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मंगलवार, 26 मई 2015

doha : sanjiv

दोहा सलिला:
संजीव
*
सकल भूमि सरकार की, किसके हैं हम लोग?
जायें कहाँ बताइए?, तज घडियाली सोग
*
नित्य विदेशों से करें, जी भरकर व्यापार 
कम भेजे बुलवा अधिक, करते बंटाढार 
*
परिवर्तन की राह कब, कहे रही आसान?
आप जूझते ही रहें, करें लक्ष्य-संधान 
*
केंद्र-राज्य पूरक बनें, संविधान की चाह 
फर्ज़ भूल टकरा रहे, जन-गण भरता आह 
*
राज्यपाल का काम है, रखना सिर्फ निगाह 
रहें सहायक तभी तो, हो उनकी परवाह
*
जनगण ने प्रतिनिधि चुने, कर पायें वे काम 
जो इसमें बाधक बने, वह भोगे परिणाम 
*
केद्र न तानाशाह हो, राज्य न मालगुजार 
मालिक जनता रहे तो, मिटे सकल तकरार 
*

1 टिप्पणी:

अचल वर्मा ने कहा…

आचार्य जी ,
बात झगड़े की नहीं है , यहाँ रगड़े की है
हमने जीता चुनाव फ़िक्र हमें किसकी है ?
हमने जो वादे किए वो नहीं पूरा करना
हमें तो जंग से है दंग , है उसे तंग करना |
कोई बताये ये की दिल्ली जब हमारी है
और को क्या हक, क्यों ये मारामारी है
जैसे हम चाहें सभी को वैसे चलना होगा
हुए हैं आम से ही ख़ास , तो डरना होगा
पीएम और जंग की है क्याभला बिसात यहाँ
अबतो जनता की भी परवा है हमको कहाँ ?