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शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

netaji subhash chandra bose aur bharat sarkar


नेताजी जयंती पर: नेताजी सुभाष चन्द्र बोस? और भारत सरकार 
*                                      
देश आजाद होने के बाद संसद में कई बार माँग उठी कि कथित विमान-दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु के रहस्य पर से पर्दा उठाने के लिये सरकार कोशिश करे। प्रधानमंत्री नेहरू इस माँग को दस वर्षों तक टालने में सफल रहे।  भारत सरकार इस बारे में ताईवान  (फारमोसा) सरकार से सम्पर्क ही नहीं करती थी। अन्त में जनप्रतिनिधियों (सांसदों) ने जस्टिस राधाविनोद पाल की अध्यक्षता में गैर-सरकारी जाँच आयोग के गठन का निर्णय लिया तब जाकर नेहरू ने 1956 में भारत सरकार की ओर से जाँच-आयोग के गठन की घोषणा की। 

सांसद चाहते थे कि जस्टिस राधाविनोद पाल को ही आयोग की अध्यक्षता सौंपी जाये। विश्वयुद्ध के बाद जापान के युद्धकालीन प्रधानमंत्री सह युद्ध मंत्री जनरल हिदेकी तोजो पर जो युद्धापराध का मुकदमा चला था, उसकी ज्यूरी (वार क्राईम ट्रिब्यूनल) के एक सदस्य थे- जस्टिस पाल। मुकदमे के दौरान जस्टिस पाल को  जापानी गोपनीय दस्तावेजों के अध्ययन का अवसर मिला था,  स्वाभाविक रूप से जाँच-आयोग की अध्यक्षता के लिये वे सर्वाधिक उपयुक्त व्यक्ति थे । ज्यूरी के बारह सदस्यों में से एक जस्टिस पाल ही थे, जिन्होंने जेनरल तोजो का बचाव किया था।


जापान ने दक्षिण-पूर्वी एशियायी देशों को अमेरीकी, ब्रिटिश, फ्राँसीसी और पुर्तगाली आधिपत्य से मुक्त कराने के लिये युद्ध छेड़ा था। नेताजी के दक्षिण एशिया में अवतरण के बाद भारत भी ब्रिटिश आधिपत्य से छुटकारा पाने के लिए  लिये उसके एजेंडे में शामिल हो गया। आजादी के लिये संघर्ष करना अपराध’ कैसे होता? जापान ने कहा था- ‘एशिया- एशियायियों के लिए’- इसमें गलत क्या था? जो भी हो, जस्टिस राधाविनोद पाल का नाम जापान में सम्मान के साथ लिया जाता था मगर नेहरू को आयोग की  अध्यक्षता के लिये  सबसे योग्य व्यक्ति केवल शाहनवाज खान नजर आये।

शाहनवाज खान उर्फ लेफ्टिनेण्ट जनरल एस.एन. खान आजाद हिन्द फौज के भूतपूर्व सैन्याधिकारी, आरम्भ में नेताजी के दाहिने हाथ थे, मगर इम्फाल-कोहिमा फ्रण्ट से उनके द्वारा विश्वासघात  किये जाने की खबर आने के बाद नेताजी ने उन्हें रंगून मुख्यालय वापस बुलाकर उनका कोर्ट-मार्शल करने का आदेश दे दिया था। लाल किले के कोर्ट-मार्शल में शाहनवाज खान ने खुद यह स्वीकार किया था कि आई.एन.ए./आजाद हिन्द फौज में रहते हुए उन्होंने गुप्त रूप से ब्रिटिश सेना को मदद पहुँचाई थी। बँटवारे के बाद वे पाकिस्तान चले गये थे, मगर नेहरू ने उन्हें भारत वापस बुलाकर अपने मंत्री मंडल में सचिव बना दिया था।

जांच आयोग के अध्यक्ष के रूप में शाहनवाज खान ने नेहरू के चाहे अनुसार निराधार निर्णय दे दिया की तथाकथित विमान दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु हो चुकी थी। शाहनवाज खान को पुरस्कार के रूप में नेहरू मंत्री मण्डल में रेल राज्य मंत्री बना दिया गया। आयोग के दूसरे सदस्य सुरेश कुमार बोस (नेताजी के बड़े भाई) ने खुद को शाहनवाज खान के निष्कर्ष से अलग कर लिया था। उनके अनुसार जापानी राजशाही ने विमान-दुर्घटना  का झूठा ताना-बाना बुना था और नेताजी जीवित थे।

शाहनवाज खान उर्फ लेफ्टिनेण्ट जनरल एस.एन. खान आजाद हिन्द फौज के भूतपूर्व सैन्याधिकारी, आरम्भ में नेताजी के दाहिने हाथ थे, मगर इम्फाल-कोहिमा फ्रण्ट से उनके द्वारा विश्वासघात  किये जाने की खबर आने के बाद नेताजी ने उन्हें रंगून मुख्यालय वापस बुलाकर उनका कोर्ट-मार्शल करने का आदेश दे दिया था। लाल किले के कोर्ट-मार्शल में शाहनवाज खान ने खुद यह स्वीकार किया था कि आई.एन.ए./आजाद हिन्द फौज में रहते हुए उन्होंने गुप्त रूप से ब्रिटिश सेना को मदद पहुँचाई थी। बँटवारे के बाद वे पाकिस्तान चले गये थे, मगर नेहरू ने उन्हें भारत वापस बुलाकर अपने मंत्री मंडल में सचिव बना दिया था।

शाहनवाज आयोग का निष्कर्ष देशवासियों के गले के नीचे नहीं उतरा। साढ़े तीन सौ सांसदों द्वारा पारित प्रस्ताव के आधार पर इंदिरा गाँधी सरकार को 1970 में (11 जुलाई) एक अन्य आयोग का गठन करना पडा। इस आयोग का अध्यक्ष जस्टिस जी.डी. खोसला को बनाया गया। जस्टिस घनश्याम दास खोसला के बारे में तीन तथ्य उल्लेखनीय हैं:

1. वे नेहरूजी के मित्र रहे थे;
2. वे जाँच के दौरान ही श्रीमती इन्दिरा गाँधी की जीवनी लिख  रहे थे, और
3. वे नेताजी की मृत्यु की जाँच के साथ-साथ तीन अन्य आयोगों की भी अध्यक्षता कर रहे थे।

सांसदों के दवाब के कार जांच योग को आयोग को ताईवान भेजा गया मगर ताईवान जाकर भी जस्टिस खोसला ने किसी भी सरकारी संस्था से सम्पर्क नहीं किया। वे हवाई अड्डे तथा शवदाहगृह से घूम कर वापिस आ गये। कारण यह बताया कि ताईवान के साथ भारत का कूटनीतिक सम्बन्ध नहीं है। कथित विमान-दुर्घटना में जीवित बचे कुछ लोगों के बयान इस आयोग ने लिये मगर पाकिस्तान में बसे मुख्य गवाह कर्नल हबीबुर्रहमान ने खोसला आयोग से मिलने से इन्कार कर दिया और आयोग चुप होकर बैठ गया। भारत सरकार के माध्यम से पाकिस्तान सरकार से संपर्क कर कनल हबीब को बयान देने हेतु सहमत करने का प्रयास तक नहीं किया।

खोसला आयोग की रपट पिछले शाहनवाज आयोग की रपट का सारांश साबित हुई। इसमें अगर नया कुछ था तो वह था भारत सरकार को इस मामले में पाक-साफ एवं ईमानदार साबित करने का जोरदार प्रयास। 28 अगस्त 1978 को संसद में प्रोफेसर समर गुहा के सवालों का जवाब देते हुए प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने कहा कि कुछ ऐसे आधिकारिक दस्तावेजी अभिलेख (Official Documentary Records) उजागर हुए हैं, जिनके आधार पर; साथ ही, पहले के दोनों आयोगों के निष्कर्षों पर उठनेवाले सन्देहों तथा (उन रपटों में दर्ज) गवाहों के विरोधाभासी बयानों के मद्देनजर सरकार के लिए यह स्वीकार करना मुश्किल है कि वे निर्णय अन्तिम हैं।
प्रधानमंत्री जी का यह आधिकारिक बयान अदालत में चला गया और वर्षों बाद ३०  अप्रैल 1998 को कोलकाता उच्च न्यायालय ने सरकार को आदेश दिया कि उन अभिलेखों के प्रकाश में फिर से इस मामले की जाँच करवायी जाए।

इस समय अटल बिहारी वाजपेयी जी प्रधानमंत्री थे। विविध दलों के तालमेल से किसी तरह घिसट रही यह सरकार दो-दो जाँच आयोगों का हवाला देकर इस मामले से पीछा छुड़ाना चाह रही थी, मगर न्यायालय के आदेश के बाद सरकार को तीसरे आयोग के गठन को मंजूरी देनी पड़ी।

इस बार सरकार को मौका न देते हुए आयोग के अध्यक्ष के रूप में (अवकाशप्राप्त) न्यायाधीश मनोज कुमार मुखर्जी की नियुक्ति खुद सर्वोच्च न्यायालय ही कर दी। सरकार ने  तक हो सका मुखर्जी आयोग के गठन और उनकी जाँच में रोड़े अटकाने की कोशिश की मगर जस्टिस मुखर्जी 

जीवट के आदमी साबित हुए। विपरीत परिस्थितियों में भी वे जाँच को आगे बढ़ाते रहे। आयोग ने सरकार से उन दस्तावेजों (“टॉप सीक्रेट” पी.एम.ओ. फाईल 2/64/78-पी.एम.) की माँग की, जिनके आधार पर 1978 में तत्कालीन प्रधानमंत्री ने संसद में बयान दिया था और जिनके आधार पर कोलकाता उच्च न्यायालय ने तीसरे जाँच-आयोग के गठन का आदेश दिया था

प्रधानमंत्री कार्यालय और गृहमंत्रालय दोनों साफ मुकर जाते हैं- ऐसे कोई दस्तावेज नहीं हैं; होंगे भी      
तो हवा में गायब हो गये आप यकीन नहीं करेंगे कि जो दस्तावेज खोसला आयोग को दिए गए थे, वे दस्तावेज भी मुखर्जी आयोग को देखने नहीं दिये गये, 'गोपनीय' और 'अतिगोपनीय' दस्तावेजों की बात तो छोड़ ही दीजिये । प्रधानमंत्री कार्यालय, गृह मंत्रालय, विदेश मंत्रालय सभी जगह नौकरशाहों का यही एक जवाब था- “भारत के संविधान की धारा 74(2) और साक्ष्य कानून के भाग 123 एवं 124 के तहत इन दस्तावेजों को आयोग को नहीं दिखाने का “प्रिविलेज” उन्हें प्राप्त है!”

भारत सरकार के रवैये के विपरीत ताईवान सरकार ने मुखर्जी आयोग द्वारा माँगा गया एक-एक दस्तावेज आयोग उपलब्ध कराया। ताईवान के साथ भारत का कूटनीतिक सम्बन्ध न होने के कारण  भारत सरकार किसी प्रकार का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष दवाब ताईवान सरकार पर नहीं डाल सकती थी शायद इसलिए ही योग को ताइवान सरकार का सहयोग मिल सका।

प्रधानमंत्री कार्यालय और गृहमंत्रालय दोनों साफ मुकर जाते हैं- ऐसे कोई दस्तावेज नहीं हैं; होंगे भी तो हवा में गायब हो गये आप यकीन नहीं करेंगे कि जो दस्तावेज खोसला आयोग को दिए गए थे, वे दस्तावेज भी मुखर्जी आयोग को देखने नहीं दिये गये, 'गोपनीय' और 'अतिगोपनीय' दस्तावेजों की बात तो छोड़ ही दीजिये । प्रधानमंत्री कार्यालय, गृह मंत्रालय, विदेश मंत्रालय सभी जगह नौकरशाहों का यही एक जवाब था- “भारत के संविधान की धारा 74(2) और साक्ष्य कानून के भाग 123 एवं 124 के तहत इन दस्तावेजों को आयोग को नहीं दिखाने का “प्रिविलेज” उन्हें प्राप्त है!”   

रूस के मामले में ऐसा नहीं था। भारत का रूस के साथ गहरा सम्बन्ध था। अतः रूस सरकार का स्पष्ट मत था कि जब तक भारत सरकार आधिकारिक रूप से अनुरोध नहीं भेजती, वह आयोग को न तो नेताजी से जुड़े गोपनीय दस्तावेज देखने दे सकती थी और न ही कुजनेत्सन, क्लाश्निकोव- जैसे महत्वपूर्ण गवाहों का साक्षात्कार लेने दे सकती थी। भारत सर्मर ने अपने द्वारा गठित आयोग के साथ सहयोग करने का अनुरोध रूस सरकार से नहीं किया। फलतः, आयोग रूस से खाली हाथ लौट आया। जनता के सामने सरकार की बदनीयत का पर्दाफाश हो गया की वह सच सामने नहीं आने देना चाहती। इसके बावजूद मुखेर्जी योग ने जाँच जारी रखी। 
मुखर्जी आयोग ने जहाँ  “गुमनामी बाबा” के मामले में गम्भीर तरीके से जाँच की, वहीं स्वामी शारदानन्द के मामले में गम्भीरता नहीं दिखाई। आयोग फैजाबाद के राम भवन तक तो गया जहाँ गुमनामी बाबा रहे थे किन्तु राजपुर रोड की उस कोठी तक नहीं गया, जहाँ शारदानन्द रहे थे। आयोग ने गुमनामी बाबा की हर वस्तु की जाँच की मगर उ.प्र. पुलिस/प्रशासन से शारदानन्द के अन्तिम संस्कार के छायाचित्र माँगने का कष्ट नहीं उठाया।

मई' 64 के बाद जब स्वामी शारदानन्द सतपुरा (महाराष्ट्र) के मेलघाट के जंगलों में अज्ञातवास किया था, तब उनके साथ सम्पर्क में रहे डॉ. सुरेश पाध्ये का आयोग योग के सामने कहना था कि उन्होंने खुद स्वामी शारदानन्द और उनके परिवारजनों तथा वकील के कहने के कारण (1971 में) ‘खोसला आयोग’ के सामने सच्चाई का बयान नहीं किया था। अब चूँकि स्वामीजी का देहावसान हो चुका है, इसलिए वे (26 जून 2003 को) मुखर्जी आयोग को सच्चाई बताते हैं। मगर आयोग उनकी तीन दिनों की गवाही को (अपनी रिपोर्ट में) आधे वाक्य में समेट देता है और दस्तावेजों को (जो कि वजन में ही 70 किलो है) एकदम नजरअन्दाज कर देता है। यह सब कुछ किसके दवाब में  किया गया- यह राज शायद भविष्य में ही खुले।
2005 में दिल्ली में फिर काँग्रेस की सरकार बनी। इस सरकार ने मई में जाँच आयोग को छह महीनों की समय वृद्धि दी। 8 नवम्बर 2005 को आयोग ने अपनी रपट सरकार को सौंप दी। सरकार इस पर कुण्डली मारकर बैठ गयी। दवाब पड़ने पर 18 मई 2006 को रपट को संसद के पटल पर रखा गया।

मुखर्जी आयोग को पाँच विन्दुओं पर जाँच करना था:               
1. नेताजी जीवित हैं या मृत? 
2. अगर वे जीवित नहीं हैं, तो क्या उनकी मृत्यु विमान-दुर्घटना में हुई, जैसा कि बताया जाता है? 
3. क्या जापान के रेन्कोजी मन्दिर में रखा अस्थि भस्म नेताजी  का है? 
4. क्या उनकी मृत्यु कहीं और, किसी और तरीके से हुई, अगर ऐसा है, तो कब और कैसे? 
5. अगर वे जीवित हैं, तो अब वे कहाँ हैं?

आयोग का निष्कर्ष कहता है कि-
1. नेताजी अब जीवित नहीं हैं। 
2. किसी विमान-दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु नहीं हुई है।
3. रेन्कोजी मन्दिर (टोक्यो) में रखा अस्थिभस्म नेताजी का नहीं है।
4. उनकी मृत्यु कैसे और कहाँ हुई- इसका जवाब आयोग नहीं ढूँढ़ पाया।
5. इसका उत्तर क्रमांक 1 में दे दिया गया है। 
सरकार ने इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया।  बाद में सरकार द्वारा नेताजी को भारत रत्न (मरणोपरांत) से सम्मानित किये जाने के निर्णय के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत वाद में सरकार ने नेताजी के जीवित न होने सम्बन्धी कोई जानकारी न देकर निर्णय वापिस ले लिया।    
निस्संदेह नेताजी सुभाषचंद्र बोस आज भी भारतीय जनता के नायक हैं। उनके जीवन का उत्तरार्ध आज भी अज्ञात है। जनता सच जानना चाहती है और उसे इसका हक भी है। लम्बे समय बाद भारत में राष्ट्रीयता और जनमत का सम्मान करनेवाली स्शाक्र सरकार है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के मन में नेताजी के व्यक्तित्व और अवदान के प्रति गहरा सम्मान है। सरदार पटेल के व्यक्तित्व और अवदान के प्रति गहन सम्मान प्रदर्शित करते हुए उनकी सर्वोच्च प्रतिमा निर्माण का कार्य मोदी जी करा रहे हैं। क्या वे नेता जी सबन्धी सच जानने की जनाकांक्षा का सम्मान करते हुए एक स्वतंत्र योग का गठन कर उसे सरकार की ओर से समस्त प्रपत्र, नस्तियां, समर्थन और सहयोग दे सकेंगे? समय उनकी सामर्थ्य और योगदान की चर्चा करते समय नेताजी के सम्बन्ध में उनके द्वारा उठाये गए कदम का भी लेखा-जोखा करेगा ही। 
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