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शनिवार, 16 मई 2015

doha salila: sanjiv

दोहा सलिला:
संजीव
*
लाज और कौशल रखें, अस्त्र-शस्त्र सम साथ
'सलिल' सफलता मिलेगी, ऊंचा रखिये माथ
.
बुद्धि विरागिनी विमल हो, हो जब ज्ञान गृहस्थ
तब मन मंदिर बन सके, सत-शिव हो आत्मस्थ
.
मन हारे मन जीत जब, मन जीते मन हार 
मीरा तब ही श्याम से, होती एकाकार
.
करें प्रशंसा प्रीति पा, जो बनते हैं मीत 
कमी कहें तो वे नहीं, पाते बाजी जीत
.
रौशन दीपक से हुआ, जग लेकिन था मौन
दीप बुझा तो पूछता, करे अन्धेरा कौन?
.
स्नेह सरोवर सुखाकर करते जो नाशाद 
वे शादी कर किस तरह, हो पायेंगे शाद?
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जब नरेश नर की व्यथा-कथा सुनाये आप
पीड़ा पर मरहम लगे, सुख जाए जग-व्याप
.
शेर न करना मित्रता, अगर कहे इंसान 
तू निभाएगा, ठगेगा, गले लगा इंसान
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रश्मिरथी भी देखकर, रश्मि न भूले राह 
संग चन्द्रमा भी, कहे वाह वाह जी वाह
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चित्र गुप्त जिसका वही, लेता जब आकार 
ब्रम्हा-विष्णु-महेश तब, होते हैं साकार
.
बेशर्मों की दीठ को, प्रभुजी दीजै फोड़ 
ताक-झाँक की फिर कभी, लगे न उनमें होड़


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