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गुरुवार, 6 नवंबर 2014

navgeet:

नवगीत:

आभासी दुनिया का सच भी
झूठा सा लगता है

जिनसे कुछ संबंध नहीं है
उनसे जुड़ता नाता
नाता निकट रहा है जिनसे
यहाँ न दिखने पाता

भावनाओं से छला गया मन 
फिर-फिर फँस हँसता है

दर्द मौत दुर्घटना को भी
लाइक मिलें अनेकों
कोई नहीं विकल्प कि दूर
गुनाहों को चुन फेंको

कामनाओं से ठगा गया मन
मुक्ति न क्यों मँगता है?

ब्रम्हा जो निज सृजन-विश्व का
वह भी बना भिखारी
टैग करे, फिर लाइक माँगे 
दिल पर चलती आरी

चाह तृप्ति को जो अतृप्त वह
पंख मध्य धँसता है

***
५-११-२०१४
संजीवनी अस्पताल रायपुर

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