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मंगलवार, 17 जून 2014

chhand salila: chuliyala chhand -sanjiv

छंद सलिला:
चुलियालाRoseछंद 

संजीव
*
छंद लक्षण:  जाति महायौगिक, प्रति पद २९  मात्रा, यति १३-११-५,  पदांत लघु गुरु लघु लघु  या लघु गुरु गुरु। 

विशेष: अब तक दोहा (१३-११) की पंक्तियों के बाद ५ कला लघु गुरु लघु लघु  (द्विपदी) या लघु गुरु गुरु (चतुष्पदी) जोड़कर यह छंद  से रचा गया है

दोहे के साथ संलग्न ५ मात्राओं को ८ प्रकार से १. लघु लघु लघु लघु लघु,  २. लघु लघु लघु गुरु,  ३. लघु लघु गुरु लघु , ४. लघु गुरु लघु लघु,  ५. गुरु लघु लघु लघु, ६. लघु गुरु गुरु, ७. गुरु लघु गुरु तथा ८. गुरु गुरु लघु रखा जा सकता है, जिनसे ८ प्रकार के चुलियाला छंद बनते हैं। दोहे के २३ प्रकार सर्वमान्य हैं इस तरह कुल २३ (८) = १८४ प्रकार के चुलियाला छंद रचे जा सकते हैं। यदि दोहे की २ पंक्तियों में सम तुकान्तता बनाये रखते हुए ५ मात्रिक भिन्न संयोजन उपयोग किये जाएँ तो सैंकड़ों और उपप्रकार बन जायेंगे इसी तरह दोहे की ग्यारहवीं मात्रा को ५ अतिरिक्त मात्राओं के प्रथम मात्रा के साथ जोड़ने से और सैंकड़ों उपप्रकार बन .सकते हैं पंक्ति संख्या २, ४ अथवा अधिक हो तो से छंद संरचना का प्रकार नहीं बदलता। अतः,८ प्रकार के चुलियाला छंदों के साथ १-१ प्रकार के दोहों का उपयोगकर ८ उदाहरण प्रस्तुत हैं दोहे के हर प्रकार के साथ ८-८ प्रकार के चुलियाला छंद स्थानाभाव के कारण नहीं दिये जा रहे हैं

लक्षण छंद:

    तेरह ग्यारह पाँच कला, चुलियाला पहचान छंद रच 
    मात्रिक संयोजन विविध, विविध रसों की खान मान सच 
    तेईस दोहों से बनें, नाना और प्रकार शताधिक   
    भिन्न पदान्तों से रचें, अनगिन अन्य प्रकार लिख- न बच 

उदाहरण:

१. स्वागत में ऋतुराज के, पुष्पित हैं कचनार लरजकर  
    किंशुक कुसुम विहँस रहे, या दहके अंगार बमककर (गयंद दोहा + लघु लघु लघु लघु लघु)  

२. परिवर्तन है समय की, चाह न जड़ हों आप  बदलिए  
    देश-काल अनुरूप ही, बदल सकें जग-व्याप न डरिए ( हंस दोहा + लघु लघु लघु गुरु)  

३. ढोलक टिमकी मँजीरा, ठुमक करें इसरार  कुछ बोल 
     फगुनौटी,  चिंता भुला, नाचो-गाओ यार! रस घोल (करभ दोहा + लघु लघु गुरु लघु)  

४. निराकार परब्रम्ह का, चित्र गुप्त है सत्य कहें सब  
    पले न फल की कामना, 'सलिल' करें सत्कृत्य सुनें अब  (मर्कट दोहा + लघु गुरु लघु लघु )

५. हिंदी आटा माढ़िए, उर्दू मोयन डाल चूक मत  
    सलिल संस्कृत सान दे, पूरी बने कमाल भूल मत (श्येन दोहा + गुरु लघु लघु लघु) 

६. बिटिया के पीले किये, जब से माँ ने हाथ सुखी है 
    गहना-बाखर बिक गये, मिली झुकाये माथ दुखी है ( शरभ दोहा + लघु गुरु गुरु) 

७. जन मत ही जनतंत्र का, 'सलिल' सुदृढ़ आधार मानिए 
     जनप्रतिनिधि शासक नहीं, सेवक हैं साकार जानिए (पयोधर दोहा + गुरु लघु गुरु)  

८.  जन्म ब्याह राखी तिलक, गृहप्रवेश त्यौहार  आओ न 
     हर शुभ अवसर दे 'सलिल', पुस्तक ही उपहार पाओ न   (बल दोहा + गुरु गुरु लघु)  
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(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अनुगीत, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामरूप, कामिनीमोहन, काव्य, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गीता, गीतिका, गंग, घनाक्षरी, चुलियाला, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दिक्पाल, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, धारा, नित, निधि, निश्चल, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनअवतार, मदनाग, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मरहठा, मरहठा माधवी, मानव, माली, माया, माला, मोहन, मृदुगति, योग, ऋद्धि, रसामृत, रसाल, राजीव, राधिका, रामा, रूपमाला, रोला, लीला, वस्तुवदनक, वाणी, विद्या, विधाता, विरहणी, विशेषिका, विष्णुपद, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, शोभन, शुद्धगा, शंकर, सरस, सार, सारस, सिद्धि, सिंहिका, सुखदा, सुगति, सुजान, सुमित्र, संपदा, हरि, हरिगीतिका, हेमंत, हंसगति, हंसी)

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