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सोमवार, 12 जनवरी 2015

navgeet: -sanjiv

नवगीत: 
संजीव 
दर्पण का दिल देखता 
कहिए, जग में कौन?
आप न कहता हाल 
भले रहे दिल सिसकता 
करता नहीं खयाल  
नयन कौन सा फड़कता? 
सबकी नज़र उतारता
लेकर राई-नौन 
पूछे नहीं सवाल 
नहीं किसी से हिचकता 
कभी न देता टाल 
और न किंचित ललकता 
रूप-अरूप निहारता 
लेकिन रहता मौन 

रहता है निष्पक्ष 
विश्व हँसे या सिसकता 
सब इसके समकक्ष 
जड़ चलता या फिसलता 
माने सबको एक सा 
हो आधा या पौन  
… 
(मुखड़ा दोहा, अन्तरा सोरठा)  

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