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मंगलवार, 16 सितंबर 2014

doha : sanjiv

दोहा:
संजीव
*
मात-पिता का हाथ था, जब तक सर पर मीत
प्राणों में घुलता रहा, शुभाशीष-संगीत
*
नहीं शीश पर हाथ अब, किसका थामें हाथ
बारिश, जाड़ा घाम सह, कहाँ नवायें माथ
*
खाँसी आह कराहना, लगता था हो बंद
बंद न ऐसे हो कभी, लगे गुम गए छंद
*
अर्पण-तर्पण क्या करूँ, कैसे मुझे न ज्ञात
मात्र समर्पण जानता, स्वीकारो माँ-तात
*
अगणित त्रुटि-गलती करीं, क्षमा आपने नित्य
क्षमा करेगा  कौन अब, कहिए पूज्य अनित्य
***   
  

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