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सोमवार, 27 अक्तूबर 2014

doha salila:

दोहा सलिला :

कथ्य भाव रस छंद लय, पंच तत्व की खान
    पड़े कान में ह्रदय छू, काव्य करे संप्राण















मिलने हम मिल में गये, मिल न सके दिल साथ 
    हमदम मिले मशीन बन, रहे हाथ में हाथ











हिल-मिलकर हम खुश रहें, दोनों बने अमीर 
मिल-जुलकर हँस जोर से, महका सकें समीर.





मन दर्पण में देख रे!, दिख जायेगा अक्स 
वो जिससे तू दूर है, पर जिसका बरअक्स

जिस देहरी ने जन्म से, अब तक करी सम्हार 
    छोड़ चली मैं अब उसे, भला करे करतार

 माटी माटी में मिले, माटी को स्वीकार
   माटी माटी से मिले, माटी ले आकार

    मैं ना हूँ तो तू रहे, दोनों मिट हों हम 
मैना - कोयल मिल गले, कभी मिटायें गम 
चित्र आभार : पिंकी जैन 

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