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रविवार, 8 फ़रवरी 2015

चन्द माहिया : क़िस्त 15


:1:
ये रात ये तनहाई
सोने नहीं देती
वो तेरी अँगड़ाई

;2:
जो तूने कहा ,माना
तेरी निगाहों में 
फिर भी हूँ बेगाना

:3:
कुछ दर्द-ए-ज़माना है
और ग़म-ए-जानाँ
जीने का बहाना है

:4:
कूचे जो गये तेरे
सजदे से पहले 
याद आए गुनह मेरे

:5:
इक वो भी ज़माना था
रूठे वो हँस कर
मुझको ही मनाना था

-आनन्द.पाठक
09413395592


1 टिप्पणी:

संजीव ने कहा…

वाह... वाह... मजा आ गया. आपके माहिए लाजवाब होते हैं.