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गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

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नवगीत:
संजीव 'सलिल'



मैं लड़ूँगा....
.
लाख दागो गोलियाँ
सर छेद दो
मैं नहीं बस्ता तजूँगा।
गया विद्यालय
न वापिस लौट पाया
तो गए तुम जीत
यह किंचित न सोचो,
भोर होते ही उठाकर
फिर नये बस्ते हजारों
मैं बढूँगा।
मैं लड़ूँगा....
.
खून की नदियाँ बहीं
उसमें नहा
हर्फ़-हिज्जे फिर पढ़ूँगा।
कसम रब की है
मदरसा हो न सूना
मैं रचूँगा गीत
मिलकर अमन बोओ।
भुला औलादें तुम्हारी
तुम्हें, मेरे साथ होंगी
मैं गढूँगा।
मैं लड़ूँगा....
.  
आसमां गर स्याह है   
तो क्या हुआ?
हवा बनकर मैं बहूँगा।
दहशतों के 
बादलों को उड़ा दूँगा
मैं बनूँगा सूर्य
तुम रण हार रोओ ।
वक़्त लिक्खेगा कहानी  
फाड़ पत्थर मैं उगूँगा 
मैं खिलूँगा।
मैं लड़ूँगा....
.  
समन्वयम, 
२०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१ 
९४२५१ ८३२४४, ०७६१ २४१११३१


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