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गुरुवार, 17 जुलाई 2014

parsaeenama :


परसाईनामा :
हरिशंकर परसाई अपनी मिसाल आप, न भूतो न भविष्यति  …

बेचारा भला आदमी

मैं देखता हूँ कि हर इस तरह का प्रशंसक 'भला' के पहले 'बेचारा' ज़रूर लगता है - "बेचारा भला आदमी है" । यह अकारण नहीं है । हमारी पूरी विचार-प्रक्रिया इन दो शब्दों के साथ चलने में झलकती है । हम 'भला' उसी को कहेंगे जो 'बेचारा' हो । जब तक हम किसी को 'बेचारा' ना बना दें, तब तक उसे भला नहीं कहेंगे । क्यों ? इसके दो कारण हैं - पहला तो यह कि जो बेचारा नहीं है, वह हमें अपने लिए 'चैलेंज' लगता है । उसे हम भला क्यूँ कहें ? दूसरा कारण यह है कि जो बेचारा है उसे हम दबा सकते हैं, लूट सकते हैं - उसका शोषण कर सकते हैं ।
जो हर काम के लिए चंदा दे देता है, वह बेचारा भला आदमी है । जो रिक्शा वाला कम पैसे ले लेता है, वह बेचारा भला आदमी है । जो लेखक बिना पैसे लिये, अखबार के लिए लिख देता है, उसे सम्पादक बेचारा भला आदमी कहते हैं । टिकट कलेक्टर बेचारा भला आदमी है, क्यूंकि वह बिना टिकट निकल जाने देता है । अपनी व्यवस्था ने बहुत सोच समझकर यह मुहावरा तैयार किया है ।

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मुझे इस 'बेचारा भला आदमी' से डर लगता है । अगर देखता हूँ कि मेरे बगल में ऐसा आदमी बैठा है, जो मुझे 'बेचारा भला आदमी' कहता है, तो मैं जेब संभाल लेता हूँ । क्या पता वह जेब काट ले !

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