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मंगलवार, 15 जुलाई 2014

ओशो उवाच

आज्ञा चक्र की संभावना :-

छठवां शरीर ब्रह्म शरीर है, कास्मिक बॉडी है; और छठवां केंद्र आज्ञा है। अब यहां से कोई द्वैत नहीं है। आनंद का अनुभव पांचवें शरीर पर प्रगाढ़ होगा, अस्तित्व का अनुभव छठवें शरीर पर प्रगाढ़ होगा--एक्झिस्टेंस का, बीइंग का। अस्मिता खो जाएगी छठवें शरीर पर। 'हूं', यह भी चला जाएगा--है! मैं हूं--तो 'मैं' चला जाएगा पांचवें शरीर पर, 'हूं' चला जाएगा पांचवें को पार करते ही। है! इज़नेस का बोध होगा, तथाता का बोध होगा--ऐसा है। उसमें मैं कहीं भी नहीं आऊंगा, उसमें अस्मिता कहीं नहीं आएगी। जो है, दैट व्हिच इज़, बस वही हो जाएगा। 
तो यहां सत् का बोध होगा, बीइंग का होगा; चित् का बोध होगा, कांशसनेस का बोध होगा। लेकिन यहां चित् मुझसे मुक्त हो गया। ऐसा नहीं कि मेरी चेतना। चेतना! मेरा अस्तित्व--ऐसा नहीं। अस्तित्व!

ब्रह्म का भी अतिक्रमण करने पर निर्वाण काया में प्रवेश 
और कुछ लोग छठवें पर रुक जाएंगे। क्योंकि कास्मिक बॉडी आ गई, ब्रह्म हो गया मैं, अहं ब्रह्मास्मि की हालत आ गई। अब मैं नहीं रहा, ब्रह्म ही रह गया है। अब और कहां खोज? अब कैसी खोज? अब किसको खोजना है? अब तो खोजने को भी कुछ नहीं बचा; अब तो सब पा लिया; क्योंकि ब्रह्म का मतलब है--दि टोटल; सब।

इस जगह से खड़े होकर जिन्होंने कहा है, वे कहेंगे कि ब्रह्म अंतिम सत्य है, वह एब्सोल्यूट है, उसके आगे फिर कुछ भी नहीं। और इसलिए इस पर तो अनंत जन्म रुक सकता है कोई आदमी। आमतौर से रुक जाता है; क्योंकि इसके आगे तो सूझ में ही नहीं आता कि इसके आगे भी कुछ हो सकता है। 

तो ब्रह्मज्ञानी इस पर अटक जाएगा, इसके आगे वह नहीं जाएगा। और यह इतना कठिन है इसको पार करना--इस जगह को पार करना--क्योंकि अब बचती ही नहीं कोई जगह जहां इसको पार करो। सब तो घेर लिया, जगह भी चाहिए न! अगर मैं इस कमरे के बाहर जाऊं, तो बाहर जगह भी तो चाहिए! अब यह कमरा इतना विराट हो गया--अंतहीन, अनंत हो गया; असीम, अनादि हो गया; अब जाने को भी कोई जगह नहीं, नो व्हेयर टु गो। तो अब खोजने भी कहां जाओगे? अब खोजने को भी कुछ नहीं बचा, सब आ गया। तो यहां अनंत जन्म तक रुकना हो सकता है।

परम खोज में आखिरी बाधा ब्रह्म:- 

तो ब्रह्म आखिरी बाधा है--दि लास्ट बैरियर। साधक की परम खोज में ब्रह्म आखिरी बाधा है। बीइंग रह गया है अब, लेकिन अभी भी नॉन-बीइंग भी है शेष; 'अस्ति' तो जान ली, 'है' तो जान लिया, लेकिन 'नहीं है', अभी वह जानने को शेष रह गया। इसलिए सातवां शरीर है निर्वाण काया। उसका चक्र है सहस्रार। और उसके संबंध में कोई बात नहीं हो सकती। ब्रह्म तक बात जा सकती है--खींचत्तानकर; गलत हो जाएगी बहुत।

छठवें शरीर में तीसरी आंख का खुलना :- 

पांचवें शरीर तक बात बड़ी वैज्ञानिक ढंग से चलती है; सारी बात साफ हो सकती है। छठवें शरीर पर बात की सीमाएं खोने लगती हैं, शब्द अर्थहीन होने लगता है, लेकिन फिर भी इशारे किए जा सकते हैं। लेकिन अब अंगुली भी टूट जाती है, अब इशारे गिर जाते हैं; क्योंकि अब खुद का होना ही गिर जाता है। 
तो एब्सोल्यूट बीइंग को छठवें शरीर तक और छठवें केंद्र से जाना जा सकता है। 
इसलिए जो लोग ब्रह्म की तलाश में हैं, आज्ञा चक्र पर ध्यान करेंगे। वह उसका चक्र है। इसलिए भृकुटी-मध्य में आज्ञा चक्र पर वे ध्यान करेंगे; वह उससे संबंधित चक्र है उस शरीर का। और वहां जो उस चक्र पर पूरा काम करेंगे, तो वहां से उन्हें जो दिखाई पड़ना शुरू होगा विस्तार अनंत का, उसको वे तृतीय नेत्र और थर्ड आई कहना शुरू कर देंगे। वहां से वह तीसरी आंख उनके पास आई, जहां से वे अनंत को, कास्मिक को देखना शुरू कर देते हैं। 

सहस्रार चक्र की संभावना :-

लेकिन अभी एक और शेष रह गया--न होना, नॉन-बीइंग, नास्ति। अस्तित्व जो है वह आधी बात है, अनस्तित्व भी है; प्रकाश जो है वह आधी बात है, अंधकार भी है; जीवन जो है वह आधी बात है, मृत्यु भी है। इसलिए आखिरी अनस्तित्व को, शून्य को भी जानने की...क्योंकि परम सत्य तभी पता चलेगा जब दोनों जान लिए--अस्ति भी और नास्ति भी; आस्तिकता भी जानी उसकी संपूर्णता में और नास्तिकता भी जानी उसकी संपूर्णता में; होना भी जाना उसकी संपूर्णता में और न होना भी जाना उसकी संपूर्णता में; तभी हम पूरे को जान पाए, अन्यथा यह भी अधूरा है। ब्रह्मज्ञान में एक अधूरापन है कि वह 'न होने' को नहीं जान पाएगा। इसलिए ब्रह्मज्ञानी 'न होने' को इनकार ही कर देता है; वह कहता है: वह माया है, वह है ही नहीं। वह कहता है: होना सत्य है, न होना झूठ है, मिथ्या है; वह है ही नहीं; उसको जानने का सवाल कहां है! 

निर्वाण काया का मतलब है शून्य काया, जहां हम 'होने' से 'न होने' में छलांग लगा जाते हैं। क्योंकि वह और जानने को शेष रह गया; उसे भी जान लेना जरूरी है कि न होना क्या है? मिट जाना क्या है? इसलिए सातवां शरीर जो है, वह एक अर्थ में महामृत्यु है। और निर्वाण का, जैसा मैंने कल अर्थ कहा, वह दीये का बुझ जाना है। वह जो हमारा होना था, वह जो हमारा 'मैं' था, मिट गया; वह जो हमारी अस्मिता थी, मिट गई। लेकिन अब हम सर्व के साथ एक होकर फिर हो गए हैं, अब हम ब्रह्म हो गए हैं, अब इसे भी छोड़ देना पड़ेगा। और इतनी जिसकी छलांग की तैयारी है, वह जो है, उसे तो जान ही लेता; जो नहीं है, उसे भी जान लेता है। 

और ये सात शरीर और सात चक्र हैं हमारे। और इन सात चक्रों के भीतर ही हमारी सारी बाधाएं और साधन हैं। कहीं किसी बाहरी रास्ते पर कोई बाधा नहीं है। इसलिए किसी से पूछने जाने का उतना सवाल नहीं है।

खोजने निकलो, मांगने नहीं
और अगर किसी से पूछने भी गए हो, और किसी के पास समझने भी गए हो, तो मांगने मत जाना। मांगना और बात है; समझना और बात है; पूछना और बात है। खोज अपनी जारी रखना। और जो समझकर आए हो, उसको भी अपनी खोज ही बनाना, उसको अपना विश्वास मत बनाना। नहीं तो वह मांगना हो जाएगा। 
मुझसे एक बात तुमने की, और मैंने तुम्हें कुछ कहा। अगर तुम मांगने आए थे, तो तुमको जो मैंने कहा, तुम इसे अपनी थैली में बंद करके सम्हालकर रख लोगे, इसकी संपत्ति बना लोगे। तब तुम साधक नहीं, भिखारी ही रह जाते हो। नहीं, मैंने तुमसे कुछ कहा, यह तुम्हारी खोज बना, इसने तुम्हारी खोज को गतिमान किया, इसने तुम्हारी जिज्ञासा को दौड़ाया और जगाया, इससे तुम्हें और मुश्किल और बेचैनी हुई, इसने तुम्हें और नये सवाल खड़े किए, और नई दिशाएं खोलीं, और तुम नई खोज पर निकले, तब तुमने मुझसे मांगा नहीं, तब तुमने मुझसे समझा। और मुझसे तुमने जो समझा, वह अगर तुम्हें स्वयं को समझने में सहयोगी हो गया, तब मांगना नहीं है। 
तो समझने निकलो, खोजने निकलो। तुम अकेले नहीं खोज रहे, और बहुत लोग खोज रहे हैं। बहुत लोगों ने खोजा है, बहुत लोगों ने पाया है। उन सबको क्या हुआ है, क्या नहीं हुआ है, उस सबको समझो। लेकिन उस सबको समझकर तुम अपने को समझना बंद मत कर देना; उसको समझकर तुम यह मत समझ लेना कि यह मेरा ज्ञान बन गया। उसको तुम विश्वास मत बनाना, उस पर तुम भरोसा मत करना, उस सबसे तुम प्रश्न बनाना, उस सबको तुम समस्या बनाना, उसको समाधान मत बनाना, तो फिर तुम्हारी यात्रा जारी रहेगी। और तब फिर मांगना नहीं है, तब तुम्हारी खोज है। और तुम्हारी खोज ही तुम्हें अंत तक ले जा सकती है। और जैसे-जैसे तुम भीतर खोजोगे, तो जो मैंने तुमसे बातें कही हैं, प्रत्येक केंद्र पर दो तत्व तुमको दिखाई पड़ेंगे--एक जो तुम्हें मिला है, और एक जो तुम्हें खोजना है। क्रोध तुम्हें मिला है, क्षमा तुम्हें खोजनी है; सेक्स तुम्हें मिला है, ब्रह्मचर्य तुम्हें खोजना है; स्वप्न तुम्हें मिला है, विज़न तुम्हें खोजना है, दर्शन तुम्हें खोजना है।
चार शरीरों तक तुम्हारी द्वैत की खोज चलेगी, पांचवें शरीर से तुम्हारी अद्वैत की खोज शुरू होगी। 
पांचवें शरीर में तुम्हें जो मिल जाए, उससे भिन्न को खोजना जारी रखना। आनंद मिल जाए तो तुम खोजना कि और आनंद के अतिरिक्त क्या है? छठवें शरीर पर तुम्हें ब्रह्म मिल जाए तो तुम खोज जारी रखना कि ब्रह्म के अतिरिक्त क्या है? तब एक दिन तुम उस सातवें शरीर पर पहुंचोगे, जहां होना और न होना, प्रकाश और अंधकार, जीवन और मृत्यु, दोनों एक साथ ही घटित हो जाते हैं। और तब परम, दि अल्टिमेट...और उसके बाबत फिर कोई उपाय नहीं कहने का। 

पांचवें शरीर के बाद रहस्य ही रहस्य है
इसलिए हमारे सब शास्त्र या तो पांचवें पर पूरे हो जाते हैं। जो बहुत वैज्ञानिक बुद्धि के लोग हैं, वे पांचवें के आगे बात नहीं करते; क्योंकि उसके बाद कास्मिक शुरू होता है, जिसका कोई अंत नहीं है विस्तार का। 
पर जो मिस्टिक किस्म के लोग हैं--जो रहस्यवादी हैं, सूफी हैं, इस तरह के लोग हैं--वे उसकी भी बात करते हैं। हालांकि उसकी बात करने में उन्हें बड़ी कठिनाई होती है, और उन्हें अपने को ही हर बार कंट्राडिक्ट करना पड़ता है, खुद को ही विरोध करना पड़ता है। और अगर एक सूफी फकीर की या एक मिस्टिक की पूरी बातें सुनो, तो तुम कहोगे कि यह आदमी पागल है! क्योंकि कभी यह यह कहता है, कभी यह यह कहता है! यह कहता है: ईश्वर है भी; और यह कहता है: ईश्वर नहीं भी है। और यह यह कहता है कि मैंने उसे देखा। और दूसरे ही वाक्य में कहता है कि उसे तुम देख कैसे सकते हो! क्योंकि वह कोई आंखों का विषय है? यह ऐसे सवाल उठाता है कि तुम्हें हैरानी होगी कि किसी दूसरे से सवाल उठा रहा है कि अपने से उठा रहा है! छठवें शरीर से मिस्टिसिज्म...
इसलिए जिस धर्म में मिस्टिसिज्म नहीं है, समझना वह पांचवें पर रुक गया। लेकिन मिस्टिसिज्म भी आखिरी बात नहीं है, रहस्य आखिरी बात नहीं है। आखिरी बात शून्य है; निहिलिज्म है आखिरी बात। 
तो जो धर्म रहस्य पर रुक गया, समझना वह छठवें पर रुक गया। आखिरी बात तो आखिरी है। और उस शून्य के अतिरिक्त आखिरी कोई बात हो नहीं सकती। 
राह के पत्थर को भी सीढ़ी बना लेना
तो पांचवें शरीर से अद्वैत की खोज शुरू होती है, चौथे शरीर तक द्वैत की खोज खत्म हो जाती है। और सब बाधाएं तुम्हारे भीतर हैं। और बाधाएं बड़ी अच्छी बात है कि तुम्हें उपलब्ध हैं। और प्रत्येक बाधा का रूपांतरण होकर वही तुम्हारा साधन बन जाती है। रास्ते पर एक पत्थर पड़ा है; वह, जब तक तुमने समझा नहीं है उसे, तब तक तुम्हें रोक रहा है। जिस दिन तुमने समझा उसी दिन तुम्हारी सीढ़ी बन जाता है। पत्थर वहीं पड़ा रहता है। जब तक तुम नहीं समझे थे, तुम चिल्ला रहे थे कि यह पत्थर मुझे रोक रहा है, मैं आगे कैसे जाऊं! जब तुम इस पत्थर को समझ लिए, तुम इस पर चढ़ गए और आगे चले गए। और अब तुम उस पत्थर को धन्यवाद दे रहे हो कि तेरी बड़ी कृपा है, क्योंकि जिस तल पर मैं चल रहा था, तुझ पर चढ़कर मेरा तल बदल गया, अब मैं दूसरे तल पर चल रहा हूं। तू साधन था, लेकिन मैं समझ रहा था बाधा है; मैं सोचता था रास्ता रुक गया, यह पत्थर बीच में आ गया, अब क्या होगा! 
क्रोध बीच में आ गया। अगर क्रोध पर चढ़ गए तो क्षमा को उपलब्ध हो जाएंगे, जो कि बहुत दूसरा तल है। सेक्स बीच में आ गया। अगर सेक्स पर चढ़ गए तो ब्रह्मचर्य उपलब्ध हो जाएगा, जो कि बिलकुल ही दूसरा तल है। और तब सेक्स को धन्यवाद दे सकोगे, और तब क्रोध को भी धन्यवाद दे सकोगे।

जिस वृत्ति से लड़ेंगे, उससे ही बंध जाएंगे
प्रत्येक राह का पत्थर बाधा बन सकता है और साधन बन सकता है। वह तुम पर निर्भर है कि उस पत्थर के साथ क्या करते हो। हां, भूलकर भी पत्थर से लड़ना मत, नहीं तो सिर फूट सकता है और वह साधन नहीं बनेगा। और अगर कोई पत्थर से लड़ने लगा तो वह पत्थर रोक लेगा; क्योंकि जहां हम लड़ते हैं वहीं हम रुक जाते हैं। क्योंकि जिससे लड़ना है उसके पास रुकना पड़ता है; जिससे हम लड़ते हैं उससे दूर नहीं जा सकते हम कभी भी। 
इसलिए अगर कोई सेक्स से लड़ने लगा, तो वह सेक्स के आसपास ही घूमता रहेगा। उतना ही आसपास घूमेगा जितना सेक्स में डूबनेवाला घूमता है। बल्कि कई बार उससे भी ज्यादा घूमेगा। क्योंकि डूबनेवाला ऊब भी जाता है, बाहर भी होता है; यह ऊब भी नहीं पाता, यह आसपास ही घूमता रहता है।
अगर तुम क्रोध से लड़े तो तुम क्रोध ही हो जाओगे; तुम्हारा सारा व्यक्तित्व क्रोध से भर जाएगा; और तुम्हारे रग-रग, रेशे-रेशे से क्रोध की ध्वनियां निकलने लगेंगी; और तुम्हारे चारों तरफ क्रोध की तरंगें प्रवाहित होने लगेंगी। इसलिए ऋषि-मुनियों की जो हम कहानियां पढ़ते हैं--महाक्रोधी, उसका कारण है; उसका कारण है वे क्रोध से लड़नेवाले लोग हैं। कोई दुर्वासा है, कोई कोई है। उनको सिवाय अभिशाप के कुछ सूझता ही नहीं है। उनका सारा व्यक्तित्व आग हो गया है। वे पत्थर से लड़ गए हैं, वे मुश्किल में पड़ गए हैं; वे जिससे लड़े हैं, वही हो गए हैं। 
तुम ऐसे ऋषि-मुनियों की कहानियां पढ़ोगे जिन्हें कि स्वर्ग से कोई अप्सरा आकर बड़े तत्काल भ्रष्ट कर देती है। आश्चर्य की बात है! यह तभी संभव है जब वे सेक्स से लड़े हों, नहीं तो संभव नहीं है। वे इतना लड़े हैं, इतना लड़े हैं, इतना लड़े हैं, इतना लड़े हैं कि लड़-लड़कर खुद ही कमजोर हो गए हैं। और सेक्स अपनी जगह खड़ा है; अब वह प्रतीक्षा कर रहा है; वह किसी भी द्वार से फूट पड़ेगा। और कम संभावना है कि अप्सरा आई हो, संभावना तो यही है कि कोई साधारण स्त्री निकली हो, लेकिन इसको अप्सरा दिखाई पड़ी हो। क्योंकि अप्सराओं ने कोई ठेका ले रखा है कि ऋषि-मुनियों को सताने के लिए आती रहें। लेकिन अगर सेक्स को बहुत सप्रेस किया गया हो, तो साधारण स्त्री भी अप्सरा हो जाती है; क्योंकि हमारा चित्त प्रोजेक्ट करने लगता है। रात वही सपने देखता है, दिन वही विचार करता है, फिर हमारा चित्त पूरा का पूरा उसी से भर जाता है। फिर कोई भी चीज...कोई भी चीज अतिमोहक हो जाती है, जो कि नहीं थी। 
लड़ना नहीं, समझना
तो साधक के लिए लड़ने भर से सावधान रहना है, और समझने की कोशिश करनी है। और समझने की कोशिश का मतलब ही यह है कि तुम्हें जो मिला है प्रकृति से उसको समझना। तो तुम्हें जो नहीं मिला है, उसी मिले हुए के मार्ग से तुम्हें वह भी मिल जाएगा जो नहीं मिला है; वह पहला छोर है। अगर तुम उसी से भाग गए तो तुम दूसरे छोर पर कभी न पहुंच पाओगे। अगर सेक्स से ही घबराकर भाग गए तो ब्रह्मचर्य तक कैसे पहुंचोगे? सेक्स तो द्वार था जो प्रकृति से मिला था। ब्रह्मचर्य उसी द्वार से खोज थी जो अंत में तुम खोद पाओगे। 
तो ऐसा अगर देखोगे तो मांगने जाने की कोई जरूरत नहीं, समझने जाने की तो बहुत जरूरत है; और पूरी जिंदगी समझने के लिए है--किसी से भी समझो, सब तरफ से समझो और अंततः अपने भीतर समझो।

व्यक्तियों को तौलने से बचना 
प्रश्न: अभी आप सात शरीरों की चर्चा करते हैं, तो उसमें सातवें या छठवें या पांचवें शरीर--निर्वाण बॉडी, कास्मिक बॉडी और स्प्रिचुअल बॉडी को क्रमशः उपलब्ध हुए कुछ प्राचीन और अर्वाचीन अर्थात एंशिएंट और माडर्न व्यक्तियों के नाम लेने की कृपा करें।

इस झंझट में न पड़ो तो अच्छा है। इसका कोई सार नहीं है। इसका कोई अर्थ नहीं है। और अगर मैं कहूं भी, तो तुम्हारे पास उसकी जांच के लिए कोई प्रमाण नहीं होगा। और जहां तक बने व्यक्तियों को तौलने से बचना अच्छा है। उनसे कोई प्रयोजन भी नहीं है। उनसे कोई प्रयोजन नहीं है। उसका कोई अर्थ ही नहीं है। उनको जाने दो। 
 - ओशो....
विचार मन्थनः
- ओशो....
आज्ञा चक्र की संभावना :-
छठवां शरीर ब्रह्म शरीर है, कास्मिक बॉडी है; और छठवां केंद्र आज्ञा है। अब यहां से कोई द्वैत नहीं है। आनंद का अनुभव पांचवें शरीर पर प्रगाढ़ होगा, अस्तित्व का अनुभव छठवें शरीर पर प्रगाढ़ होगा--एक्झिस्टेंस का, बीइंग का। अस्मिता खो जाएगी छठवें शरीर पर। 'हूं', यह भी चला जाएगा--है! मैं हूं--तो 'मैं' चला जाएगा पांचवें शरीर पर, 'हूं' चला जाएगा पांचवें को पार करते ही। है! इज़नेस का बोध होगा, तथाता का बोध होगा--ऐसा है। उसमें मैं कहीं भी नहीं आऊंगा, उसमें अस्मिता कहीं नहीं आएगी। जो है, दैट व्हिच इज़, बस वही हो जाएगा।
तो यहां सत् का बोध होगा, बीइंग का होगा; चित् का बोध होगा, कांशसनेस का बोध होगा। लेकिन यहां चित् मुझसे मुक्त हो गया। ऐसा नहीं कि मेरी चेतना। चेतना! मेरा अस्तित्व--ऐसा नहीं। अस्तित्व!
ब्रह्म का भी अतिक्रमण करने पर निर्वाण काया में प्रवेश
और कुछ लोग छठवें पर रुक जाएंगे। क्योंकि कास्मिक बॉडी आ गई, ब्रह्म हो गया मैं, अहं ब्रह्मास्मि की हालत आ गई। अब मैं नहीं रहा, ब्रह्म ही रह गया है। अब और कहां खोज? अब कैसी खोज? अब किसको खोजना है? अब तो खोजने को भी कुछ नहीं बचा; अब तो सब पा लिया; क्योंकि ब्रह्म का मतलब है--दि टोटल; सब।
इस जगह से खड़े होकर जिन्होंने कहा है, वे कहेंगे कि ब्रह्म अंतिम सत्य है, वह एब्सोल्यूट है, उसके आगे फिर कुछ भी नहीं। और इसलिए इस पर तो अनंत जन्म रुक सकता है कोई आदमी। आमतौर से रुक जाता है; क्योंकि इसके आगे तो सूझ में ही नहीं आता कि इसके आगे भी कुछ हो सकता है।
तो ब्रह्मज्ञानी इस पर अटक जाएगा, इसके आगे वह नहीं जाएगा। और यह इतना कठिन है इसको पार करना--इस जगह को पार करना--क्योंकि अब बचती ही नहीं कोई जगह जहां इसको पार करो। सब तो घेर लिया, जगह भी चाहिए न! अगर मैं इस कमरे के बाहर जाऊं, तो बाहर जगह भी तो चाहिए! अब यह कमरा इतना विराट हो गया--अंतहीन, अनंत हो गया; असीम, अनादि हो गया; अब जाने को भी कोई जगह नहीं, नो व्हेयर टु गो। तो अब खोजने भी कहां जाओगे? अब खोजने को भी कुछ नहीं बचा, सब आ गया। तो यहां अनंत जन्म तक रुकना हो सकता है।
परम खोज में आखिरी बाधा ब्रह्म:-
तो ब्रह्म आखिरी बाधा है--दि लास्ट बैरियर। साधक की परम खोज में ब्रह्म आखिरी बाधा है। बीइंग रह गया है अब, लेकिन अभी भी नॉन-बीइंग भी है शेष; 'अस्ति' तो जान ली, 'है' तो जान लिया, लेकिन 'नहीं है', अभी वह जानने को शेष रह गया। इसलिए सातवां शरीर है निर्वाण काया। उसका चक्र है सहस्रार। और उसके संबंध में कोई बात नहीं हो सकती। ब्रह्म तक बात जा सकती है--खींचत्तानकर; गलत हो जाएगी बहुत।
छठवें शरीर में तीसरी आंख का खुलना :-
पांचवें शरीर तक बात बड़ी वैज्ञानिक ढंग से चलती है; सारी बात साफ हो सकती है। छठवें शरीर पर बात की सीमाएं खोने लगती हैं, शब्द अर्थहीन होने लगता है, लेकिन फिर भी इशारे किए जा सकते हैं। लेकिन अब अंगुली भी टूट जाती है, अब इशारे गिर जाते हैं; क्योंकि अब खुद का होना ही गिर जाता है।
तो एब्सोल्यूट बीइंग को छठवें शरीर तक और छठवें केंद्र से जाना जा सकता है।
इसलिए जो लोग ब्रह्म की तलाश में हैं, आज्ञा चक्र पर ध्यान करेंगे। वह उसका चक्र है। इसलिए भृकुटी-मध्य में आज्ञा चक्र पर वे ध्यान करेंगे; वह उससे संबंधित चक्र है उस शरीर का। और वहां जो उस चक्र पर पूरा काम करेंगे, तो वहां से उन्हें जो दिखाई पड़ना शुरू होगा विस्तार अनंत का, उसको वे तृतीय नेत्र और थर्ड आई कहना शुरू कर देंगे। वहां से वह तीसरी आंख उनके पास आई, जहां से वे अनंत को, कास्मिक को देखना शुरू कर देते हैं।
सहस्रार चक्र की संभावना :-
लेकिन अभी एक और शेष रह गया--न होना, नॉन-बीइंग, नास्ति। अस्तित्व जो है वह आधी बात है, अनस्तित्व भी है; प्रकाश जो है वह आधी बात है, अंधकार भी है; जीवन जो है वह आधी बात है, मृत्यु भी है। इसलिए आखिरी अनस्तित्व को, शून्य को भी जानने की...क्योंकि परम सत्य तभी पता चलेगा जब दोनों जान लिए--अस्ति भी और नास्ति भी; आस्तिकता भी जानी उसकी संपूर्णता में और नास्तिकता भी जानी उसकी संपूर्णता में; होना भी जाना उसकी संपूर्णता में और न होना भी जाना उसकी संपूर्णता में; तभी हम पूरे को जान पाए, अन्यथा यह भी अधूरा है। ब्रह्मज्ञान में एक अधूरापन है कि वह 'न होने' को नहीं जान पाएगा। इसलिए ब्रह्मज्ञानी 'न होने' को इनकार ही कर देता है; वह कहता है: वह माया है, वह है ही नहीं। वह कहता है: होना सत्य है, न होना झूठ है, मिथ्या है; वह है ही नहीं; उसको जानने का सवाल कहां है!
निर्वाण काया का मतलब है शून्य काया, जहां हम 'होने' से 'न होने' में छलांग लगा जाते हैं। क्योंकि वह और जानने को शेष रह गया; उसे भी जान लेना जरूरी है कि न होना क्या है? मिट जाना क्या है? इसलिए सातवां शरीर जो है, वह एक अर्थ में महामृत्यु है। और निर्वाण का, जैसा मैंने कल अर्थ कहा, वह दीये का बुझ जाना है। वह जो हमारा होना था, वह जो हमारा 'मैं' था, मिट गया; वह जो हमारी अस्मिता थी, मिट गई। लेकिन अब हम सर्व के साथ एक होकर फिर हो गए हैं, अब हम ब्रह्म हो गए हैं, अब इसे भी छोड़ देना पड़ेगा। और इतनी जिसकी छलांग की तैयारी है, वह जो है, उसे तो जान ही लेता; जो नहीं है, उसे भी जान लेता है।
और ये सात शरीर और सात चक्र हैं हमारे। और इन सात चक्रों के भीतर ही हमारी सारी बाधाएं और साधन हैं। कहीं किसी बाहरी रास्ते पर कोई बाधा नहीं है। इसलिए किसी से पूछने जाने का उतना सवाल नहीं है।
खोजने निकलो, मांगने नहीं
और अगर किसी से पूछने भी गए हो, और किसी के पास समझने भी गए हो, तो मांगने मत जाना। मांगना और बात है; समझना और बात है; पूछना और बात है। खोज अपनी जारी रखना। और जो समझकर आए हो, उसको भी अपनी खोज ही बनाना, उसको अपना विश्वास मत बनाना। नहीं तो वह मांगना हो जाएगा।
मुझसे एक बात तुमने की, और मैंने तुम्हें कुछ कहा। अगर तुम मांगने आए थे, तो तुमको जो मैंने कहा, तुम इसे अपनी थैली में बंद करके सम्हालकर रख लोगे, इसकी संपत्ति बना लोगे। तब तुम साधक नहीं, भिखारी ही रह जाते हो। नहीं, मैंने तुमसे कुछ कहा, यह तुम्हारी खोज बना, इसने तुम्हारी खोज को गतिमान किया, इसने तुम्हारी जिज्ञासा को दौड़ाया और जगाया, इससे तुम्हें और मुश्किल और बेचैनी हुई, इसने तुम्हें और नये सवाल खड़े किए, और नई दिशाएं खोलीं, और तुम नई खोज पर निकले, तब तुमने मुझसे मांगा नहीं, तब तुमने मुझसे समझा। और मुझसे तुमने जो समझा, वह अगर तुम्हें स्वयं को समझने में सहयोगी हो गया, तब मांगना नहीं है।
तो समझने निकलो, खोजने निकलो। तुम अकेले नहीं खोज रहे, और बहुत लोग खोज रहे हैं। बहुत लोगों ने खोजा है, बहुत लोगों ने पाया है। उन सबको क्या हुआ है, क्या नहीं हुआ है, उस सबको समझो। लेकिन उस सबको समझकर तुम अपने को समझना बंद मत कर देना; उसको समझकर तुम यह मत समझ लेना कि यह मेरा ज्ञान बन गया। उसको तुम विश्वास मत बनाना, उस पर तुम भरोसा मत करना, उस सबसे तुम प्रश्न बनाना, उस सबको तुम समस्या बनाना, उसको समाधान मत बनाना, तो फिर तुम्हारी यात्रा जारी रहेगी। और तब फिर मांगना नहीं है, तब तुम्हारी खोज है। और तुम्हारी खोज ही तुम्हें अंत तक ले जा सकती है। और जैसे-जैसे तुम भीतर खोजोगे, तो जो मैंने तुमसे बातें कही हैं, प्रत्येक केंद्र पर दो तत्व तुमको दिखाई पड़ेंगे--एक जो तुम्हें मिला है, और एक जो तुम्हें खोजना है। क्रोध तुम्हें मिला है, क्षमा तुम्हें खोजनी है; सेक्स तुम्हें मिला है, ब्रह्मचर्य तुम्हें खोजना है; स्वप्न तुम्हें मिला है, विज़न तुम्हें खोजना है, दर्शन तुम्हें खोजना है।
चार शरीरों तक तुम्हारी द्वैत की खोज चलेगी, पांचवें शरीर से तुम्हारी अद्वैत की खोज शुरू होगी।
पांचवें शरीर में तुम्हें जो मिल जाए, उससे भिन्न को खोजना जारी रखना। आनंद मिल जाए तो तुम खोजना कि और आनंद के अतिरिक्त क्या है? छठवें शरीर पर तुम्हें ब्रह्म मिल जाए तो तुम खोज जारी रखना कि ब्रह्म के अतिरिक्त क्या है? तब एक दिन तुम उस सातवें शरीर पर पहुंचोगे, जहां होना और न होना, प्रकाश और अंधकार, जीवन और मृत्यु, दोनों एक साथ ही घटित हो जाते हैं। और तब परम, दि अल्टिमेट...और उसके बाबत फिर कोई उपाय नहीं कहने का।
पांचवें शरीर के बाद रहस्य ही रहस्य है
इसलिए हमारे सब शास्त्र या तो पांचवें पर पूरे हो जाते हैं। जो बहुत वैज्ञानिक बुद्धि के लोग हैं, वे पांचवें के आगे बात नहीं करते; क्योंकि उसके बाद कास्मिक शुरू होता है, जिसका कोई अंत नहीं है विस्तार का।
पर जो मिस्टिक किस्म के लोग हैं--जो रहस्यवादी हैं, सूफी हैं, इस तरह के लोग हैं--वे उसकी भी बात करते हैं। हालांकि उसकी बात करने में उन्हें बड़ी कठिनाई होती है, और उन्हें अपने को ही हर बार कंट्राडिक्ट करना पड़ता है, खुद को ही विरोध करना पड़ता है। और अगर एक सूफी फकीर की या एक मिस्टिक की पूरी बातें सुनो, तो तुम कहोगे कि यह आदमी पागल है! क्योंकि कभी यह यह कहता है, कभी यह यह कहता है! यह कहता है: ईश्वर है भी; और यह कहता है: ईश्वर नहीं भी है। और यह यह कहता है कि मैंने उसे देखा। और दूसरे ही वाक्य में कहता है कि उसे तुम देख कैसे सकते हो! क्योंकि वह कोई आंखों का विषय है? यह ऐसे सवाल उठाता है कि तुम्हें हैरानी होगी कि किसी दूसरे से सवाल उठा रहा है कि अपने से उठा रहा है! छठवें शरीर से मिस्टिसिज्म...
इसलिए जिस धर्म में मिस्टिसिज्म नहीं है, समझना वह पांचवें पर रुक गया। लेकिन मिस्टिसिज्म भी आखिरी बात नहीं है, रहस्य आखिरी बात नहीं है। आखिरी बात शून्य है; निहिलिज्म है आखिरी बात।
तो जो धर्म रहस्य पर रुक गया, समझना वह छठवें पर रुक गया। आखिरी बात तो आखिरी है। और उस शून्य के अतिरिक्त आखिरी कोई बात हो नहीं सकती।
राह के पत्थर को भी सीढ़ी बना लेना
तो पांचवें शरीर से अद्वैत की खोज शुरू होती है, चौथे शरीर तक द्वैत की खोज खत्म हो जाती है। और सब बाधाएं तुम्हारे भीतर हैं। और बाधाएं बड़ी अच्छी बात है कि तुम्हें उपलब्ध हैं। और प्रत्येक बाधा का रूपांतरण होकर वही तुम्हारा साधन बन जाती है। रास्ते पर एक पत्थर पड़ा है; वह, जब तक तुमने समझा नहीं है उसे, तब तक तुम्हें रोक रहा है। जिस दिन तुमने समझा उसी दिन तुम्हारी सीढ़ी बन जाता है। पत्थर वहीं पड़ा रहता है। जब तक तुम नहीं समझे थे, तुम चिल्ला रहे थे कि यह पत्थर मुझे रोक रहा है, मैं आगे कैसे जाऊं! जब तुम इस पत्थर को समझ लिए, तुम इस पर चढ़ गए और आगे चले गए। और अब तुम उस पत्थर को धन्यवाद दे रहे हो कि तेरी बड़ी कृपा है, क्योंकि जिस तल पर मैं चल रहा था, तुझ पर चढ़कर मेरा तल बदल गया, अब मैं दूसरे तल पर चल रहा हूं। तू साधन था, लेकिन मैं समझ रहा था बाधा है; मैं सोचता था रास्ता रुक गया, यह पत्थर बीच में आ गया, अब क्या होगा!
क्रोध बीच में आ गया। अगर क्रोध पर चढ़ गए तो क्षमा को उपलब्ध हो जाएंगे, जो कि बहुत दूसरा तल है। सेक्स बीच में आ गया। अगर सेक्स पर चढ़ गए तो ब्रह्मचर्य उपलब्ध हो जाएगा, जो कि बिलकुल ही दूसरा तल है। और तब सेक्स को धन्यवाद दे सकोगे, और तब क्रोध को भी धन्यवाद दे सकोगे।
जिस वृत्ति से लड़ेंगे, उससे ही बंध जाएंगे
प्रत्येक राह का पत्थर बाधा बन सकता है और साधन बन सकता है। वह तुम पर निर्भर है कि उस पत्थर के साथ क्या करते हो। हां, भूलकर भी पत्थर से लड़ना मत, नहीं तो सिर फूट सकता है और वह साधन नहीं बनेगा। और अगर कोई पत्थर से लड़ने लगा तो वह पत्थर रोक लेगा; क्योंकि जहां हम लड़ते हैं वहीं हम रुक जाते हैं। क्योंकि जिससे लड़ना है उसके पास रुकना पड़ता है; जिससे हम लड़ते हैं उससे दूर नहीं जा सकते हम कभी भी।
इसलिए अगर कोई सेक्स से लड़ने लगा, तो वह सेक्स के आसपास ही घूमता रहेगा। उतना ही आसपास घूमेगा जितना सेक्स में डूबनेवाला घूमता है। बल्कि कई बार उससे भी ज्यादा घूमेगा। क्योंकि डूबनेवाला ऊब भी जाता है, बाहर भी होता है; यह ऊब भी नहीं पाता, यह आसपास ही घूमता रहता है।
अगर तुम क्रोध से लड़े तो तुम क्रोध ही हो जाओगे; तुम्हारा सारा व्यक्तित्व क्रोध से भर जाएगा; और तुम्हारे रग-रग, रेशे-रेशे से क्रोध की ध्वनियां निकलने लगेंगी; और तुम्हारे चारों तरफ क्रोध की तरंगें प्रवाहित होने लगेंगी। इसलिए ऋषि-मुनियों की जो हम कहानियां पढ़ते हैं--महाक्रोधी, उसका कारण है; उसका कारण है वे क्रोध से लड़नेवाले लोग हैं। कोई दुर्वासा है, कोई कोई है। उनको सिवाय अभिशाप के कुछ सूझता ही नहीं है। उनका सारा व्यक्तित्व आग हो गया है। वे पत्थर से लड़ गए हैं, वे मुश्किल में पड़ गए हैं; वे जिससे लड़े हैं, वही हो गए हैं।
तुम ऐसे ऋषि-मुनियों की कहानियां पढ़ोगे जिन्हें कि स्वर्ग से कोई अप्सरा आकर बड़े तत्काल भ्रष्ट कर देती है। आश्चर्य की बात है! यह तभी संभव है जब वे सेक्स से लड़े हों, नहीं तो संभव नहीं है। वे इतना लड़े हैं, इतना लड़े हैं, इतना लड़े हैं, इतना लड़े हैं कि लड़-लड़कर खुद ही कमजोर हो गए हैं। और सेक्स अपनी जगह खड़ा है; अब वह प्रतीक्षा कर रहा है; वह किसी भी द्वार से फूट पड़ेगा। और कम संभावना है कि अप्सरा आई हो, संभावना तो यही है कि कोई साधारण स्त्री निकली हो, लेकिन इसको अप्सरा दिखाई पड़ी हो। क्योंकि अप्सराओं ने कोई ठेका ले रखा है कि ऋषि-मुनियों को सताने के लिए आती रहें। लेकिन अगर सेक्स को बहुत सप्रेस किया गया हो, तो साधारण स्त्री भी अप्सरा हो जाती है; क्योंकि हमारा चित्त प्रोजेक्ट करने लगता है। रात वही सपने देखता है, दिन वही विचार करता है, फिर हमारा चित्त पूरा का पूरा उसी से भर जाता है। फिर कोई भी चीज...कोई भी चीज अतिमोहक हो जाती है, जो कि नहीं थी।
लड़ना नहीं, समझना
तो साधक के लिए लड़ने भर से सावधान रहना है, और समझने की कोशिश करनी है। और समझने की कोशिश का मतलब ही यह है कि तुम्हें जो मिला है प्रकृति से उसको समझना। तो तुम्हें जो नहीं मिला है, उसी मिले हुए के मार्ग से तुम्हें वह भी मिल जाएगा जो नहीं मिला है; वह पहला छोर है। अगर तुम उसी से भाग गए तो तुम दूसरे छोर पर कभी न पहुंच पाओगे। अगर सेक्स से ही घबराकर भाग गए तो ब्रह्मचर्य तक कैसे पहुंचोगे? सेक्स तो द्वार था जो प्रकृति से मिला था। ब्रह्मचर्य उसी द्वार से खोज थी जो अंत में तुम खोद पाओगे।
तो ऐसा अगर देखोगे तो मांगने जाने की कोई जरूरत नहीं, समझने जाने की तो बहुत जरूरत है; और पूरी जिंदगी समझने के लिए है--किसी से भी समझो, सब तरफ से समझो और अंततः अपने भीतर समझो।
व्यक्तियों को तौलने से बचना
प्रश्न: अभी आप सात शरीरों की चर्चा करते हैं, तो उसमें सातवें या छठवें या पांचवें शरीर--निर्वाण बॉडी, कास्मिक बॉडी और स्प्रिचुअल बॉडी को क्रमशः उपलब्ध हुए कुछ प्राचीन और अर्वाचीन अर्थात एंशिएंट और माडर्न व्यक्तियों के नाम लेने की कृपा करें।
इस झंझट में न पड़ो तो अच्छा है। इसका कोई सार नहीं है। इसका कोई अर्थ नहीं है। और अगर मैं कहूं भी, तो तुम्हारे पास उसकी जांच के लिए कोई प्रमाण नहीं होगा। और जहां तक बने व्यक्तियों को तौलने से बचना अच्छा है। उनसे कोई प्रयोजन भी नहीं है। उनसे कोई प्रयोजन नहीं है। उसका कोई अर्थ ही नहीं है। उनको जाने दो।

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