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बुधवार, 15 अप्रैल 2015

muktika: sanjiv

मुक्तिका:
संजीव
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चूक जाओ न, जीत जाने से
कुछ न पाओगे दिल दुखाने से
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काश! खामोश हो गये होते
रार बढ़ती रही बढ़ाने से
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बावफा थे, न बेवफा होते  
बात बनती है, मिल बनाने से    
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घर की घर में रहे तो बेहतर है
कौन छोड़े हँसी उड़ाने से?
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ये सियासत है, गैर से बचना
आजमाओ न आजमाने से
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जिसने तुमको चुना नहीं बेबस
आयेगा फिर न वो बुलाने से  
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घाव कैसा हो, भर ही जाता है
दूरियाँ मिटती हैं भुलाने से  
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