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सोमवार, 23 फ़रवरी 2015

navgeet: sanjiv

नवगीत :
संजीव 
.
प्रिय फागुन की धूप 
कबीरा 
गाती सी.
.
अलसाई सी
उठी अनमनी
झुँझलाती.
बिखरी अलकें
निखरी पलकें
शरमाती.
पवन छेड़ता
आँख दिखाती
धमकाती.
चुप फागुन की धूप
लिख रही
पाती सी.
.
बरसाने की
गैल जा रही
राधा सी.
गोकुल ठांड़ी
सुगढ़ सलौनी
बाधा सी.
यमुना तीरे
रास रचाती
बलखाती.
छिप फागुन की धूप
आ रही
जाती सी.
*

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