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बुधवार, 17 दिसंबर 2014

सृजनकार का वन्दन

आज सिरज कर नव रचनायें  सृजनकार का वन्दन कर लें
और रचेता के अनगिनती रूपों काअ भिनन्दन कर लें

चित्रकार वह जो रंगों की कूची लेकर दृश्य  बिखेरे
नाल गगन पर लहरा देता सावन के ला मेघ घनेरे
बगिया के आँगन में टाँके  शतरंगी फूलों की चादर
शून्य विजन में जीवन भर कर नई नई आभायें उकेरे

उस की इस अपरिम कूची को  नमन करें हम शीश नवाकर
आओ कविता के छन्दों से सृजनकार का वन्दन कर लें

शिल्पी कितना कुशल रचे हैं ऊँचे पर्वत, नदी नालियाँ
चम्बल से बीहड़ भी रचता, खजुराहो की शिल्पकारियाँ
मीनाक्षी, कोणार्क, सीकरी, ताजमहल यमुना के तट पर
एलोरा की गुफ़ा , अजन्ता की वे अद्भुत चित्रकारियाँ

उसके जैसा शिल्पी कोई हो सकता क्या कहो कहीं भी
एक बार फिर उसको सुमिरन करते अलख निरंजन कर लें

सृजनकार वे जिनने सिरजे वेद पुराण उपनिषद सगरी
वेदव्यास, भृगु, वाल्मीकि  औ सनत्कुमारी कलम सुनहरी
सूरा-मीरा, खुसरो,नानक, विद्यापति, जयदेव, जायसी
तुलसी जिसने वर्णित की है अवधपति के हाथ गिलहरी

उनके पदचिह्नों पर चल कर पा जाये आशीष लेखनी
महकायें निज मन का आँगन, सांस सांस को चन्दन कर लें

सृजनकार संजीव सलिल से, और खलिश जैसे संकल्पित
रचा सजा कर झाड़ पोंछ कर करत हैं घनश्याम प्रवाहित 
काव्य सलिल को, श्री प्रकाशजी, श्यामल सुमन निरंतर गतिमय
कुसुम वीरजी , ममता, वीणा ,भूटानीजी कर संपादित

शारद क ये कृपात्र सब, हो कर बद्ध रहें नतमस्तक
इनके रचनामय झोंकों से, अपना कानन नन्दन कर लें

1 टिप्पणी:

sanjiv ने कहा…

आदरणीय राकेश जी!
यह सरस सार्थक गीत पढ़वाने हेतु धन्यवाद आपका रचना कौशल असाधारण है.