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मंगलवार, 12 मई 2015

doha salila; - sanjiv

दोहा सलिला:
संजीव
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जब चाहा संवाद हो, तब हो गया विवाद
निर्विवाद में भी मिला, हमको छिपा विवाद
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दिल से दिल की बात है, जो चाहे दो नाम
अगणित पाये नाम पर, दिलवर रहा अनाम
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जोड़-जोड़ कुछ मर गये, तोड़-तोड़ कुछ लोग
छोड़-छोड़ कह कुछ थके, लेकिन मिटा न रोग
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जो न लचीला हो सका. गिरा भवन हर बार
वृक्ष लचीला सह गया, भूकम्पों की मार
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जान न ली भूकंप ने, लेते जान मकान
बना दफन हो रहा है, उसमें खुद इंसान
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