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गुरुवार, 14 मई 2015

mukatak salila: sanjiv

मुक्तक सलिला :
संजीव
.














हमसे छिपते भी नहीं, सामने आते भी नहीं 
दूर जाते भी नहीं, पास बुलाते भी नहीं 
इन हसीनों के फरेबों से खुदा भी हारा- 
गले लगते भी नहीं और लगाते भी नहीं 
*
पीठ फेरेंगे मगर मुड़ के फिर निहारेंगे 
फेर नजरें यें हसीं दिल पे दिल को वारेंगे 
जीत लेने को किला दिल का हौसला देखो-
ये न हिचकेंगे 'सलिल' तुमपे दिल भी हारेंगे 
*
उड़ती जुल्फों में गिरफ्तार कभी मत होना 
बहकी अलकों को पुरस्कार कभी मत होना 
थाह पाओगे नहीं अश्क की गहराई की-
हुस्न कातिल है, गुनाहगार कभी मत होना 
*


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