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सोमवार, 23 फ़रवरी 2015

navgeet: dr. issak ashq

तीन नवगीत
डॉ. इसाक ‘अश्क’
१.
गमलों खिले गुलाब
हर सिंगार
फिर झरे
कुहासों के.
दिन जैसे
मधु रंगों में-
बोरे,
गौर
गुलाबी-
नयनों के डोरे,
आँगन  
लौटे विहग
सुहासों के.
उमड़ी
गंधोंवाली-
मौन नदी,
देख जिसे
विस्मित है-
समय-सदी
गमलों
खिले गुलाब
उजासों के.
.
पुलोवर बुनती
यह जाड़े की धूप
पुलोवर
बुनती सी.
सुबह
चंपई-
तौर-तरीके जीने के,
सिखा रही
अँजुरी भर
आसव पीने के,
चीड़ वनों में
ओस कणों को
चुनती सी.
गंधों का
उत्सव-
फूलों की बस्ती में,
मना रहे
दिन-रात-
डूबकर मस्ती में,
वंशी मादल की
थापों को
सुनती सी
.
३ 
तक्षक सी हवा
भोर ने
तालों लिखे
आलेख गहरी धुंध के.
लोग बैठे
देह को-
गठरी बनाये,
खोल सकती हैं
जिन्हें बस-
ऊष्माएं,
ओसकण
जैसे की कोमल
अंतरे हों छंद के.
तेज तक्षक सी हवा-
फुंफकारती है,
डंक
बिच्छू सा उठाकर-
मारती है,
प्राण संकट में पड़े हैं
सोनचिड़िया गंध के

.   

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