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रविवार, 19 अक्तूबर 2014

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नवगीत:

कमललोचना मैया!
खुश हो
मची कमल की धूम

जनगण का
जनमत आया है
शतदल
सबके मन भाया है
हाथी दूरी
पाल कमल से
मन ही मन
रो-पछताया है

ज्योतिपर्व के पूर्व
पटाखे फूटे
बम बम बूम

हँसिया गया
हाशिये पर
नहीं साथ में धान
पंजा झाड़ू थाम
सफाई करे गँवाया मान
शिव-सेना का
अमल कमल ने
तोड़ दिया अभिमान

नर-नर जब होता
नरेंद्र तब
यश लेता नभ चूम

जो तुमको
रखकर विदेश में
देते काला नाम
उनसे रूठी
भाग्य लक्ष्मी
हुआ विधाता वाम
काम सभी को
प्यारा होता
अधिक न भाये चाम

दावे कब
मिट जाएँ धूल में
किसको है मालूम
***





   

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