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गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

दोहा सलिला:

जब वीणा के तार की, सुन पड़ती झंकार 
सलिल-कलम से शारदे, की होती मनुहार 

जब जो चाहे लिखातीं, माँ मैं उनका यंत्र 
सृजन कर्म का जानता, केवल इतना मंत्र 

पाठक-श्रोता से मिले, माँ का कृपा प्रसाद 
पा हो पाऊँ धन्य नित, इतनी है फरियाद 

1 टिप्पणी:

kusum sinha kusumsinha2000@yahoo.com ने कहा…

kusum sinha kusumsinha2000@yahoo.com

bahut hi sundar saliljee hamesha aapki kavitao me bhav bahut sundar dhang se vyakt hote hain badhai kusum sinha