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बुधवार, 24 सितंबर 2014

geet: gopal baghel

गोपाल बघेल 'मधु'
Gopal Baghel 'Madhu'
Greetings and gratitude with today's poem
७ जुलाई २०१४ सोमवार ०९:०९
आपकी आज की शुभकामनाओं के
शुभाशीष से सृजित अभी २ की कविता
ढाल कर पुष्प प्राणो में
ढाल कर पुष्प प्राणो में, भरे तानों वितानों में;
विचर पृथ्वी की अँगड़ाई, अखिल सौग़ात जग पाई ।
लगा हर प्राण मन भाया, तरंगित होके उर आया;
लिये झोंके में सुर मेरा, बहा आकाश स्वर प्रेरा ।
जन्म दिन जीव हर उमगा, रहा सुलगा प्रकृति संग गा;
भरा पूरा जगत उसका, रहा पुलका झलक ढ़ुलका ।
वत्स मुझको बना जग में, पुनः नव चेतना में ले ;
गोद भूमा बिठा पल में, ज्योति की श्वेत चादर में ।
'मधु' जीवन नया पाया, स्वजन बन निकट वह आया;
धमनियों औ सुष्मना में, प्रदीप्तित ओज आभा में ।
To:Sanjiv Verma,

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