हैं।  मैं तो घबड़ा ही रही थी।  तुम्हारा गाँव तो मुसलमानी है।
मैं चुप रहा।  पत्नी ने कहा, अच्छा, तुम अपने गाँव गए थे।  क्या हुआ?
मैं ने पूरा वृतांत अपने पत्नी को सुनाया।  अंत में उनका कमेंट था- ओह, डिफिकल्ट टु अंडस्टैंड इंडिया।
मैं ने कहा, 'ओह, तुम्हारे लिए क्या, मैं तो इंडिया में पैदा हुआ।  मेरे लिए ही इट इज़ डिफिकल्ट टु अंडस्टैंड इंडिया। '
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