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मंगलवार, 12 मई 2015

muktak: sanjiv

मुक्तक:
संजीव, राष्ट्रीय,  
कलकल बहते निर्झर गाते 
पंछी कलरव गान सुनाते गान 
मेरा भारत अनुपम अतुलित 
लेने जन्म देवता आते 
ऊषा-सूरज भोर उगाते 
दिन सपने साकार कराते 
सतरंगी संध्या मन मोहे 
चंदा-तारे स्वप्न सजाते   
एक साथ मिल बढ़ते जाते 
गिरि-शिखरों पर चढ़ते जाते 
सागर की गहराई नापें 
आसमान पर उड़ मुस्काते 
द्वार-द्वार अल्पना सजाते 
 रांगोली के रंग मन भाते 
चौक पूरते करते पूजा 
हर को हर दिन भजन सुनाते 
शब्द-ब्रम्ह को शीश झुकाते 
राष्ट्रदेव पर बलि-बलि जाते 
धरती माँ की गोदी खेले 
रेवा माँ में डूब नहाते 
***

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