स्तम्भ menu

Drop Down MenusCSS Drop Down MenuPure CSS Dropdown Menu

बुधवार, 4 मार्च 2015

kruti charcha: nadiyaan kyon chup hain, radheshyam bandhu -sanjiv

कृति चर्चा :
‘नदियाँ क्यों चुप हैं?’ विसंगतियों पर आस्था का जयघोष
चर्चाकार: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
[कृति विववरण: नदियाँ क्यों चुप हैं?, नवगीत संग्रह, राधेश्याम बंधु, आकार डिमाई, पृष्ठ ११२, मूल्य १५०/-, आवरण बहुरंगी सजिल्द जैकेटयुक्त, वर्ष २०११, कोणार्क प्रकाशन, बी ३/१६३ यमुना विहार दिल्ली ११००५३, संपर्क: ९८६८४४४६६६, rsbandhrsbandhu2@gmail.com] 
.
                       दादी सी दुबली, गरीब हैं नदियाँ बहुत उदास
        सबकी प्यास बुझातीं, उनकी कौन बुझाये प्यास?
.
                       जब सारा जल
                       जहर हो रहा नदियाँ क्यों चुप हैं?
.

उक्त २ उद्धरण श्रेष्ठ-ज्येष्ठ नवगीतकार राधेश्याम बंधु के चिन्तनपरक नवगीतों में अन्तर्निहित संतुलित, समन्वित, विचारधारा के संकेतक हैं कि उनकी सोच एकांगी नहीं है, वे विसंगति और विडम्बना के दोनों पक्षों का विचार कर नीर-क्षीर प्रवृत्ति परक नवगीत रचते हैं, उनका आग्रह ‘कला’ को साध्य मानने के प्रति कम तथा ‘कथ्य’ को साध्य मानने के प्रति अधिक है. वे नवगीत में छंद की अंतर्व्याप्ति के पक्षधर हैं. उनके अपने शब्दों में: ‘मनुष्य ने जब भी अपनी अन्तरंग अनुभूतियों की अनुगूंज अपने मन में सुननी चाही, तो उसे सदैव गीतात्मक प्रतीति की अनुगूंज ही सुनाई पड़ी. वहाँ विचार या विमर्श का कोई अस्तित्व नहीं होता. हम चाहे जितने आधुनिकता या उत्तर आधुनिकता के रंग में रंग जाएँ, हम अपने सांस्कृतिक परिवेश और लोकचेतना के सौन्दर्यबोध से कभी अलग नहीं हो सकते. इतिहास साक्षी है कि  जब भी हर्ष, विषद या संघर्ष की अनुभूतियों को अभिव्यक्त करने की आवश्यकता हुई तो लयात्मक छान्दस कविता ही उसके लिये माध्यम बनी. आदि कवि बाल्मीकि से लेकर निराला तक के कविता के इतिहास पर यदि हम दृष्टि डालें तो हम पायेंगे कि इतने लम्बे कालखंड में छन्दस काव्य का ही सातत्य विद्यमान है. वह चाहे ऋचा हो या झूले का गीत हो.’

इस संग्रह के गीत कथ्य की दृष्टि से नवगीत (२७) तथा जनगीत (१५) में वर्गीकृत हैं किन्तु उनमें पर्यावरण के प्रति चिंता सर्वत्र दृष्टव्य है. प्रदूषण प्राकृतिक पर्यावरण में हो अथवा सामाजिक पर्यावरण में वह बंधु जी को क्लेश पहुँचाता है. इस संग्रह का वैशिष्ट्य एक पात्र को विविध रूपकों में ढाल कर उसके माध्यम से विसंगतियों और विडम्बनाओं का इंगित करना है. चाँदनी, नदी, आदि के माध्यम से कवि वह सब कहता है जो सामान्य जन अनुभव करते हैं पर अभिव्यक्त नहीं कर पाते:

यहाँ ‘नदी’ जलधार मात्र नहीं है, वह चेतना की संवाहक प्रतीक है, वह जीवन्तता की पर्याय है:

संसद की
राशन की नदियाँ
किस तहखाने में खो जाती?
.
प्यासी नदी
रेत पर तड़पे
अब तो बादल आ
.
कैसे दिन
आये रिश्तों की
नदिया सूख गयी.
.
पाषाणों
में भी हमने
नदिया की तरज जिया.

मानव जीवन में खुशहाली के लिये हरियाली और छाँव आवश्यक है:

फिर-फिर
जेठ तपेगा आँगन
हरियल पेड़ लगाये रखना
विश्वासों के
हरसिंगार की
शीतल छाँव बचाये रखना

बादल भी विसंगतियों का वाहक है:

राजा बन बादल जुलूस में   
हठी पर आते
हाथ हिलाकर प्यासी जनता
को हैं बहलाते
.
फिर-फिर
तस्कर बादल आते
फिर भी प्यास नहीं बुझ पाती
.
जब बादल बदल गए तो चांदनी कैसे अपनी मर्यादा में रहे:
कभी उतर आँगन में
निशिगंधा चूमती
कभी खड़ी खिड़की पर
ननदी सी झाँकती

निराश न हों, कहते हैं आशा पर आकाश थमा है. कालिमा कितनी भी प्रबल क्यों न हो जाए चाँदनी अपनी धवलता से निर्मलता का प्रसार करेगी ही:

उतरेगी
दूधिया चाँदनी
खिड़की जरा खुली रहने दो
.
कठिनाई यह है कि बेचारी चाँदनी के लिये इंसान ने कहीं स्थान ही नहीं छोड़ा है:

पत्थर के
शहरों में अब तो
मिलती नहीं चाँदनी है
बातूनी
चंचल बंगलों में
दिखती नहीं चाँदनी है
.

इस जीवन शैली में किसी को किसी के लिये समय नहीं है और चाँदनी नाउम्मीद हुई जाती है:

लेटी है बेचैन चाँदनी  
पर आँखों में नींद कहाँ?
आँखें जब रतजगा करें तो
सपनों की उम्मीद कहाँ?रिश्तों की
उलझी अलकें भी
कोई नहीं सँवार रहा
.
नाउम्मीदी तो किसी समस्या का हल हो नहीं सकती. कोशिश किये बिना कोई समाधान नहीं मिलता. इसलिए चाँदनी लगातार प्रयासरत रहती है:
रिश्तों की
उलझन को
सुलझाती चाँदनी
एकाकी
जीना क्या
समझाती चाँदनी
.

बंधु जी विसंगतियों का संकेतन स्पष्टता से करते हैं:
चाँदनी को
धूप मैं, कैसे कहूँ
वह भले ही तपन का अहसास दे?
.
नारी है
चाँदनी प्यार की
हर घर की मुस्कान
फिर भी
खोयी शकुंतला की
अब भी क्यों पहचान?
.
कम भले हो
तन का आयतन
प्यार का घनत्व कम न हो
.
अपनेपन की कोमल अनुभूति को समेटे कवि प्यार दो या न दो / प्यार से टेर लो, मौन / तुम्हारा इतना मादक / जब बोलोगे तब क्या होगा, धुप बनी / या छाँव बनो / हम तुम्हें खोज लेंगे, शब्दों / के पंख उड़ चले / चलो चलें सपनों के गाँव, चलो बचा लें / महुआवाले / रिश्तों का अहसास आदि में रूमानियत उड़ेलते हुए नवगीत ओ क्लिष्ट शब्दों और जटिल अनुभूतियों से भरनेवाले कला के पक्षधरों को अपनी सरलता-सहजता से निरुत्तरित करते हैं.

जनगीतों में बन्धु जी मनुष्य की अस्मिता के संरक्षण हेतु कलम चलाते हैं: 

आदमी कुछ भी नहीं
फिर भी वतन की आन है
हर अँधेरी झोपड़ी का
वह स्वयं दिनमान है
जब पसीने की कलम से
वक्त खुद गीता लिखे
एक ग्वाला भी कभी
बनता स्वयं भगवान् है.
.
भारत में श्रम की प्रतिष्ठा तथा मूल्यांकन न होना पूँजी के असमान वितरण का कारण है. बंधु जी को श्रम ही अँधेरा मिटाकर उजाला करने में समर्थ प्रतीत होता है:

उगा
सूर्य श्रम का
अँधेरा मिटेगा
गयी धुंध दुःख की
उजाला हँसेगा
.
वे इंसान की प्रतिष्ठा भगवान से भी अधिक मानते हैं:

रहने दो इंसान
ही मुझे, मुझको मत देवता बनाओ.

नवगीतों में छंद को अनावश्यक माननेवाले संकीर्ण दृष्टि संपन्न अथवा छंद का पूर्णरूपेण पालन न कर सकनेवाले मूर्धन्यों को छोड़ दें तो नवगीत के प्रेमी इन नवगीतों का स्वागत मात्र नहीं करेंगे अपितु इनसे प्रेरणा भी ग्रहण करेंगे. अवतारी, महाभागवत आदि छंदों का प्रयोग करने में बंधु जी सिद्धहस्त हैं. वे शब्द चयन में प्रांजलता को वरीयता देते हैं, हिंदीतर शब्दों का प्रयोग न्यूनतम करते हैं. विवेच्य संकलन के नवगीत लोकमानस में अपना स्थान बनाने में समर्थ हैं, यही कवि का साध्य है.
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', समन्वयम, २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१, ९४२५१८३२४४

कोई टिप्पणी नहीं: