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बुधवार, 20 मई 2015

dwipadi / doha

द्विपदियाँ:
संजीव
*
नहीं इंसान हैं, हैवान हैं, शैतान हैं वो सब 
जो मजहब को नहीं तहजीब, बस फिरका समझते हैं
*
मिले उपहार में जो फेंक दें अपनी नहीं आदत
जतन से दर्द दिल में 'सलिल' ने रक्खा सदा सेकर
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दोहा सलिला:
संजीव
*
सिर्फ जुबां से ही नहीं, की जाती है बात
आँख- आँख में झाँककर, समझ सके जज्बात
*
कई फेसबुकिये मिले, जिन्हें चाहिए नाम
कुछ ऐसे जो चाहते, रहना सदा अनाम
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