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सोमवार, 25 मई 2015

नवगीत: संजीव

नवगीत:
संजीव
*
श्वास मुखड़े 
संग गूथें 
आस के कुछ अंतरे 
*
जिंदगी नवगीत बनकर
सर उठाने जब लगी 
भाव रंगित कथ्य की 
मुद्रा लुभाने तब लगी 
गुनगुनाकर छंद ने लय 
कहा: 'बन जा संत रे!'
श्वास मुखड़े 
संग गूथें 
आस के कुछ अंतरे 
*
बिम्ब ने प्रतिबिम्ब को 
हँसकर लगाया जब गले
अलंकारों ने कहा:
रस सँग ललित सपने पले 
खिलखिलाकर लहर ने उठ 
कहा: 'जग में तंत रे!'  
*
बन्दगी इंसान की 
भगवान ने जब-जब करी 
स्वेद-सलिला में नहाकर 
सृष्टि खुद तब-तब तरी 
झिलमिलाकर रौशनी ने 
अंधेरों को कस कहा:
भास्कर है कंत रे!
श्वास मुखड़े 
संग गूथें 
आस के कुछ अंतरे 
*

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