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शनिवार, 7 फ़रवरी 2015

navgeet: sanjiv

नवगीत:
यह कैसा मेहमान?
संजीव
.
यह कैसा मेहमान हमारा?
यह कैसा विश्वास??
.
अपना वाहन साथ लाये हैं 
सैनिक बल भी साथ आये हैं
हम पर अविश्वास, अक्षम हम या
खो बैठे आस??
.
करें प्रशंसा का अभिनय मिल
भार देश पर अरबों का बिल
नहीं सादगी तनिक कहीं भी
गाँधी का उपहास
.
फ़िक्र गरीबों की भारी है
सूट विदेशी अय्यारी है
पंक्तिबद्ध धन्नासेठों से
जनहित की ना आस
.
बनी छावनी सारी दिल्ली
घुस न सके चिड़िया या बिल्ली
आम आदमी है प्रतिबंधित
सहे मौन संत्रास
.
सिर्फ प्रदर्शन और दिखावा
राजनीति हो गयी छलावा
भोज किया बिन भोग लगाये
हैं खासों के ख़ास
२६-१-२०१५ 
*** 

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