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गुरुवार, 16 अक्तूबर 2014

shri devendra shama 'indra' ke navgeet: pankaj parimal

श्री देवेन्द्र शर्मा 'इन्द्र' के नवगीत : गीति की नवता के निमित्त नए छंदों की परिकल्पना 

पंकज परिमल 



श्री 'इन्द्र' नवगीतकार के रूप में चरम प्रतिष्ठा को प्राप्त कवि ही नहीं हैं,नवगीत की प्रतिष्ठा के लिए उनका योगदान अलग से विशेष रूप से ध्यानाकर्षण करता है . उन्होंने आरंभिक दौर के अपने नवगीतों में अनेक शैल्पिक प्रयोग भी किए, जिनमें से कुछ उनके प्रथम प्रकाशित नवगीत-संग्रह में दृष्टव्य हैं .१९७२ में प्रकाशित 'पथरीले शोर में'से कुछ नवगीत-अंश इसी दृष्टि-विशेष से प्रस्तुत हैं .षट्पद छंदों का उल्लेख यजुर्वेद में तो मिलता है ,लेकिन द्विपद या चतुष्पद छंद ही काव्य-परिदृश्य पर छाये रहे.निराला के 'तुलसीदास'के लिए आविष्कृत अभिनव छंद के पुनः प्रयोग से पश्चाद्वर्ती व समकालीन कवियों ने इस षट्पद छंद की परंपरा को समृद्ध किया ही,श्री 'इन्द्र' ने इसकी अपने खण्डकाव्य 'कालजयी' में इसकी शतावृत्ति करके न केवल इसको सिद्ध किया,अपितु कई दूसरे षट्पद छंदों को आविष्कृत करके उनको नवगीतोपयोगी भी बनाया. इस दृष्टि से ये नवगीत-अंश देखें-
1.
एक-एक कर उदास गर्मी के 
सारे दिन गुज़र गए

सिमट गयी हरित नम्र छाया 
आकाशी देवदारु 
आरण्यक खिरनी की 
खोज रही विरल-जलद-माया 
प्यासी आँखें,सखे !
मरुथल में हिरनी की

पात-पात फूल-फूल आँधी में 
अमलतास बिखर गए 
(प्रथम दो व अंतिम दो पंक्तियाँ गीत की ध्रुव-पंक्ति या 'टेक' की हैं व इनके मध्य एक षट्पद छंद संपुटित है,जिसमें पहली व चौथी पंक्ति में 'छाया' व 'माया' के और तीसरी व छठी पंक्ति में 'खिरनी' और 'हिरनी' के तुकांत हैं ,शेष गीत में इसी नियम का निर्वाह है )
2.
('स्वप्नपंखी झील' शीर्षांकित इस नवगीत में ध्रुवपंक्ति या टेक २१ मात्राओं की है.मध्यवर्ती छंद है तो चतुष्पद ही किन्तु इसका तीसरा चरण कुछ दीर्घ है .यहाँ १५ ,१५ ,१८,१५ ,का मात्रा-प्रयोग है ,छंद की प्रथम,द्वितीय व चतुर्थ पंक्ति का तुकांत है,शेष नवगीत में इसी का निर्वाह है )
उड़ते हैं स्वप्नपंख झील के कछार

नारिकेल औ'खजूर-ताड़ 
घास-फूस काँटों के झाड़ 
गंधवती सांझ के धुंधलके में 
ऊंघ रहे नींद के पहाड़

दिशि-दिशि में बिखरा है नील अन्धकार 
3.
('टूट गए सेतु'शीर्षांकित इस नवगीत में कोई ध्रुव-पंक्ति नहीं है,केवल षट्पद छंद ही हैं,इसका मात्रा-विन्यास १२ ,१२,९ /१२,१२,९ // का है ,दूसरी व चौथी कातुकांत व तीसरी व छठी पंक्ति का तुकांत-निर्वाह पूरे गीत में है )
लो,अब तो सिमट गया 
गहरे आवर्तों में 
जल का फैलाव 
शेष रहा यादों की 
अनभीगी पर्तों में 
क्षण का सैलाब

सूख गयी गीतों की 
अश्रु झरे नयनों-सी 
रसवंती झील 
उड़ती अब आकाशे 
अनचाहे सपनों-सी 
चील-अबाबील
4.
('चन्दनी समीरों की गंध' में भी कोई ध्रुवपंक्ति नहीं है,अष्टपद छंद में ''१८,९''के मात्रा-क्रम की 4 आवृत्तियों से एक छंद पूरा होता है,दूसरी व छठी पंक्ति के व चौथी व आठवीं पंक्ति के तुकांत हैं ,ऐसे ४ छंद इस गीत में हैं )
बाँहों में भर लिया दिशाओं ने 
सारा आकाश 
चुभते रोमांचों-से दूबों की 
साँसों में तीर 
बिखर गया पल-भर में संयम का 
संचित विश्वास 
नयनों की डोरी पर काँप गयी 
कोई तस्वीर 
5.
('दिवसांत' में केवल दो ही छंद हैं,पर एकसी लयवत्ता के बावजूद दोनों के मात्रा-विन्यास अलग-अलग हैं ,शायद इसीलिए कवि ने इसे प्रयोग-भर रहने दिया,आगे नहीं बढ़ाया ,पर ऐसे भी प्रयोग नवगीत में नवता की प्रतिष्ठापना के प्रयोजन से किए जा सकते हैं,इसकी संभावना का संकेत दिया ,संस्कृत के भक्ति-स्तोत्रों में भी मिश्रित छंदों का प्रयोग मिलता ही है,शायद कुछ-कुछ वैसा यहाँ भी संभव है,लेकिन इतना अवश्य है कि छंद के पूर्वार्द्ध की गणना की पुनरावृत्ति उत्तरार्द्ध में भी करना कवि ने आवश्यक माना,और नवता का अर्थ नई परंपरा की स्थापना है,परम्परा-भंजन नहीं,छान्दसिक अनुशासनहीनता नवता के नाम पर स्वीकार्य नहीं,इस सिद्धांत की स्थापना भी की )
खामोश वन की झील (१२)
मेघों ने समेटी छाँह (१४)
तट पर की हुई वर्तुल लहर हर मौन (२१)
बिखरा कुहासा नील (१२)
फैली ज्यों किसी की बांह (१४)
पथ पर की उदासी-सा बुलाता कौन (२१)

हो रहा दिवसांत (१०)
सूरज ढल गया (९)
पश्चिम दिशा में ऊंघते हैं खेत सरसों के (२५)
तम भरा सीमान्त (१०) 
दीपक जल गया (९)
छाये नयन में दूर बिछड़े मीत बरसों के (२५)
6.
('रागारुण संध्या' का षट्पद छंद अपनी संरचनागत प्रवृत्ति में निराला के 'तुलसीदास'से कुछ मिलता-जुलता है पर अलग है,इसमें मूलछंद १२ मात्रिक है,जिसमें तीसरी व छठी पंक्ति में १० मात्राओं का एक टुकड़ा जुड़ने से ये २२ मात्राओं की हो गयी हैं,पहली-दूसरी का,तीसरी-छठी का व चौथी-पाँचवी का तुकांत है .इस नवगीत में कोई ध्रुवपंक्ति या टेक नहीं है,मात्र ४ छंद हैं.)
होली के रंग भरे 
भूली सुधि-से उभरे 
फागुनी अकाश तले रतनारे बादल 
दूर-दूर खेतों में 
गंधाकुल रेतों में 
लहराता पवनकंप-सरसों का आँचल
7.
('रागारुण संध्या' से मिलते-जुलते छंद-विन्यास का ही नवगीत 'पलकों की पाँखुरियाँ' है.मूल छंद-पंक्ति १२ मात्रिक ही है,तीसरी व छठी पंक्ति २२ के स्थान पर २४ मात्रिक है .ध्रुवपद २४ मात्रिक पंक्ति की दो आवृत्ति से बना है,क्योंकि बाद में कोई 'टेक' नहीं है और तीसरी व छठी पंक्तियों के तुकांत ध्रुवपद जैसे ही हैं,अतः २ तुकांत पंक्तियों के बंद व उसके बाद 'टेक' की व्यवस्था मानी जा सकती है. गीति में सौन्दर्य-तत्त्व के प्रतिष्ठापक कवि का यह नवगीत अविकल उद्धृत है .)
खोलो री गीतों की स्वप्नमयी पाँखुरियाँ 
छलक उठीं पनघट पर गीतों की गागरियाँ 
मेघों का घूँघट-पट 
सरकाती तम की लट 
नभ-पथ से उतर रहीं किरनों की किन्नरियाँ 
आँगन में खिली धूप
बिखरा ज्यों जातरूप 
सिहर उठीं ऊष्मा से लजवंती वल्लरियाँ 
जाग उठे ज्योतिस्नात 
गंधवाह पारिजात 
अमराई में गातीं पाटलपंखी परियाँ 
पीपल की छाँह भली 
अलसाई राह चली 
छहर रही खेतों में धानों की चूनरियाँ 
जागो-जागो राधे 
सोया-सा स्वर जागे
गूँज उठीं मधुवन में कान्हा की पांसुरियाँ 
रोमांचित दूर्वादल 
वसुधा का हरितांचल 
तैर रहीं लहरों पर सौरभ की अप्सरियाँ 
8.
('भुतहा सन्नाटे में' में १५ मात्रिक ध्रुवपंक्ति,१८,१५,१८,१५ क्रम का विषममात्रिक चतुष्पद बंद के रूप में,पश्चात् ध्रुवपंक्ति के तुकांत के अनुवर्तन में १८,२१ मात्राक्रम की २ पंक्तियों की 'टेक'है,इसी नियम का निर्वाह नवगीत के चारों छंदों में हुआ है.बंद की दूसरी-चौथी पंक्तियों के तुकांत हैं.)
दूर तलक उड़ती है रेत

पथराए सपनों के नीलकमल 
सूख गयी लहराती झील 
उग आए ऊजड़ पाटल वन में 
गोखुरू,जवास औ' करील

तपता कापालिक-सा आसमान 
धरती पर विचर रहे लपटों के प्रेत 
गीति की नवता के निमित्त श्री 'इन्द्र' के इस प्रकार के अनेक छान्दसिक प्रयोगों की एक दीर्घ श्रृंखला है,जो 'पथरीले शोर में' से आरम्भ होकर बाद के संग्रहों तक 
चली आई है व कवि के अप्रकाशित गीतों में भी कवि की यही नवताविधायिनी दृष्टि अद्यतन कार्यशील है.

{आभार: श्री रघुविंदर यादव द्वारा प्रकाशित  बाबू जी का भारत मित्र}

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