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रविवार, 1 फ़रवरी 2015

कृति चर्चा: (पद्य/दोहा समीक्षा) दोहे पर्यावरण के

kruti charcha: dohe paryavaran ke  
कृति चर्चा: (पद्य/दोहा समीक्षा)
दोहे पर्यावरण के : श्लोक ऋचाएं मन्त्र
चर्चाकार: आचार्य  संजीव 
[कृति विवरण: दोहे पर्यावरण के, दोहा संग्रहकृष्णस्वरूप शर्मा ‘मैथिलेन्द्र’, आकार डिमाई, आवरण पेपर बैक दोरंगा, २००४, पृष्ठ ५०, ३०/-, संपर्क: गीतांजलि, ८ आवास मंडल उपनिवेश, नर्मदापुर ४६१००१] 

समयजयी दोहा सधा, मैथिलेन्द्र को मीत
‘दोहे पर्यावरण के, करें प्रकृति से प्रीत

जननि प्रकृति को मानते, हैं भारत के लोग
इसीलिये पूजन करें, किन्तु न शोषण-भोग

दोहन-शोषण प्रकृति का, करता पश्चिम खूब
आमंत्रित निज नाश कर, गया भोग से ऊब

वृक्ष सहित हँसती धरा, होता मरु श्रीहीन
काट वन्य श्री हो रहा, मानव खुद ही दीन

नित्य प्रदूषित कर रहा, मनुज पवन भू नीर
‘सलिल’-खाद्य हो शुद्ध तो, मिटे रोग दुःख पीर

जैविक खेती के लिये, गाय एक वरदान
माता और सपूत हों, गाय और इंसान

मैथिलेन्द्र सच बोलते, बैठ नर्मदा-तीर
पर्यावरण सुधार लें, हम सब धरकर धीर


सहज-सरल भाषा रखी, पाठक लें आनंद
कथ्य-तथ्य स्पष्ट हैं, जो न गुने मतिमंद

पीपल तुलसी नीम के, लिखे कई उपयोग
सेब आँवला बिही भी, हरें व्याधियाँ-रोग

दोहे पर्यावरण के, श्लोक ऋचाएँ मंत्र
जंगन का हित साधने, दोहा उत्तम यंत्र

साधुवाद के पात्र हैं, शर्मा कृष्णस्वरूप
दोहा दुनिया में सजे मैथिलेन्द्र बन भूप

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