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बुधवार, 15 अप्रैल 2015

muktika: sanjiv

मुक्तिका:
संजीव
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आप से आप ही टकरा रहा है
आप ही आप जी घबरा रहा है
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धूप ने छाँव से कर दी बगावत
चाँद से सूर्य क्यों घबरा रहा है?
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क्यों फना हो रहा विश्वास कहिए?
दुपहरी में अँधेरा छा रहा है  
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लोक को था भरोसा हाय जिन पर
लोक उनसे ही धोखा खा रहा है
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फिजाओं में घुली है गुनगुनाहट
खत्म वनवास होता जा रहा है
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हाथ में हाथ लेकर जो चले थे
उन्हीं का हाथ छूटा जा रहा है
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बुहारू ले बुहारो आप आँगन
स्वार्थ कचरा बहुत बिखरा रहा है
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