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बुधवार, 22 अप्रैल 2015

चित्र पर मुक्तक



चित्रांकन: प्रवीण बरनवाल
संजीव सलिल:
मन गागर सुधियों से पूरित छलक न जाए 
तन गागर दृग आंसू पूरित झलक न जाए
मृण्मय गागर लुढ़की तो फिर भर जाएगी
उसकी छवि देखे बिन मुंद प्रभु! पलक न जाए
नज़र द्विवेदी
अंतर्मन को शाश्वत चिंतन , वाणी दो मधुमय स्वर को ।
मेरा गीत सुधा बन जाए , प्राण श्वांस दो अक्षर को ।।
कब तक अग्नि परीक्षा देगा , लज्जा का अवगुंठन माॅ
अविरल गति दो कर्मयोग के , अलसाये तन पिंजर को ।।
विश्वम्भर शुक्ल
अब कौन सी है बात जो अधीर किये है, 
हँसती हुई आँखों में इतना नीर किये है,
हो किसलिए बेचैन और मौन किसलिए, 
कोई तो बात है कि जो गंभीर किये है ?
डॉ. साधना प्रधान 
सूख गई वो हरियाली प्यार की,
खो गई वो, छांव एतबार की ।
मन-पंछी अकेला खड़ा तके है,
आस लिए, प्रिय तेरे दीदार की ।।
डॉ. संजय बिन्दल
पनघट पर गौरी खड़ी.....पीया मिलन की आस
कब आओगे साजना.......हो ना जाऊँ निःश्वास
तुम सागर हो प्रेम के...मैं प्रेमनद की बहती धारा
जब तक होगा मिलन नही..बुझे ना तब तक प्यास।
डॉ रंजना वर्मा
अश्रु की धार बन गयी है खुद
विकल पुकार बन गयी है खुद।
रास्ते पर नयन टिकाये हुए
वो इंतज़ार बन गयी है खुद।।
विश्व शंकर
किए श्रंगार खडी सुकुमारी श्यामल धारे वसन
प्रेम सुधा रस पीने को व्याकुल उसका यौवन
अतृप्त ह्रदय की है अब बस यही अभिलाषा
प्यास बुझा भर दें गागर बरसें कुछ ऐसे घन
राज कुमार शुक्ल राज
राह पी की तकते तकते धैर्य घट घटने लगा है 
और चातक की तरह मन बस पिया रटने लगा है 
बीतते जाते हैं पल पल इक मिलन की आस मे
अब ह्र्द्य भी राज टुकड़ो टुकड़ो मे बंटने लगा है
अश्वनी कुमार
दे ज्ञान कुछ ऐसा प्रभु, मै प्रीत सच्ची भान लूँ
मै आदमी को देखकर,नियत सही पहचान लूँ
थकने लगी हूँ राह तकते,रिक्त है मन कुंभ सा
आया नहीं निर्मोही क्यूँ,वो लौट के ये जान लूँ II
किरण शुक्ल
आस्था से पत्थर शिव में ढलते देखा
श्रद्धा विश्वास से जग को पलते देखा
निशां पड़ते हैं रस्सी से पत्थर पर
यहाँ मैने सिद्धार्थ को बुद्ध बनते देखा
अवधूत कुमार
ताजमहल से कई पत्थरों में,सोयी हैं मुहब्बतें ,
खजुराहो से कई प्रस्तरों में, जागी है मुहब्बतें ,
सिजदों ने दे दिया है पत्थरों को रुतबाए ख़ुदा,
पत्थरों में क़ाबा'ओ काशी के जागी हैं मुहब्बतें।
नागेब्द्र अनुज 
भरो मत आह इनके नैन गीले हो नहीं सकते।
ये पत्थर-दिल हैं ये हरगिज़ लचीले हो नहीं सकते।
तेरी बेटी है सुंदर भी गुणों की खान भी लेकिन,
बिना पैसों के इसके हाथ पीले हो नहीं सकते
मेहता उत्तम
देख दिल्ली का मंजर सोंचे नारी
द्वंद है भारी मन में सोंच सोंच हारी
आत्महत्या करता किसान है असली
या रैली में मस्त हो करता नाच भारी
पवन बत्तरा
कृष्णा मुझे तुम ही बहुत खिजावत है
हूँ म्लान तुझसे फिर नही बुलावत है
पथ बाट कबसे जोहती तुम्हारी मैं
भरने घड़ा पनघट कभी न जावत है
आभार: मुक्तक लोक 









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