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शुक्रवार, 1 अगस्त 2014

sansmaran: neem ke neeche premchand -mahadevi

संस्मरणः

नीम के नीचे प्रेमचंद की चौपाल

- महादेवी वर्मा
*
"प्रेमचंदजी से मेरा प्रथम परिचय पत्र के द्वारा ही हुआ। तब मैं 8 वीं कक्षा की विद्यार्थिनी थी । उन्होंने 'चाँद' में प्रकाशित मेरी कविता 'दीपक' पर स्वयं होकर पत्र भेजा था । मैं गर्व महसूस करती रही कि वाह कथाकार भी कविता बाँचते हैं ।
उनका प्रत्यक्ष दर्शन तो विद्यापीठ आने के उपरांत हुआ। उसकी भी एक कहानी है :
एक दोपहर को जब प्रेमचंद उपस्थित हुए तो मेरी भक्तिन ने उनकी वेशभूषा से उन्हें भी अपने समान ग्रामीण या ग्राम निवासी समझा और सगर्व उन्हें सूचना दी - "गुरुजी काम कर रही हैं।"
प्रेमचंदजी ने अपने अट्टहास के साथ उत्तर दिया - "तुम तो ख़ाली हो । घड़ी-दो घड़ी बैठकर बात करो ।"
और तब, जब कुछ समय के उपरांत मैं किसी कार्यवश बाहर आयी तो देखा - नीम के नीचे चौपाल बन गई है । विद्यापीठ के चपरासी, चौकीदार, भक्तिन के नेतृत्व में उनके चारों ओर बैठे हैं और लोक-चर्चा आरंभ है ।
तो इतने सहज थे प्रेमचंद ।"

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