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गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

kundaliya: baans -sanjiv

कुण्डलिया
बाँस
संजीव
.
बाँस सदृश दुबले रहें, 'सलिल' न व्यापे रोग
संयम पथ अपनाइए, अधिक न करिए भोग
अधिक न करिए भोग, योग जन सेवा का है
सत्ता पा पथ वरा, वही जो मेवा का है
जनगण सभी निराश, मन ही मन कुढ़ते रहें
नहीं मुटायें आप, बाँस सदृश दुबले रहें
.
राग-द्वेष करता नहीं, चाहे सबकी खैर
काम सभी के आ रहा, बाँस न पाले बैर
बाँस न पाले बैर, न अंतर बढ़ने देना
दे-पाना सम्मान, बाँट-खा चना-चबेना
लाठी होता बाँस, गर्व कभी करता नहीं
'सलिल' निभाता साथ, राग द्वेष करता नहीं
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