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शुक्रवार, 24 अक्तूबर 2014

bal kavita: mere pita

बाल कविता: 

मेरे पिता   

संजीव 'सलिल'

जब तक पिता रहे बन साया!
मैं निश्चिन्त सदा मुस्काया!
*
रोता देख उठा दुलराया 
कंधे पर ले जगत दिखाया 
उँगली थमा,कहा: 'बढ़ बेटा!
बिना चले कब पथ मिल पाया?'  
*
गिरा- उठाकर मन बहलाया 
'फिर दौड़ो'उत्साह बढ़ाया
बाँह झुला भय दूर भगाया 
'बड़े बनो' सपना दिखलाया 
*
'फिर-फिर करो प्रयास न हारो'
हरदम ऐसा पाठ पढ़ाया
बढ़ा हौसला दिया सहारा 
मंत्र जीतने का सिखलाया 
*
लालच करते देख डराया 
आलस से पीछा छुड़वाया 
'भूल न जाना मंज़िल-राहें 
दृष्टि लक्ष्य पर रखो' सिखाया 
*
रवि बन जाड़ा दूर भगाया 
शशि बन सर से ताप हटाया 
मैंने जब भी दर्पण देखा 
खुद में बिम्ब पिता का पाया 
*

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