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शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014

navgeet:

नवगीत:
संजीव
.
सांस जब अविराम चलती जा रही हो
तब कलम किस तरह
चुप विश्राम कर ले?
.
शब्द-पायल की
सुनी झंकार जब-जब
अर्थ-धनु ने
की तभी टंकार तब-तब
मन गगन में विचारों का हंस कहिए
सो रहे किस तरह
सुबह-शाम कर ले?
.
घड़ी का क्या है
टँगी थिर, मगर चलती
नश्वरी दुनिया
सनातन लगे, छलती
तन सुमन में आत्मा की गंध कहिए
खो रहे किस तरह
नाम अनाम कर ले?
.

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