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गुरुवार, 30 अप्रैल 2015

रचना-प्रति रचना महेश चन्द्र गुप्त ’ख़लिश-संजीव

मुक्तिका: ग़ज़ल 
miktika/gazal

संजीव वर्मा 'सलिल' 
sanjiv verma 'salil'
*
निर्जीव को संजीव बनाने की बात कर 
हारे हुओं को जंग जिताने की बात कर 
nirjeev ko sanjeev banane ki baat kar
hare huon ko jang jitane ki baat kar 

'भू माफिये'! भूचाल कहे: 'मत जमीं दबा 
जो जोड़ ली है उसको लुटाने की बात कर'
'bhoo mafiye' bhoochal kahe: mat jameen daba 
jo jod li hai usko lutane kee baat kar 

'आँखें मिलायें' मौत से कहती है ज़िंदगी 
आ मारने के बाद जिलाने की बात कर 
aankhen milayen maut se kahtee hai zindagi 
'aa, marne ke baad jilaane ki baat kar'

तूने गिराये हैं मकां बाकी हैं हौसले   
काँटों के बीच फूल खिलाने की बात कर 
toone giraye hain makan, baki hain hausale  
kaanon ke beech fool khilane kee baat kar 

हे नाथ पशुपति! रूठ मत तू नीलकंठ है 
हमसे ज़हर को अमिय बनाने की बात कर 
he nath pashupati! rooth mat too neelkanth hai 
hmse zar ko amiy banane kee baat kar

पत्थर से कलेजे में रहे स्नेह 'सलिल' भी 
आ वेदना से गंग बहाने की बात कर 
patthar se kaleje men rahe sneh salil bhee 
aa vedana se gng bahane kee baat kar 

नेपाल पालता रहा विश्वास हमेशा 
चल इस धरा पे  स्वर्ग बसाने  की बात कर 
nepaal palta raha vishwas hamesha
chal is dhara pe swarg basane kee baat kar 
*** 

facebook: sahiyta salila / sanjiv verma 'salil' 

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