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शुक्रवार, 31 अक्तूबर 2014

muktak salila:

मुक्तक;

चाँद एकाकी नहीं, चांदनी सदा संग है
लगे तारों के बिना, रंग में जैसे भंग है
पूछिए नील गगन से वो परेशां क्यों है?
साथ देती न दिशाएं इसी से तंग है
*
सेहरा में जो भटका उसने राह बनाई
शूलों पर फूलों ने जीत सदा ही पाई
गम-विष को रख कंठ पुजे जग में शिवशंकर-
शोर प्रदूषण सन्नाटे ने मुक्ति दिलाई
*
कितने ही हुदहुद नीलोफर आएँ-जाएँ
देव-दनुज के समर कभी थमने ना पाएँ
सिंह सदृश मानव जिजीविषा हार न माने
 इंदु-सूर्य की दसों दिशाएँ जय-जय गाएँ
*
आनंद ही आनंद है चारों ओर देखिए
गीत ग़ज़ल दोहों में आत्मानंद लेखिए
हवा हो या पानी हो कोई फर्क क्यों करे?
भाव-रस चिरंतन में मग्न रहें रेखिए
*
'मैं' ने मैं और मैं में फर्क किया ही क्यों?
तू-तू मैं-मैं जैसा तर्क किया ही क्यों?
खुद से आँख मिलाई आयी हँसी खुद पर
स्वर्ग सरीखे जग को नरक कहा ही क्यों??
*
दिया न बुझता जैसे का तैसा रहता
जलती-बुझती बाती, मौन न कुछ कहता
तेल भरा हो या रीता हो, गिला नहीं
हो प्रकाश या तिमिर संत सम चुप सहता
*
नमन ओझा को लता पर जो खिलाता फूल है
वह तरा जो पा सका प्रभु के चरण की धूल है
धूप हो या तिमिर, सुख या दुःख सहो संमभाव से-
हुआ जो संजीव उसको चुभ न पता शूल है
*
कल के आलिंगन में कल है
वही सफल जो पाता कल है
किलकिल कभी करो क्यों?हँस लो
सृष्टि समूची प्रभु की कल है
(कल=विगत, आगत, शांति, यंत्र)
*
दल कोई भी हो नेता तो छलता ही है
सत्ता का सपना आँखों में पलता ही है
सुख-सुविधा संसद में मिल बढ़वाते रहते-
दाल देश की छाती पर वह दलता तो है
*
 


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