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गुरुवार, 20 नवंबर 2014

नवगीत:

अच्छा लगेगा आपको
यह जानकर अच्छा लगेगा

*
सुबह सूरज क्षितिज पर
अलसा रहा था
उषा-वसुधा-रश्मि को
भरमा रहा था
मिलीं तीनों,
भाग नभ पर
जां बचाई, कान पकड़े
अब न संध्या को ठगेगा
*
दोपहर से दिन ढले
की जी हजूरी
समय से फिर भी
नहीं पाई मजूरी
आह भरता नदी से
मिल गले रोया
लहर का मुख
देखकर पीड़ा तहेगा
*
हार अब तक नहीं मानी
फिर उठेगा
स्वप्न सब साकार करने
हँस बढ़ेगा
तिमिर बाधा कर पराजित
जब रुकेगा
सकल जग में ईश्वरवत
नित पुजेगा
*

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