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शनिवार, 20 दिसंबर 2014

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नवगीत:
संजीव
Sun and Moon
सिर्फ सच का साथ देना 
नव बरस 
धाँधली अब तक चली, अब रोक दे 
सुधारों के लिये खुद को झोंक  दे 
कर रहे मनमानियाँ, गाली बकें-
ऐसे जनप्रतिनिधि गटर में फेंक दे 
सेकते जो स्वार्थ रोटी भ्रष्ट हो 
सेठ-अफसर को न किंचित टेक दे 
टेक का निर्वाह जनगण भी करे
टेक दें घुटने दरिंदे 
इस बरस 
अँधेरों को भेंट कुछ आलोक दे 
दहशतों को दर्द-दुःख दे, शोक दे 
बेटियों-बेटों में समता पल सके- 
रिश्वती को भाड़ में तू झोंक दे 
बंजरों में फसल की उम्मीद बो 
प्रयासों के हाथ में साफल्य दे    
करें नेकी, अ-नेकी को भूलकर 
जयी हों विश्वास-आस 
हँस बरस 
.
हाथ भूखा कमा पाये रोटियाँ
निर्जला रहने न देना टोंटियाँ
अब न हो निस्तार बाहर, घर-करें  
छीन लेना रे! शकुनि से गोटियाँ
बोटियाँ कर बिन हिचक आतंक की
जय करें अब तक न जीती चोटियाँ
अंत कर अज्ञान का, पाखंड का 
बढ़ सकें, नट-बोल्ट सारे  
कस बरस 
.

3 टिप्‍पणियां:

omtiwari24@gmail.com ने कहा…

Om Prakash Tiwari omtiwari24@gmail.com

टेक दें घुटने दरिंदे
इस बरस

काश ऐसा ही हो। आदरणीय सलिल जी, आपकी कामनाओं को मेरा प्रणाम ।
सादर
ओमप्रकाश तिवा

Veena Vij vij.veena@gmail.com ने कहा…

Veena Vij vij.veena@gmail.com

Ati Sunder Nav varsh ke liye kanaayen.
Veena vij udit

sanjiv ने कहा…

मन-वीणा जब करे ओम झंकार
गीत हुलास कर खटकाते हैं द्वार
करे संगणक स्वागत टंकण यंत्र-
सरस्वती मैया की जय-जयकार