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शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015

डा. विष्णु विराट

डा. विष्णु विराट
करें स्मरण, नमन, वंदन :
हिंदी तथा बृज के सरस गीता-दोहाकार, प्रतिष्ठित विद्वान डॉ. विष्णु विराट का देहावसान हो गया.
मेरी वड़ोदरा यात्रा में बिना पूर्व परिचय के सूचना मिलने पर विराट जी ने अतिथिगृह में प्रवास की व्यवस्था कराई, विश्व विद्यालय के हिंदी विभाग में मेरे मुख्यातिथ्य में गोष्ठी, प्राध्यापकों के साथ बैठक तथा एम्. ए. हिंदी के विद्यार्थियों की कक्षा को संबोधन कराया. उनके द्वारा भेंट दी गयी पुस्तक आज अमूल्य निधि है. उनसे सुना काव्यपाठ कानों में गूँज रहा है. मैं तथा नवीन जी विराट जी के साथ हिंदी-बृज के लोकगीतों पर काम करने की योजना बनाते ही रह गए और वे बृज बिहारी को होली का फगुआ सुनाने चल दिये.
उन्हें और उनके अवदान को, उनकी विराटता को शत-शत नमन.
विराट में विराट लीन हो गये
गीत कुञ्ज दुखी दीन हो गए
विष्णु से समीप विष्णु जो गये-
हर्ष के दोहे विलीन हो गये.
*
गये विराट
शेष रहे वामन
मन उचाट
*
हिंदी माँ गमगीन है, खोकर पुत्र विराट
बृज गुमसुम है यादकर, उन्नत किया ललाट
*
हिंदी के गुणवान सुत, बृज के रसिक सुजान
भाव बिम्ब लय छंद के, चाहक थे रस-खान
चाहक थे रस-खान, विष्णु जी सच विराट थे
दोहों के मणिदीप, गीत के सुदृढ़ लाट थे
सलिल नमन कर धन्य, ध्वजा वाहक हिंदी के!
ग्रंथों में हो अमर, पुत्र माता हिंदी के 

*

विष्णु जी की कुछ प्रतिनिधि रचनाओं को पढ़कर उन्हें स्मरण करें:

तेरा तुझको अर्पण.... 

हम ग़ज़ल कहते नहीं आत्मदाह करते हैं - डा. विष्णु विराट

लगभग साठ ग्रंथ प्रकाशित, राष्ट्रीय काव्य मंच से संलग्न,
नवगीत के प्रतिनिधि हस्ताक्षर,
निदेशक - गुजरात हिंदी प्रचारिणी सभा,
अध्यक्ष - हिंदी विभाग, म. स. विश्वविद्यालय, बडौदा 
मुक्तक: 
लोग  सुनते  हैं  और  वाह  वाह  करते  हैं।
इससे  लेकिन  दिलों  के  ज़ख्म  कहाँ  भरते  है।
हाथ रखिये  ज़रा  चलते  हुए  शब्दों  पे  'विराट'।
हम  ग़ज़ल  कहते  नहीं  आत्मदाह  करते  हैं।।
.
देखते  हैं , जाँचते हैं , तोलते  हैं।
बे -ज़रुरत,  खुद,  न खुद  को,  खोलते  हैं।
सह  नहीं  पाती  व्यवस्था,  सोच  अपनी।
हम  बहुत  ख़तरा  उठाकर   बोलते  हैं।।
.
ग़ैर  तो  ग़ैर  हैं  पर  तू  तो  हमारा  होता  ।
मैं  नहीं  थकता  अगर  तेरा  सहारा  होता।
तूने  खोले  ही  नहीं  अपनी  तुरफ़  के  पत्ते।
वर्ना  जीती  हुयी  बाज़ी  न  मैं  हारा  होता।।
.
माँ  के  हँसते  हुए  मुस्काते  नयन  सा  बच्चा।
चाँदनी  रात  में  चंदा  की  किरन  सा  बच्चा।
खो  गया  है  कहीं  पत्थर  के  शहर   में  यारो।
चौकड़ी  भरता  हवाओं  में  हिरन  सा  बच्चा।।
.
मेरे  चरणों  में  बैठकर  उपासते  हैं  लोग।
सामने  मेरे  ही  मुझको  तलाशते  हैं  लोग।
कभी  चन्दन  का  काष्ट  कहके  या  संगेमरमर।
बड़ी  सफाई  से  मुझको  तराशते  हैं  लोग।।
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जो  न  सहना  है  वो  भी  सहता  हूँ।
दर्द  दिल  का  न  कभी  कहता  हूँ।
तुझको  मेरा  पता  मिलेगा  नहीं।
मैं  अपने  घर  में  कहाँ  रहता  हूँ।।

मैं  नदी  या  हवा  में  बहता  हूँ।
धूल  बरसात  सभी  सहता  हूँ।
तू  मेरे  मन  को  तो  छू  पाया  नहीं।
मैं  अपने  तन  में  कहाँ  रहता  हूँ।।
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रात  भर  अन्धकार  से  लड़ने।
एक  दीपक  ही  क्यूँ  सुलगता  है।
आग  को  आग  मानने  के  लिए।
वक़्त  को वक़्त  बहुत  लगता  है।।
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सूर्य के मंत्र हैं हम, ज्योति के घड़े भी हैं।
जहाँ हों खौफ़ के साये, वहाँ बढे भी हैं।
छुरी  की  धार  अँधेरे  के कलेज़े पर  हम।
माना  खद्योत  हैं,  पर  रात  से  लड़े  भी  हैं।।
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माना  युग  के  ताज़  नहीं  हैं।
चर्चाओं  में आज नहीं  हैं।
फिर  भी  गीत  हमारे  यारों। 
परिचय  के  मोहताज़ नहीं   हैं।।
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माँ तुम्हारी याद 
देह में जमने लगी
बहती नदी है
सांस लेने में लगी पूरी सदी है,
चेतना पर धुंध छाई है
माँ तुम्हारी याद आई है।
हम गगन में है
न धरती पर
बस हवाओं में हवाएँ हैं,
धूप की कुछ गुनगुनी किरनें,
ये तुम्हारी ही दुआएँ हैं,
कान जैसे सूर के पद सुन रहे हैं,
किंतु मन के तार सब अवगुन रहे हैं,
गोद में सिर रख ज़रा सो लूँ,
फिर जनमभर रत-जगाई है।
जंगलों से वह बचा लाई
एक बांसती अभय देकर
लोरियाँ हमको सुनाती है
फिर वही रंगीन लय लेकर,
प्यार से सिर पर रखा आँचल तुम्हारा
मैं तभी से युद्ध कोई भी न हारा
झूठ ने ऐसी जगाई आँच
सच ने गर्दन झुकाई है
माँ तुम्हारी याद आई है।
देख तुलसी में नई कोपल
बोझ अब उतरा मेरे सिर से
झर रहे हैं फूल हर सिंगार
मन हरा होने लगा फिर से
द्वार पर शहनाइयाँ
बजने लगी हैं,
छोरियाँ मेहंदी रचा सजने लगी हैं,
आज बिटिया की सगाई है
माँ तुम्हारी याद आई है।
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पिता 
मत हमसे पूछिए कि कैसे जिए पिता?
बूँद-बूँद से भरा किए घट खुद खाली होकर
कांटे-कांटे जिए स्वयं हमको गुलाब बोकर,
हमें भगीरथ बन गंगा की लहरें सौंप गए,
खुद अगस्त्य बन सागर भर-भर आँसू पिए पिता।
झुकी देह जैसे झुक जाती फल वाली डाली,
झुक-झुक अपने बच्चों की ढूँढ़े हरियाली,
लथपथ हुए पसीने से लो, कहाँ खो गए आज
थके हुए हमको मेले में कांधे लिए पिता।
बली बने तो विहंस दर्द के वामन न्यौत दिए,
कर्ण बने तो नौंच कवच कुंडल तक दान किए,
नीलकंठ विषपायी शिव को हमने देखा है
कालकूट हो या कि हलाहल हँस-हँस पिए पिता
तुम क्या जानो पिता-शब्द के अंतर की ज्वाला,
कितना पानी बरसाता बादल बिजली वाला,
अंधकार में दीपावलि के पर्व तुम्हीं तो थे
घर आँगन देहर पर तुम ही जलते दिए पिता।
मंदिर मस्जिद गिरजा, गुरुद्वारों में क्या जाना,
क्या काबा, क्या काशी - मथुरा बस मन बहलावा
जप तप जंत्र मंत्र तीरथ सब झूठे लगते हैं
ईश्वर स्वयं सामने अपने आराधिए पिता।
कुशल-क्षेम पूछने स्वप्न में अब भी आते हैं,
देकर शुभ आशीष पीठ अब भी सहलाते हैं,
हम भी तुम से लिपट-लिपट कर बहुत-बहुत रोए
देखो अंजुलि भर-भर आँसू अर्पण किए पिता।
मौन हुए तो लगा कि मीलों-मीलों रोए हैं,
शरशैया पर जैसे भीष्म पितामह सोए हैं,
राजा शिवि की देह हडि्डयों में दधीचि बैठा
दिए-दिए ही किए अंत तक कुछ ना लिए पिता।
हमसे मत पूछिए, चिता आँखों में जलती है
हमसे मत पूछिए हमारी जान निकलती है
हमसे मत पूछिए कलेजा कैसे फटता है
बिना तुम्हारे फटे कलेजे किसने सिए पिता।
.
सुमरनी है पितामह की
मंत्र है यह
भजन है
यह प्रार्थना है,
इसे दूषित हाथ से छूना मना है,
यह प्रतिष्ठा है मेरे गृह की,
यह सुमरनी है पितामह की।
राम हैं इसमें, अवध है, जानकी है,
छवि इसी में कृष्ण की मुस्कान की है,
वेद इसमें, भागवत, गीता, रमायन,
आसुरी मन वृत्तियों का है पलायन
गीत है, गोविंद का गुनगान है ये,
भूमि से गोलोक तक प्रस्थान है ये,
थाह है हर भ्रांति के तह की,
यह सुमरनी है पितामह की।
ज़िंदगी भर एक निष्ठा पर रहे जो,
टूट जाना किंतु झुकना मत कहे जो,
प्राण है इसमें, पवन है, आग भी है,
ज्ञान है, वैराग्य है, अनुराग भी है,
अडिग है विश्वास, निष्ठा का समर्पण,
व्यक्ति के सदभाव का है सही दर्पण,
यह बगीची याद की महकी,
यह सुमरनी है पितामह की।
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वेदों के मंत्र हैं
हम न मौसमी बादल
हम न घटा बरसाती
पानी की हम नहीं लकीर,
वेदों के मंत्र हैं, ऋचाएँ हैं।
हवा हैं गगन हैं हम,
क्षिति हैं, जल,
अग्नि हैं दिशाओं में,
हम तो बस हम ही हैं,
हमको मत ढूँढ़ो उपमाओं में,
शिलालेख लिखते हम,
हम नहीं लकीर के फकीर
जीवन के भाष्य हैं, कथाएँ हैं।
वाणी के वरद-पुत्र,
वागर्थी अभियोजक हैं अनन्य,
प्रस्थापित प्रांजल प्रतिमाएँ हैं,
शिव हैं कल्याणमयी,
विधि के वरदान घन्य,
विष्णु की विराट भंगिमाएँ हैं,
खुशियों के मेले हम
यायावर घूमते फकीर
आदमक़द विश्व की व्यथाएँ हैं।

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