स्तम्भ menu

Drop Down MenusCSS Drop Down MenuPure CSS Dropdown Menu

मंगलवार, 6 जनवरी 2015

muktika:

मुक्तिका:
संजीव
.
गीतों से अनुराग न होता
जीवन कजरी-फाग न होता

रास आस से कौन रचाता?
मौसम पहने पाग न होता

निशा उषा संध्या से मिलता
कैसे सूरज आग न होता?

बाट जोहता प्रिय प्रवास की
मन-मुँडेर पर काग न होता

चंदा कहलाती कैसे तुम
गर निष्ठुरता-दाग न होता?

नागिन क्वांरी रह जाती गर
बीन सपेरा नाग न होता

'सलिल' न होता तो सच मानो  
बाट घाट घर बाग़ न होता
***

कोई टिप्पणी नहीं: