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शुक्रवार, 10 अक्तूबर 2014

aaj ki rachna

दोहा :

तुलसी जब तुल सी गयी, नागफनी के साथ
वह अंदर यह हो गयी, बाहर विवश उदास. 

शे'र :
लिए हाथों में अपना सर चले पर
नहीं मंज़िल को सर कर सके अब तक

मुकतक :

मेरा गीत शहीद हो गया, दिल-दरवाज़ा नहीं खुला
दुनियादारी हुई तराज़ू, प्यार न इसमें कभी तुला
राह देख पथराती अखियाँ, आस निराश-उदास हुई
किस्मत गुपचुप रही देखती, कभी न पाई विहँस बुला

हाइकु :

ईंट रेत का
मंदिर मनहर
देव लापता

जनक छंद :

नोबल आया हाथ जब
उठा गर्व से माथ तब
आँख खोलना शेष अब

सोरठा :

घटे रमा की चाह, चाह शारदा की बढ़े
गगन न देता छाँह, भले शीश पर जा चढ़े

क्षणिका :

पुज परनारी संग
श्री गणेश गोबर हुए
रूप - रूपए का खेल
पुजें परपुरुष साथ पर
लांछित हुईं न लक्ष्मी

***

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